Daughter Share in Father Property: श्रूति सिंह की जब शादी हुई, तो शहर के सबसे बड़े ग्रौसरी स्टोर चलाने वाले उसके पापा विमल सिंह ने अपने हैसियत से ज्यादा खर्च किया. साल 2000 की उस शादी की शाम जब मंडप पर गहनों के लाल गोल-चौकोर डिब्बों को खोला गया, तो मंडप के चारों ओर बैठे घराती और बराती दोनों की आंखें फटी की फटी रह गई. दूसरी सुबह श्रूति को नई स्विफ्ट डिजायर कार में बिठा कर विदा किया गया, तो कार के पीछे महंगे फनीचर्स से लदा ट्रक भी दुल्हन के ससुराल की ओर चल पड़ा. एक छोटी ट्रक में नए मौडल की एसी, फ्रिज, किचन गैजेट्स, पीतल के भारी बरतन भी लाद दिए गए. श्रूति के छोटे भाई ने जीजाजी को जातेजाते एपल का नया आईफोन गिफ्ट किया. शादी में होने वाले खर्च के मामले में महीनों तक पटना के लोगों के बीच यह शादी मिसाल के तौर पर पेश की जाती रही.
असली कहानी यहां से शुरू होती है
साल 2007, श्रूति के पापा विमल सिंह, पटना के कंकड़ बाग के पौश इलाके में अपना प्लॉट बेचते हैं. इसकी कीमत 40 करोड़ थी. विमल सिंह इन पैसों को अपने बेटे के नाम कर रहे थे कि श्रूति अपना हिस्सा मांगने आ गई. भाभी ने जैसे ही सुना वह बोल पड़ी – “ ननद की शादी में हमने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया है. सोना दिया, फर्नीचर दिया, कपड़े दिए… अब मायके की जमीन में उसका कैसा हिस्सा?”
पुरानी सोच जिसे परंपरा बना दिया गया
श्रूति भी ठिठक गई क्योंकि बचपन से उसने अपने घरवालों से यही तो सुना था -बेटी की शादी कर दी, उसे गहने दे दिए, सामान दे दिया, अब उसका घर तो दूसरा है. श्रूति ने पूछा – “तो क्या, शादी में किया गया खर्च ही पापा की प्रोपर्टी में मेरा हिस्सा है?” श्रूति पढ़ीलिखी थी, उसने इंटरनेट पर बेटियों के अधिकार को लेकर जानकारी सर्च करनी शुरू की.
कानून की नजर में 1956 के पहले बेटी के अधिकार
भारत में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अनुसार, कानून ने हिंदुओं में बिना वसीयत संपत्ति के उत्तराधिकार और उससे जुड़े कई नियमों को व्यवस्थित किया. इस कानून में संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े अलग-अलग प्रावधान हैं लेकिन संयुक्त हिंदू परिवार की मिताक्षरा व्यवस्था (पुश्तैनी जमीन-जायदाद में किसका हक होगा, तय करने वाली पुरानी व्यवस्था) में एक विशेष अंतर जरूर था. संयुक्त परिवार की सहदायिक संपत्ति में बेटे को जन्म से सहदायिक ( पुश्तैनी जमीन-जायदाद में जन्म से हिस्सा रखने वाला सदस्य) माना जाता था, जबकि बेटी को बेटे के समान जन्मसिद्ध सहदायिक अधिकार नहीं था.
आम बोलचाल की भाषा में समझें, तो परिवार की ऐसी संयुक्त संपत्ति में बेटे की कानूनी स्थिति बेटी से अलग थी. यही वजह थी कि धीरेधीरे यह सोच बन गई कि बेटी शादी के बाद चली जाएगी और बेटा ही संपत्ति का असली वारिस होगा. यह एक पारंपरिक सोच थी.
साल 2005, लड़कियों के लिए हक का साल
साल 2005 में संसद ने Hindu Succession (Amendment) Act, 2005 पारित किया हुआ. इस संशोधन ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 को बदल दिया. नए कानून ने मिताक्षरा कानून से संचालित संयुक्त हिंदू परिवार में बेटी को बेटे की तरह जन्म से सहदायिक माना. लड़कियों को सहदायिक संपत्ति में बेटे के समान अधिकार और समान जिम्मेदारियां दी गईं. पहले जहां बेटा और बेटी सहदायिक अधिकार के मामले में समान स्थिति में नहीं थे, वहीं 2005 के संशोधन के बाद बेटी को भी बेटे के समान स्थिति दी गई.
श्रूति ने मांगा अपना हक
श्रूति ने अपने भाई से कहा – “भैया, बात सिर्फ इतनी नहीं है कि पापा ने मेरी शादी में कितना खर्च किया. अगर यह कानून के मुताबिक संयुक्त सहदायिक संपत्ति है, तो मुझे भी कानून ने बेटे की तरह अधिकार दिया है.” श्रूति ने अपनी भाभी की ओर देख कर कहा – भाभी जिस तरह से शादी होने से मेरा जन्मसिद्ध अधिकार खत्म नहीं होता, उसी तरह आप भी अपने मायके में अपने हिस्से की हकदार हैं.
पापा की डेथ के बाद बेटी का हक
श्रूति की भाभी को यह सुन कर अच्छा लगा कि उनका भी अपने मायके की प्रोपर्टी में हक है लेकिन तभी याद आया कि पापा की डेथ हो चुकी है, ऐसे में भाई ने संपत्ति देने से इनकार कर दिया, तो…
श्रूति ने भाभी के मन की कशमकश को समझते हुए एक बार फिर मोबाइल पर सर्च किया और भाभी को Vineeta Sharma v. Rakesh Sharma मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला समझाया. साल 2020 में संशोधित धारा 6 को समझाते हुए बताया कि बेटी को सहदायिक का दर्जा जन्म से ही मिलता है ठीक बेटों की तरह. पिता की मृत्यु हो जाने की स्थिति में भी यह अधिकार बरकरार रहता है.
पुरानी सोच में बदलाव जरूरी
श्रूति की तरह आज भी भारत के लाखों परिवारों की सोच है कि “बेटी की शादी हो गई, अब उसका मायके की जमीन या प्रोपर्टी में क्या काम?”
बेटी का विवाह उसकी वैवाहिक स्थिति बदलता है, लेकिन केवल विवाह के कारण संयुक्त सहदायिक संपत्ति में उसका कानूनी अधिकार समाप्त नहीं करता. यही 2005 के बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक है. साल 2005 के संशोधित कानून में बेटी को सहदायिक का दर्जा जन्म से दिया गया.
यह व्यवस्था आज श्रूति जैसी तमाम लड़कियों को पिता की संपत्ति पर अधिकार देता है और इस सोच को मजबूत बनाने के साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि परिवार में बेटी का हक बेटों के समान ही है. Daughter Share in Father Property





