Prahaar Movie Review: 26/11 के मुंबई आतंकी हमले पर हिंदी सिनेमा में काफीकुछ बनाया जा चुका है कि अब इस त्रासदी पर कोई फिल्म आती है तो सवाल यह उठता है कि अब नया क्या? अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी औफ उज्ज्वल निकम’ इस विषय पर थोड़ा हट कर प्रयास करती है, जिसे, अच्छी बात यह है, फालतू विवादों से दूर रखा गया है.
फिल्म की शुरुआत 1993 के मुंबई बम धमाकों के केस की जीत से होती है, जहां सरकारी वकील उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) इस बात से असंतुष्ट है कि सिर्फ प्यादे पकड़े गए, मास्टरमाइंड अब भी आजाद है. इस के बाद कहानी सीधे 26/11 के हमले और फिर आर्थर रोड जेल के भीतर बनी स्पैशल कोर्ट के मुकदमों पर टिक जाती है. फिल्म का फोकस आतंकी कसाब के खिलाफ खड़ी की गई कानूनी किलेबंदी और उज्ज्वल निकम के स्ट्रगल पर है, जिस ने कोर्ट में कसाब के पाकिस्तान से जुड़े कनैक्शन को साबित करने के लिए जीजान लगा दी. फिल्म में दिखाया गया कि कैसे परिवार की परवा किए बिना उज्जवल निकम इस केस में पूरी तरह लीन हो जाता है.
फिल्म पूरी तरह कोर्टरूम ड्रामा है, जहां एक तरफ पब्लिक का गुस्सा है कि कसाब को जल्दी फांसी पर लटकाया जाए, दूसरी तरफ कानून है जो कसाब जैसे आतंकी के लिए भी बराबर है और उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार देता है. इस बीच, दलीले हैं जो कई बार सुनीपढ़ी जा चुकी हैं और अंत में फांसी का फंदा है.
हर बायोग्राफी फिल्म की तरह इस में भी एक सीमा है कि यह उज्ज्वल निकम को ‘वनमैन आर्मी’ की तरह पेश करती है. इतिहास गवाह है कि इस केस में मुंबई पुलिस और जांच एजेंसियों के अहम रोल रहे हैं. पुलिस टीम ने कसाब से कड़ी पूछताछ की, उस का इकबालिया बयान दर्ज कराया और हमले के तुरंत बाद 14 हजार से अधिक पन्नों की ऐसी मजबूत चार्जशीट तैयार की जिस ने मामले को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया. खैर, फिल्म की डिमांड में उज्जवल केंद्र पात्र हैं.
अच्छी बात यह है कि राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम का किरदार निभाने से ज्यादा इस मामले की इंटैंसिटी पर ध्यान दिया है. उस ने खास नासिका बोली और तीखे मिजाज को पकड़ा है जो मुकदमों के दौरान अपनी मानवीय संवेदनाओं को भी खोजता है. कुछ सीन ऐसे हैं जहां वह कोर्टरूम में अपनी कर्री आवाज से सामने वाले वकील को निरुत्तर करता है, तो उस का तेवर देखने लायक होता है.
हालांकि फिल्म में एक और जो ध्यान खींचने वाला किरदार है वह कसाब के बचाव पक्ष के वकील अब्बास काजमी (सिकंदर खेर) का है. मीडिया ट्रायल और जनता के गुस्से के उस दौर में कसाब का केस लड़ना सोशल सुसाइड से कम नहीं था. वकील अब्बास काजमी के माध्यम से निर्देशक ने उस सोशल बायकौट को ईमानदारी से सामने लाने की कोशिश की है.
एक सीन है जब कसाब का वकील अब्बास काजमी ईद मनाने के लिए अपनी दोनों बेटियों और पत्नी के साथ एक रैस्टोरैंट में बैठा होता है. तभी पत्नी की एक सहेली अपने शौहर के साथ आती है और ईद की मुबारकबाद देती है. उस का पति बिलकुल नहीं मुसकराता. उलटा अब्बास काजमी से कहता है कि ‘आप कसाब के वकील हैं न, शर्म नहीं आती आप को? एक टैररिस्ट को डिफैंड कर रहे हैं आप? थोड़ा कौम का भी लिहाज कर लिया होता? इस केस को ले कर आप ने हर मुसलमान को कठघरे में ला कर खड़ा कर दिया है.’ यह बात अब्बास काजमी को ऐसी हिट करती है कि वह आगे आने वाली हियरिंग में जज से भिड़ जाता है और लास्ट में केस छोड़ देता है.
उज्ज्वल निकम तब अब्बास काजमी को समझाता है कि आप केस मत छोड़ो, आप की दलीलों की वजह से ही दुनिया यह मानती है कि हमारा ट्रायल फर्जी नहीं है. आप मत जाओ, इस देश को आप की जरूरत है. इस पर काजमी कहता है कि, ‘मैं ने यह अपने देश, अपने संविधान के लिए किया. बदले में मुझे गद्दार का टाइटल मिला?’
रिकौर्ड्स बताते हैं कि कसाब का पक्ष अंजलि वाघमारे, अब्बास काजमी, के पी पवार, अमीन सोलकर, फरहाना शाह से ले कर राजू रामचंद्रन व गौरव अग्रवाल ने अलगअलग चरणों में कोर्ट के सामने रखा. मगर सब से ज्यादा लानतें अब्बास काजमी के सिर आईं. फिल्म में बताया गया कि निष्पक्ष ट्रायल के लिए बचाव पक्ष का वकील होना जरूरी था, ताकि दुनिया के सामने भारत का पक्ष बेदाग रहे. लेकिन उस डैमोक्रेसी की कीमत काजमी जैसे वकील को अपनी इज्जत दे कर चुकानी पड़ी.
फिल्म में पाकिस्तान के सरकारी वकील चौधरी जुल्फिकार अली के रूप में जयदीप अहलावत का छोटा लेकिन ठीकठाक रोल है. उस के और राजकुमार राव के बीच के सीन हैं जिन में जुल्फिकार भारत की लोकतांत्रिक और पाकिस्तान की तानाशाही व्यवस्था के अंतर को महसूस कराता है. बता दें, जुल्फिकार की मौत 2013 में एक आतंकी हमले में हो जाती है जब वे पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रहीं बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामले में तानाशाह परवेज की जमानत याचिका के विरोध में कोर्ट जा रहे होते हैं.
इस के अलावा, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर कसाब की गोलीबारी में अपनी मां को खो चुकी 10 साल की मासूम गवाह कोमल अहिरवार (डियोर रंजू वर्गीस) का कोर्टरूम सीन सिहरन पैदा करता है. और अंत में लालित प्रभाकर ने कसाब के रोल में बिना किसी लाउड ड्रामे के एक ब्रेनवाश किए गए, लेकिन अंदर से खौफनाक हत्यारे की भूमिका बढ़िया से निभाई है.
फिल्म का सकारात्मक पक्ष यह है कि यह जनता की इंस्टैंट जस्टिस की मांग को कानूनी प्रकिया और पक्ष से समझाने की कोशिश करती है. फिल्म विशेष अदालत में 15 अप्रैल, 2009 से शुरू हो कर 6 मई, 2010 तक चली. वह ऐतिहासिक जिरह और उस के बाद नवंबर 2012 तक फांसी की सजा पर अमल होने की पूरी कानूनी प्रक्रिया को दिखाती है.
अच्छी बात यह है कि फिल्म को राजनीतिक एजेंडे या फालतू के नफरती विवादों से पूरी तरह दूर रखा गया है. यह फिल्म छाती ठोकने वाले राष्ट्रवाद में नहीं उलझती, बल्कि भारत के संविधान, उस की अदालतों और कानून के राज की अहमियत को स्थापित करती है. बावजूद इस के, फिल्म का विषय चूंकि पुराना है सो बहुत चीजें नए ट्रीटमैंट के साथ रिपीट सी लगती हैं.
तकनीकी रूप से फिल्म की सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग और बैकग्राउंड म्यूजिक बैलेंस्ड हैं. फिल्म में 1-2 गाने हैं जो याद नहीं रहते. उज्जवल की पत्नी के रूप में वामीका गब्बी और बेटे के रूप में ऋत्विक सहोरे को बहुतकुछ करने को मिला नहीं. फिल्म उस आतंकी दहशत को समझने के लिए देखी जा सकती है जिस में 166 लोगों ने अपनी जान गवाई व 300 से अधिक घायल हुए. Prahaar Movie Review




