DU Girls Protest: अगर लड़का देर रात तक घूम सकता है तो लड़की के लिए हॉस्टल का गेट रात 8 बजे क्यों बंद हो जाता है? अगर लड़की के कपड़े अपराध की वजह नहीं हैं तो उसके कपड़ों पर पहरा क्यों बैठाया जाता है? और अगर संविधान लड़की को बराबरी का अधिकार देता है तो समाज उसकी आजादी पर धर्म, परंपरा और संस्कार के नाम पर पहरे क्यों बैठाता है? लड़कियों ने अब इसी सवाल को सड़क पर उतार दिया है. डीयू की लड़कियों का यह आंदोलन सिर्फ हॉस्टल की टाइमिंग बदलने की लड़ाई नहीं है. यह उस पूरी व्यवस्था को चुनौती है जो अपराधी को रोकने के बजाय लड़की की आजादी पर बंदिश लगाती है. अभी लड़कियों ने सिर्फ कैम्पस में मोर्चा खोला है लेकिन इसकी गूंज देश के कोने कोने में सुनाई दे रही है. अब सवाल यह है कि डीयू की लड़कियों के आंदोलन से डर क्यों रहा है पितृसत्तात्मक समाज?

सितंबर के आखिरी सप्ताह में दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस की सड़कों पर “हम औरतें आजाद हैं” का नारा गूंजने लगा. सैकड़ों लड़कियां पैट्रिआर्की के खिलाफ हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर निकलीं. दरअसल यह उस गुस्से की आवाज है जो सालों से हॉस्टल के कमरों में दबी हुई थी. रात 8 बजे के बाद गेट बंद, छोटे कपड़े पहनने पर रोक, बाहर जाने पर वार्डन की इजाजत. इन नियमों ने लड़कियों को छात्र नहीं, कैदी बना दिया था. अब उन्होंने इसी पैट्रिआर्की वाली मानसिकता के खिलाफ बगावत कर दी है. यहां सवाल यह है कि आज की लड़कियों को पैट्रिआर्की समझ आ चुकी है लेकिन वे पितृसत्ता की असली जड़ तक कब पहुंचेंगी?

डीयू के इस आंदोलन को ट्रिगर सितंबर 2026 के आखिरी हफ्ते में मिला. 28 सितंबर 2026 को मिरांडा हाउस की छात्राओं ने हम औरतें आजाद हैं के नाम से नॉर्थ कैंपस में मार्च निकाला. इससे तीन दिन पहले 25 सितंबर को गार्गी कॉलेज और कमला नेहरू कॉलेज के बाहर भी छात्राओं ने मार्च किया. इन सबकी शुरुआत 2 सितंबर 2026 को ग्रेटर नोएडा में 16 साल की लड़की के साथ स्लीपर बस में हुए गैंगरेप से हुई. उसके बाद कालकाजी के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ हुए रेप ने आग में घी डाल दिया.

ट्रिगर का कारण सिर्फ यह दो रेप की घटनाऐं नहीं थी बल्कि उसके बाद प्रशासन का रवैया था. डीडीए ने कहा कि शाम के बाद महिलाएं पार्क में न जाएं. कॉलेज प्रशासन ने गर्ल्स हॉस्टल का कर्फ्यू और सख्त कर दिया. छात्राओं को लगा कि अपराधी को रोकने के बजाय उनको ही कैद किया जा रहा है. यही प्रोटेक्शन के नाम पर पाबंदी इस आंदोलन का असली कारण बनी. असल में तो यह लड़ाई सुरक्षा बनाम आजादी की है और लड़कियों की आजादी का सबसे बड़ा दुश्मन पैट्रिआर्की ही है.

दिल्ली विश्वविद्यालय की लड़कियों ने इस बार चुप रहने से इनकार कर दिया है. हॉस्टल की टाइमिंग, कपड़ों पर रोक, रात में बाहर न निकलने की हिदायत, इन सबके खिलाफ उन्होंने एकजुट होकर आवाज उठाई है. यह सिर्फ हॉस्टल के नियमों की लड़ाई नहीं है, यह उस सोच की लड़ाई है जो लड़की को हमेशा लड़के से कम समझती है. इस सोच का ही नाम है पैट्रिआर्की. ऊपर से देखने पर लगता है कि यह समाज की बनाई हुई व्यवस्था है लेकिन अगर थोड़ा गहरा उतरा जाए तो पता चलता है कि इसके पीछे असली खलनायक धर्म है. पैट्रिआर्की के खिलाफ डीयू की लड़कियों की यह लड़ाई उस दिन सही दिशा पकड़ेगी जब लड़कियां पितृसत्ता के साथ धर्म को भी कटघरे में खड़ा करेंगी जिसने औरत को हमेशा मर्द के पैरों के नीचे रखा है.

धर्म ने पैट्रिआर्की को भगवान का आदेश बनाकर पेश किया. किसी भी धर्म को उठाकर देख लीजिए. औरतों के खिलाफ सभी एक जैसी मानसिकता रखते हैं. इसी का नतीजा है कि आज भी लड़की के पैदा होने पर मातम मनाया जाता है और लड़के के पैदा होने पर थाली बजाई जाती है. यही मानसिकता जब धर्म से निकलकर डीयू के कैम्पस तक पहुंचती है तो लड़कों का हॉस्टल 24 घंटे खुला रहता है और लड़कियों के लिए रात 8 बजे का कर्फ्यू लगा दिया जाता है. तर्क दिया जाता है कि यह उनकी सुरक्षा के लिए है लेकिन असली सच यह है कि धर्म ने लड़की के दिमाग में यह बिठा दिया है कि उसका शरीर पाप है, उसे ढककर रखो, उसे छिपाकर रखो. जब तक धर्म इस सोच को खाद पानी देता रहेगा तब तक पैट्रिआर्की मरेगी नहीं.

अब DU की लड़कियों का यह आंदोलन एक नई उम्मीद बन कर उभरा है. यह लड़ाई लंबी है क्योंकि दुश्मन सिर्फ यूनिवर्सिटी का प्रशासन नहीं है, दुश्मन वह हजारों साल पुरानी धार्मिक सोच है जो घर घर में बैठी है. यह भी सच है कि जब औरतें एकजुट होती हैं तो बड़े बड़े सिंहासन हिल जाते हैं. ईरान में हुए हिजाब के खिलाफ प्रोटेस्ट इस बात का सबूत है. अब जरूरत इस बात की है कि DU के इस आंदोलन को सिर्फ हॉस्टल तक सीमित न रखा जाए इसे धर्म की जड़ों तक ले जाया जाए. जब तक लड़कियां यह नहीं जानेंगी कि पैट्रिआर्की का असली खलनायक धर्म है तब तक वह सिर्फ पत्तियां काटटी रहेंगी और जड़े हरी ही रहेगी.

सुरक्षा चाहिए लेकिन कैद नहीं

डीयू की छात्राओं के आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने सुरक्षा और आजादी को एक-दूसरे का दुश्मन मानने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि अगर किसी सड़क पर अंधेरा है तो स्ट्रीट लाइट लगाइए, अगर कोई पार्क असुरक्षित है तो वहां पुलिस की मौजूदगी बढ़ाइए, अगर कॉलेज से हॉस्टल या घर लौटने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है तो बसें बढ़ाइए लेकिन इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि लड़की को ही रात में बाहर निकलने से रोक दिया जाए. मिरांडा हाउस से निकले ‘हम औरतें आजाद हैं’ मार्च में छात्राओं ने सुरक्षा से जुड़ी मांगों के साथ इस पितृसत्तात्मक मानसिकता के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया और यही इस प्रोटेस्ट की सबसे खास बात बन गई यानी लड़कियों की लड़ाई सिर्फ सुरक्षा की मांग तक नहीं बल्कि उस सुरक्षा मॉडल के खिलाफ है जिसमें सुरक्षा का मतलब लड़की पर पहरा लगाना समझ लिया जाता है.

यहीं से इस आंदोलन की असली ताकत समझ में आती है. अगर किसी लड़की को रात में अकेले सड़क पर चलने से डर लगता है तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वह रात में घर से बाहर निकली ही क्यों? बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि सड़कें इतनी असुरक्षित क्यों है जहां रात को लड़की को डर लगता है? अगर कोई लड़की कॉलेज से देर रात लौटती है तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि उसे इतनी देर तक बाहर रहने की जरूरत क्या थी? सवाल यह होना चाहिए कि शहर में उसके सुरक्षित घर लौटने का इंतजाम क्यों नहीं है? और अगर किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो सवाल उसके कपड़ों, उसके दोस्त, उसके मोबाइल, उसके समय और उसके चरित्र पर नहीं बल्कि अपराधी की मानसिकता, कानून के पालन और संस्थाओं की जवाबदेही पर होना चाहिए.

धर्मसत्ता हमेशा सवाल की दिशा बदलने में माहिर रही है लेकिन इस बार डीयू की लड़कियां सवाल की दिशा बदल रही हैं. अपराध पुरुष करता है लेकिन पूछताछ लड़की से होती है. छेड़खानी लड़का करता है लेकिन लड़की को समझाया जाता है कि अकेले मत जाओ. पीछा लड़का करता है लेकिन लड़की से कहा जाता है कि फोन नंबर मत दो. रेप पुरुष करता है लेकिन समाज लड़की से पूछता है कि वहां गई क्यों थी? डीयू की छात्राएं इसी मर्दवादी मानसिकता को उलट रही हैं. वे पूछ रही हैं कि हमें क्यों बदलना चाहिए, अपराधी को क्यों नहीं बदलना चाहिए?

असली सवाल हॉस्टल की दीवारों से बाहर है

हॉस्टल का कर्फ्यू सिर्फ एक समय सीमा नहीं है. उसके पीछे एक पूरी सामाजिक सोच छिपी होती है. सोच यह कि लड़के को जोखिम लेने की आजादी दी जा सकती है लेकिन लड़की को नहीं, लड़की को आजादी देना नहीं बल्कि कंट्रोल करना जरूरी है. लड़के की आजादी को सामान्य माना जाता है और लड़की की स्वतंत्रता को खतरा समझा जाता है. यही अंतर बचपन से पैदा किया जाता है. लड़के को कहा जाता है कि दुनिया तुम्हारी है. लड़की को कहा जाता है कि तुम्हारे लिए दुनिया खतरनाक है. लड़के को आत्मनिर्भर बनाया जाता है और लड़की को सावधान रहने के गुर सिखाये जाते हैं. लड़के को गलती करने का अधिकार मिलता है और लड़की को परिवार की इज्जत ढोने की जिम्मेदारी थमाई जाती है. इसी मानसिकता के चलते धीरे-धीरे लड़की खुद भी अपनी स्वतंत्रता को खतरे की तरह देखने लगती है.

डीयू की लड़कियां इस मानसिकता को चुनौती दे रही हैं. वे कह रही हैं कि हमें सुरक्षा के नाम पर डर वाला जीवन नहीं चाहिए. हमें ऐसा शहर चाहिए जहां रात भी दिन की तरह सुरक्षित हो और सड़क पर चलने का अधिकार केवल पुरुषों का विशेषाधिकार न हो. इसी वजह से लड़कियों के पोस्टरों और नारों में रात पर अधिकार की बात भी सामने आई. लड़की को रात में घर के भीतर बंद कर देना उनकी सुरक्षा का सबसे आसान समाधान हो सकता है लेकिन इससे शहर सुरक्षित नहीं बनता. सुरक्षित शहर वह है जिसमें अपराधी को डर हो और लड़की को अपने घर लौटने के लिए डरना न पड़े.

इस आंदोलन ने लड़कियों को सिर्फ पीड़ित की भूमिका में देखने की मर्दवादी सोच को तोड़ा है. लड़की केवल वह नहीं है जिसे बचाने की जरूरत है. वह नागरिक है. उसे शहर की सड़क पर चलने, पार्क में बैठने, दोस्त से मिलने, देर तक पढ़ने, काम करने और अपनी जिंदगी का फैसला करने का उतना ही अधिकार है जितना किसी लड़के को है इसलिए महिला सुरक्षा की बहस को केवल पुलिस और सीसीटीवी तक सीमित करना गलत है. कैमरे जरूरी हो सकते हैं, स्ट्रीट लाइट जरूरी हो सकती हैं, पुलिस पेट्रोलिंग जरूरी हो सकती है लेकिन इनके साथ समाज की मानसिकता में बदलाव भी जरूरी है.

डीयू की लड़कियों के इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने डर को निजी समस्या मानने से इनकार कर दिया है. उन्होंने अपनी परेशानी को सामूहिक सवाल बनाया है इसलिए ‘हम औरतें आजाद हैं’ अब केवल एक नारा नहीं रह गया है. यह उस पुरानी व्यवस्था को दिया गया जवाब है जो सदियों से महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर कंट्रोल करती आई है. डीयू की लड़कियां शायद आज पूरी व्यवस्था नहीं बदल पाएंगी लेकिन उन्होंने एक जरूरी सवाल सड़क पर रख दिया है. अगर शहर में अपराध का डर है तो दीवारें ऊंची किसकी की जाएंगी, लड़कियों की या अपराधियों की? अगर रात असुरक्षित है तो रात को बंद किसके लिए किया जाएगा, महिलाओं के लिए या अपराधियों के लिए? और अगर संविधान में औरतों को बराबरी दी गई है तो उसे हॉस्टल की गेट-टाइमिंग में कैद करने का अधिकार आखिर किसके पास है?

जेनजी लड़कियां धर्मसत्तात्मक सोच की अर्थी उठा रही हैं

चाहे वह सीजेपी प्रोटेस्ट हो या अब डीयू का आंदोलन जेन जी लड़कियां आज पहले से ज्यादा मुखर और आजाद हैं. वो पढ़ती हैं, कमाती हैं, ट्रेवल करती हैं, अपनी मर्जी से कपड़े पहनती हैं, लिव-इन में रहती हैं, शादी न करने का फैसला लेती हैं, पितृसत्ता को खुलकर कोसती हैं, मी टू पर बोलती हैं, रेप कल्चर पर बोलती हैं लेकिन धर्म के मामले में एक अजीब सा सन्नाटा है. वो पितृसत्ता के पेड़ की डालियों पर तो वार करती हैं लेकिन उसकी जड़ पर उंगली नहीं उठातीं और वो जड़ है धर्म.

संविधान पूरी तरह लड़कियों के पक्ष में खड़ा है फिर भी लड़कियां रेप और छेड़खानी जैसी मानसिकता का शिकार होने से मुक्त नहीं हो पा रही. आज की जेन जी लड़कियां इसके लिए पितृसत्ता को तो कोसती हैं लेकिन धर्म पर उंगली नहीं उठाती. जबकि धर्म ही पितृसत्ता का सबसे बड़ा संरक्षक, सबसे पुराना स्रोत और सबसे मजबूत किला है. ये बात कहने से आज की प्रगतिशील लड़कियां डरती हैं क्योंकि धर्म पर सवाल उठाते ही उन्हें नास्तिक, संस्कृति-विरोधी, या हिन्दू-मुस्लिम में से किसी एक खेमे का बता दिया जाता है.

जेन जी लड़कियों की आजादी को अगर गहराई से देखो तो वो आजादी भी आधी-अधूरी लगती है. वो जींस पहन सकती है लेकिन पीरियड्स पर किचन के खाने को नहीं छू सकतीं. वो बॉयफ्रेंड चुन सकती है लेकिन गोत्र और जाति का पता चलते ही मार दी जाती हैं. यह सदियों की कंडीशनिंग है. धर्म ने औरत के दिमाग में ये बिठा दिया है कि सवाल उठाना पाप है. बचपन से उन्हें सुनाया जाता है कि सीता ने अग्निपरीक्षा दी थी, सावित्री ने यमराज से पति को छुड़ाया था तो तुम कौन होती हो बराबरी मांगने वाली. इन कहानियों को आदर्श बनाकर औरत के भीतर ही एक पहरेदार बिठा दिया गया है जो उसे हर बार रोकता है इसीलिए वो ऑफिस में बॉस से तो लड़ लेती है लेकिन घर में बैठे धर्म के ठेकेदारों से नहीं लड़ पाती.

देवदासी प्रथा के नाम पर लड़कियों को भगवान से ब्याह दिया गया और फिर पुरोहितों और जमींदारों के भोग के लिए छोड़ दिया गया. ये धर्म था या वेश्यावृत्ति का धार्मिक लाइसेंस? आज भी हरियाणा, राजस्थान के कई मंदिरों में मासिक धर्म के नाम पर औरतों को अलग बिठाया जाता है. मुस्लिम औरतों को तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं में जकड़कर धर्म के नाम पर ही दबाया गया. चर्च में औरत पादरी नहीं बन सकती. यानी हर धर्म ने औरत को गर्भ तो दिया लेकिन आजादी नहीं दी.

जब तक लड़कियां अपने खाने-कमाने के लिए पिता या पति पर निर्भर रहेगी तब तक वो धर्म के नियमों को तोड़ नहीं पाएगी. इसीलिए बाबासाहेब अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल में औरतों को संपत्ति का अधिकार दिलाने के लिए कानून मंत्री की कुर्सी तक दांव पर लगा दिया था. उन्हें पता था कि बिना आर्थिक बराबरी के सामाजिक बराबरी एक धोखा है क्योंकि पितृसत्ता कोई प्राकृतिक व्यवस्था नहीं थी बल्कि यह एक राजनीतिक प्रोजेक्ट था, जिसे राजा और धर्म ने मिलकर चलाया और आज भी यह प्रोजेक्ट सत्ता और धर्म के सहारे चल रहा है.

आज स्कूलों में सरस्वती वंदना से दिन शुरू होता है और इतिहास में रानियों को सती होने पर महान बताया जाता है. जब स्कूल ही पितृसत्ता पढ़ाएंगे तब सोच कैसे बदलेगी? आज जेन जी लड़कियों को यह तय करना होगा कि उन्हें देवी बनना है या इंसान? देवी बनोगी तो मंदिर में कैद रहोगी, फूल चढ़ाए जाएंगे लेकिन बोलने नहीं दिया जाएगा. इंसान बनोगी तो गलतियां भी करोगी, सवाल भी करोगी और बराबरी भी छीनोगी. जब कोई लड़की कहती है कि मेरी मर्जी के बिना मेरा शरीर कोई छू नहीं सकता तो वह सबसे बड़ी नास्तिक होती है क्योंकि ऐसा कहकर वह धर्म की उस किताब को रद्द कर रही होती है जो कहती है कि पति परमेश्वर है और यह परमेश्वर औरत की मर्जी के बिना उसके शरीर को नोंच सकता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय की लड़कियों ने आखिरकार उस सवाल को सड़क पर ला दिया है जिसे समाज सदियों से घर की चारदीवारी में दबाता आया है. “हम औरतें आजाद हैं” का नारा लगाती ये लड़कियां सिर्फ हॉस्टल के कर्फ्यू या रात में बाहर निकलने की पाबंदी के खिलाफ नहीं हैं बल्कि उस सोच के खिलाफ खड़ी हैं जो औरत को इंसान से पहले किसी की बेटी, बहन, पत्नी या इज्जत मानती है. लड़की के साथ बलात्कार हो तो उसके कपड़े देखे जाते हैं. वह रात में बाहर क्यों थी? पार्क में अकेली क्यों गई? यह सवाल खड़े किये जाते हैं लेकिन अपराधी से यह नहीं पूछा जाता कि उसने किसी की आजादी और शरीर पर हमला करने की हिम्मत कैसे की?

यही धर्मसत्ता है और यही वह व्यवस्था है जो लड़की के पक्ष में खड़े होने की बजाय उसे घरों में बंद कर देती है. डीयू की लड़कियां अब इसी दोहरे मापदंड को चुनौती दे रही हैं लेकिन इस आंदोलन का सबसे कठिन सवाल अभी बाकी है. पितृसत्ता सिर्फ हॉस्टल के नियमों में नहीं बैठी है, वह घर, समाज, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं में भी गहरी जड़ें जमाए बैठी है इसलिए अगर ये लड़कियां सचमुच आजादी चाहती हैं तो उन्हें सिर्फ हॉस्टल के गेट पर नहीं रुकना होगा, उन्हें उन तमाम मान्यताओं से भी सवाल करना होगा जो हजारों साल से औरत को पुरुष के अधीन रखने को नैतिकता और धर्म का नाम देती आई हैं.

पुरुष को अधिकार धर्म के टूल्स से ही मिले हैं. पितृसत्तात्मक कहने से हम पुरुष को ही केंद्र में रख देते हैं, जबकि असली केंद्र धर्म छुपा रहता है इसलिए डीयू के आंदोलन को अब एक कदम आगे बढ़ना होगा. पितृसत्तात्मक समाज कहना सुविधाजनक है क्योंकि इसमें पुरुष नाम का एक दृश्य दुश्मन दिखता है लेकिन धर्मसत्तात्मक समाज कहना कठिन है क्योंकि इसमें घर, मंदिर, मस्जिद, चर्च और अपने ही विश्वास से लड़ना पड़ता है जबकि सच यह है कि पुरुष को अधिकार पुरुष होने से नहीं मिला, उसे अधिकार धर्म से मिला है. जिस दिन लड़की यह पूछेगी कि मेरी जिंदगी के फैसले भगवान, धर्म, परिवार या समाज क्यों तय करेगा? उसी दिन सिर्फ पितृसत्ता नहीं, उसकी जड़ धर्मसत्ता पूरी तरह हिल जाएगी. DU Girls Protest

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