Ramayana Movie Controversy: 4000 करोड़ की लागत से बन रही भारत की सबसे बड़ी फिल्म रामायण सुर्खियों में है. इस फ़िल्म में रणबीर कपूर राम और साई पल्लवी सीता के किरदार में हैं और इस फ़िल्म का संगीत दो ऑस्कर विनर ए आर रहमान और हंस जिमर ने दिया है लेकिन रिलीज से पहले ही रामायण में विवाह गीत पर कव्वाली का नया विवाद शुरू हो गया है. इसमें ए आर रहमान का नाम आते ही नफरत की लॉबी भड़क उठी है. यही से सवाल उठता है कि क्या आरएसएस ने बॉलीवुड को भी हिंदू और मुस्लिम में बांट दिया है जहां अब गाने की धुन नहीं बल्कि संगीतकार का धर्म देखा जा रहा है?

नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही फिल्म रामायण का म्यूजिक लॉन्च चेन्नई में 21 अक्टूबर 2026 को हुआ. इस कार्यक्रम में ए. आर. रहमान ने फिल्म का संगीत लाइव प्रस्तुत किया. रणबीर कपूर, यश और साई पल्लवी सहित फिल्म के कलाकार भी मौजूद थे. कुछ हिंदुत्ववादी हैंडल्स ने चेन्नई में हुए इसी म्यूजिक लॉन्च में गाए गए मिथिला विवाह गीत को कव्वाली बताना शुरू कर दिया है क्योंकि इसे ए आर रहमान ने कंपोज किया है.

नितेश तिवारी की रामायण इस समय भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी फिल्म है. 4000 करोड़ के बजट वाली ये फिल्म दो भागों में बन रही है. पहला भाग 5 नवंबर 2026 को रिलीज होना है. बीते हफ्ते इस फिल्म के दो गाने चर्चा में आए. एक रावण तांडव जो दशहरे पर रिलीज हुआ और दूसरा मंगल रंग और जोड़ी जोड़ी जो सीता राम के विवाह पर फिल्माया गया है. मंगल रंग को अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल ने गाया है, लिरिक्स कुमार विश्वास के हैं और जोड़ी जोड़ी को चिन्मयी श्रीपदा ने गाया है. इसी जोड़ी जोड़ी गाने को लेकर यह नया विवाद खड़ा कर दिया गया है.

सोशल मीडिया पर कुछ हिंदुत्ववादी हैंडल्स ने इसे कव्वाली बता दिया है. कहा जा रहा है कि ए आर रहमान ने राम सीता के विवाह में कव्वाली डाल दी है. जबकि असल में ये गाना मिथिला के पारंपरिक विवाह गीतों पर आधारित है, इसमें 90 के दशक वाली लोक की मिठास है. जिन लोगों ने चेन्नई में हुए ग्रैंड म्यूजिक लॉन्च में इसे लाइव सुना, उन्होंने इस गीत को ऑस्कर लेवल कहा लेकिन नफरत को गाने की धुन से मतलब नहीं होता, उसे नाम से मतलब होता है. नाम ए आर रहमान है इसलिए ये कव्वाली है. यही इस पूरे विवाद की असली जड़ है.

अब सवाल ये है कि क्या ये विवाद अचानक पैदा हुआ है? बिल्कुल नहीं. ये 2014 के बाद से चली आ रही एक सोची समझी स्क्रिप्ट का हिस्सा है. 2014 के बाद आरएसएस ने बॉलीवुड को भी उसी तरह बांट दिया है जैसे उसने समाज को बांटा है. एक लिस्ट याद कीजिए. आमिर खान ने असहिष्णुता पर बात की तो उन्हें एंटी नेशनल बता दिया गया, उनकी फिल्म लाल सिंह चड्ढा का बायकॉट करवाया गया. शाहरुख खान की पठान में दीपिका के भगवा बिकिनी पर पूरे देश में बवाल करवा दिया गया. कहा गया कि भगवा का अपमान हुआ है, जबकि वही बिकिनी का रंग पहले सैकड़ों फिल्मों में आ चुका था.

ए आर रहमान ने बीबीसी को एक इंटरव्यू में कहा कि पिछले कुछ सालों में उन्हें बॉलीवुड में काम कम मिल रहा है और इसके पीछे सांप्रदायिक कारण भी हो सकते हैं तो उन्हें तुरंत ट्रोल कर दिया गया, उनसे माफी मंगवाई गई और अब उनको रामायण से ही हटाने की मांग उठ रही है. नसीरुद्दीन शाह, जावेद अख्तर, स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप, जो भी आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ बोलता है, उसे पाकिस्तानी, जिहादी, टुकड़े टुकड़े गैंग घोषित कर दिया जाता है. असल में तो ये कोई फिल्म क्रिटिसिज्म नहीं है बल्कि यह कलाकार की धार्मिक पहचान पर ही सीधा हमला है.

आरएसएस ने बॉलीवुड में नफरत का मॉडल बहुत साफ रखा है. पहले एक फिल्म चुनी जाती जिसमें कोई मुस्लिम कलाकार हो. फिर उसके एक सीन, एक गाने, या उसके कपड़े को धर्म से जोड़ दिया जाता है. फिर व्हाट्सएप और ट्विटर पर हजारों फेक हैंडल से इसे मुद्दा बनाकर ट्रेंड करवाया जाता है. फिर गोदी मीडिया उस ट्रेंड पर डिबेट करवाती है. फिर बीजेपी का कोई सांसद या विधायक कह देता है कि हम फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे. बस हो गया नफ़रत का पूरा नेरेटिव सेट. इस नेरेटिव का मकसद फिल्म को रोकना नहीं, बल्कि ये बताना है कि बॉलीवुड पर हमारा कंट्रोल है.

आप सोचिए, रामायण जैसी हिन्दू आस्था वाली मेगा बजट फ़िल्म का म्यूजिक ए आर रहमान जैसा व्यक्ति बना रहा है जो खुद शिव भक्ति के गाने और वंदे मातरम बना चुका है, जो ऑस्कर जीत चुका है, उसके संगीत को भी कव्वाली कह कर खारिज किया जा रहा है. क्यों? क्योंकि रहमान मुसलमान है. अगर यही धुन प्रीतम, अमित त्रिवेदी, मिथुन, शाश्वत सचदेव, विशाल-शेखर, शंकर-एहसान-लॉय, विशाल भारद्वाज, हिमेश रेशमिया या अजय-अतुल बनाते तो उसे वर्ल्ड क्लास कहा जाता लेकिन रहमान ने बनाई तो कव्वाली हो गई. यही वो मानसिकता है जो कहती है कि मुस्लिम दर्जी से कपड़ा मत सिलवाओ, मुस्लिम हलवाई से मिठाई मत लो और अब मुस्लिम संगीतकार से रामायण का संगीत मत लो.

आरएसएस की इस मानसिकता का नुकसान सिर्फ ए आर रहमान को नहीं, पूरी भारतीय सिनेमा को हो रहा है. बॉलीवुड दुनिया में भारत की सबसे बड़ी सॉफ्ट पावर थी. ए आर रहमान, शाहरुख खान और आमिर खान की वजह से भी भारत के सेकुलर कल्चर की तारीफ दुबई से लेकर अमेरिका तक होती थी. आज उसी इंडस्ट्री में काम देने से पहले ये देखा जाता है कि उसका धर्म क्या है? प्रोड्यूसर डरता है कि अगर उसने मुस्लिम एक्टर या म्यूजिशियन को लिया तो कहीं फिल्म बायकॉट न हो जाए. यही डर आरएसएस चाहता है. वो चाहता है कि बॉलीवुड भी बंट जाए. हिंदू फिल्म और मुस्लिम फिल्म. हिंदू गाना और मुस्लिम गाना. जबकि कला का कोई धर्म नहीं होता. बॉलीवुड में हुनर को धर्म से नहीं, हुनर से देखा जाता है. यही बॉलीवुड की पहचान रही है.

नौशाद ने मुगले आजम में भजन बनाए थे, बिस्मिल्लाह खान ने काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाई थी, मोहम्मद रफी ने तो हजारों भजन गाए थे, किशोर कुमार ने नबी के लिए नात गाई है और लता ने भी कई कव्वाली गाई है. यह असली बॉलीवुड था जो भारत की सेकुलर पहचान को खूबसूरती के साथ रिप्रेजेंट करता था. असल में यह विवाद सिर्फ एक गाने का नहीं है. यह इस बात का सबूत है कि नफरत अब टीवी स्टूडियो से निकल कर बॉलीवुड स्टूडियो तक पहुंच गई है. Ramayana Movie Controversy

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