300 Men killed: सौ साल पहले तक औरतों को अबला, बेचारी और सहनशील बनाये रखने की मानसिकता सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया में हर जगह थी. पिता और पति को औरतों पर जुल्म करने का सामाजिक लाइसेंस मिला हुआ था. कम उम्र की लड़कियों की शादी अधेड़ उम्र के मर्द से कर दी जाती थी और ये अधेड़ मर्द अपनी कम उम्र की औरतों को गुलाम समझते थे. शराबी, बूढा और बीमार मर्द भी अपनी औरत के साथ मारपीट या बलात्कार कर सकता था लेकिन सौ साल पहले हंगरी के एक गांव की औरतों ने पूरी बाजी ही पलट दी.

सौ साल पहले हंगरी के एक छोटे से गांव नागीरेव में कुछ ऐसा चल रहा था जिसने पूरी दुनिया के मर्दवादी समाज को हिला कर रख दिया था. 1911 से 1929 के बीच इस गांव में औरतों ने तकरीबन 300 मर्दों को जहर देकर मार डाला. दुनिया ने इन औरतों को एंजल मेकर्स कहा लेकिन सवाल यह है कि क्या ये औरतें जन्मजात हत्यारिनें थीं या यह सदियों के अत्याचार के खिलाफ बगावत करने वाली पहली क्रान्तिकारी औरतें थीं?

कहानी शुरू होती है 1911 में. बुडापेस्ट से 130 किलोमीटर दक्षिण में बसा नागीरेव गांव. यह 1500 से भी कम आबादी वाला किसानों का गांव था. यहां न डॉक्टर होते थे और न ही कोई पुलिस. 1911 में इस गांव में जुजसन्ना फजकास नाम की एक दाई आई. जुजसन्ना का अपना पति रहस्यमय तरीके से गायब था. जल्द ही गांव की औरतों के लिए वो डॉक्टर, सलाहकार और राजदार बन गई. औरतें जुजसन्ना के पास अपने जख्म लेकर आती थीं. ज्यादातर औरतों की कहानी एक सी थी. पति शराबी है, पीटता है, बलात्कार करता है, जुए में सब उड़ा देता है. उस दौर में किसी भी औरत के लिए अपने पति से तलाक लेना नामुमकिन था. 14-15 साल की लड़कियों की शादी अधेड़ मर्दों से कर दी जाती थी. प्रथम विश्वयुद्ध से लौटे मर्द तो और भी हिंसक हो चुके थे.

जुजसन्ना फजकास ने गांव की औरतों को एक सीधा समाधान बताया. मक्खी मारने वाले कागज को उबालकर उसमें से आर्सेनिक निकालो और मर्दों के खाने और शराब में मिला दो. न रंग, न गंध, न सबूत. मौत बीमारी जैसी लगेगी. इसके बाद जो हुआ वह इतिहास में कभी नहीं हुआ था. पति नाश्ते की थाली पर मरने लगे, शराब के गिलास पर ढेर होने लगे. सिर्फ पति नहीं, हिंसक पिता, अत्याचारी ससुर और धोखेबाज प्रेमी भी मारे जाने लगे.

1911 से 1929 तक इन दस सालों में गांव के तक़रीबन 300 मर्द गायब हो गये. पुलिस थानों में गुमशुदगी की रिपोर्ट बढ़ने लगी. 4 दिसंबर 1929 को अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने हंगरी के इस मामले की ख़बर छापी थी, जिसने दुनिया को हैरान कर दिया था. मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच शुरू कर दी. 1929 तक पुलिस ने 43 औरतों को पकड़ा और 28 औरतों पर 100 से ज्यादा हत्याओं का मुकदमा चला. कब्रें खोदकर देखी गईं तो 92 फीसदी लाशों में जहर मिला. 6 औरतों को मौत की सजा सुनाई गई, 3 को फांसी हुई, 8 को उम्रकैद हुई. फजकास ने पकड़े जाने पर खुद जहर खाकर जान दे दी.

अब सवाल यह है कि क्या ये औरतें जन्मजात हत्यारिन थीं? नहीं. ये वो औरतें थीं जिनके पास कानून नहीं था, जिनके पक्ष में धर्म नहीं था, जिनके साथ समाज नहीं था. धर्म ने उन्हें बूढ़े, नपुंसक और हिंसक पतियों को भी परमेश्वर मानने को मजबूर किया था. कानून ने उन्हें तलाक का अधिकार नहीं दिया था. समाज ने उन औरतों को अबला, बेचारी और सहनशील बनाये रखने की साजिश रची थी. पिटना और सहना उनकी किस्मत बता दिया गया था. जब हर दरवाजा बंद हो जाता है तो इंसान खिड़की तोड़ता है. इन औरतों की गलती यह थी कि इन्होने खिड़की नहीं, पूरी दीवार ही गिरा दी थी.

दुनिया के हर मर्दवादी समाज ने तय किया था कि औरत को सहना चाहिए लेकिन नागीरेव गांव की औरतों ने इस मर्दवादी सोच को चुनौती दी और उन्होंने सहना छोड़ दिया और हिंसा का जवाब हिंसा से दिया. तरीका गलत था. इसे क्रूरतम अपराध कहने में भी कोई हर्ज नहीं लेकिन सवाल यह है कि इन औरतों ने जो अपराध किया क्या इसे अनैतिक भी माना जाएगा? यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि न्याय प्रणाली में आत्मरक्षा में की गई हत्याएं अपराध तो होती हैं मगर अनैतिक नहीं होतीं.

यहां यह सवाल भी खड़ा होता है कि 18 साल तक एक गांव में सैकड़ों मर्द मरते रहे और किसी को शक क्यों नहीं हुआ? क्योंकि मर्दों की हिंसा इतनी सामान्य थी कि औरतों का दर्द किसी को दिखाई ही नहीं दिया. इस घटना में एक सहज सच्चाई नजर आती है कि जब न्याय की व्यवस्था औरतों को न्याय नहीं देती तो औरतें अपना न्याय खुद गढ़ लेती हैं. वो न्याय क्रूर हो सकता है, अनैतिक भी हो सकता है लेकिन उसकी जड़ में क्रूरता नहीं, सदियों का दमन होता है. 300 Men killed

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