Azamgarh Shooting Case: आजमगढ़ का भयावह गोलीकांड सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस अंधविश्वास की कहानी है जिसमें 21वीं सदी का समाज आज भी भूत-प्रेत, आत्मा, झाड़-फूंक और कर्मकांडों में समाधान तलाशता है. जिस घर में चार दिन से महामृत्युंजय जाप चल रहा था, वहां आखिर ऐसा क्या हुआ कि पांच लोगों की जान चली गई?

आजमगढ़ का गोलीकांड बताता है कि 21वीं सदी में भी हम भारत के लोग, खासकर औरतें भूत-प्रेत और झाड़-फूंक से बाहर नहीं निकल पायी हैं. कैलेंडर बदल गया, मोबाइल बदल गया, गांव-शहर की तस्वीर बदल गई, लेकिन हमारे समाज की सोच अब भी सदियों पीछे खड़ी है. बीमारी हो, मानसिक परेशानी हो, कोई असामयिक मौत हो गई हो या घर में कोई व्यक्ति असामान्य व्यवहार करने लगे तो हम भारतीय वैज्ञानिक कारण तलाशने की बजाय सबसे पहले भूत-प्रेत, आत्मा, नजर, टोना-टोटका, मंत्र और झाड़-फूंक करवाने के लिए पंडित-मौलवियों के चक्कर काटने लगते हैं.

आजमगढ़ की भयावह घटना इसी सोच का भयावह उदाहरण है. अहरौला थाना क्षेत्र के शंभूपुर गांव में अरविंद सिंह के घर में कई दिनों से धार्मिक अनुष्ठान चल रहा था. उसकी पत्नी बबिता को शक था कि उसके मरे हुए जेठ सुनील सिंह का भूत उसके घर के लोगों को परेशान कर रहा है और भूत उसके पति और बच्चों को मार डालेगा. सुनील की कुछ समय पहले हत्या हुई थी. लिहाजा बबिता ने दो पुरोहितों महेंद्र पाठक और अखिलेश मिश्रा को घर बुला कर महामृत्युंजय जाप करवाना शुरू कर दिया.

बबिता का पति अरविंद जिसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं था और जो अत्यधिक तनाव में रह रहा था, इस बात से नाराज था कि उसकी पत्नी दो पंडों को घर में बिठा कर तीन दिन से पूजा करवा रही है. 22 सितम्बर को इसी बात को लेकर अरविंद का बबिता से झगड़ा हुआ और उसने पंडितों से पूजापाठ बंद करने के लिए कहा. बबिता ने पति का विरोध किया तो अरविंद ने गालीगलौच करते हुए दोनों पंडितों से उनका आधार कार्ड मांगा. बात बढ़ी तो मारे गुस्से के अरविंद ने अपना लाइसेंसी पिस्टल निकाल कर पहले बबिता को गोली मारी और उसके बाद दोनों पंडितों को भी गोली मार कर वहीं मौत की नींद सुला दिया. उसकी बूढी मां ने गोलियों की तड़तड़ाहट सुनी तो पोती को लेकर घर से निकल भागी मगर तीन बच्चे घर में ही रह गए. अरविंद ने बच्चों और खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और उसे समझाने की काफी कोशिश की गई. लेकिन वह बच्चों को छोड़ने के लिए राजी नहीं हुआ. यूपी एटीएस की टीम मौके पर पहुंची और दरवाजा तोड़ा गया तो अरविंद ने पुलिस पर फायर झोंक दिया. मगर पुलिस ने उसको एनकाउंटर में मार गिराया. इस गोलीबारी में उसके एक बेटे को भी गोली लगी और अस्पताल पहुंचने से पहले उसकी भी मौत हो गई. अब इस परिवार में अरविंद की बूढी मां श्यामला देवीऔर तीन बच्चे बचे हैं.

मां श्यामला देवी का कहना है कि 12 अक्टूबर 2018 को अरविंद के बड़े भाई सुनील सिंह की हत्या के बाद से अरविंद काफी परेशान रहने लगा था. वह शराब भी पीने लगा था. जिस पिस्तौल का इस्तेमाल अरविंद ने किया वह सुनील सिंह का था जो उसकी मौत के बाद अरविंद के नाम पर ट्रांसफर हुआ था.

गौरतलब है कि यह परिवार पहले से ही काफी विवादों में था. जिसके कारण परिवार के सदस्यों का मानसिक संतुलन डांवाडोल सा था. डर, तनाव, पुलिस इन्वेस्टीगेशन और कानूनी प्रक्रियाओं से जूझ रहे परिवार के सदस्यों के बीच अक्सर तू-तू मै मै होती रहती थी, और सोने पर सुहागा यह कि बहू का धर्म और कर्मकांडों पर कुछ ज्यादा ही विश्वास था.

वर्ष 2015 में बबिता ने अपने पड़ोस के दो लोगों पर बलात्कार का मामला दर्ज करवाया था. उस केस की सुनवाई से ठीक पहले बबिता के जेठ सुनील की हत्या हो गई, जिसका मामला अभी कोर्ट में लंबित है. बबिता को लगने लगा था कि सुनील भूत बन गया है और वह घर के बाकी लोगों को अपने साथ ले जाएगा, लिहाजा उसने घर में पूजा अनुष्ठान रखवाया और महामृत्युंजय जाप शुरू करवा दिया. इसमें उसकी सास की भी सहमति थी मगर उसका पति अरविंद इसका विरोध कर रहा था.

इस परिवार को दरअसल किसी ओझा-पंडित, पूजा अनुष्ठान की जरूरत नहीं बल्कि मेन्टल काउंसलिंग और इलाज की जरूरत थी. इतनी आपराधिक घटनाओं को देखने वाला कोई भी परिवार निश्चित रूप से तनावग्रस्त होता है, दिमागी हालत बिगड़ जाती है मगर रास्ते पूजापाठ से नहीं, बल्कि सही इलाज और सही कानूनी सलाह से निकलते हैं.

अरविंद तनाव में था. बबिता डर से घिरी थी जिसने परेशानियों का हल महामृत्युंजय जाप में ढूंढना चाहा. मान्यता है कि महामृत्युंजय जाप करवाने के बाद सर पर घूम रही मौत से छुटकारा मिल जाता है, मगर यहां तो उल्टा हुआ और परिवार ने अपने और पांच सदस्यों को खो दिया.

इस घटना की सबसे डरावनी तस्वीर सिर्फ गोलियों की नहीं है. डरावनी तस्वीर वह सोच है, जिसमें एक परिवार किसी व्यक्ति के असामान्य व्यवहार को बीमारी या मानसिक संकट के रूप में देखने के बजाय ‘भूत का साया’ मान बैठा था.

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि अगर किसी व्यक्ति का व्यवहार लगातार असामान्य हो रहा था, तो उसे डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास ले जाने के बजाय भूत भगाने के लिए पूजा क्यों कराई जा रही थी? धर्म में आस्था अलग बात है, लेकिन बीमारी का इलाज तो आस्था के भरोसे नहीं हो सकता है.

अंधविश्वास का मकड़जाल

भारत में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार तो धर्म के कुचक्र में बुरी तरह फंसा ही है, पढ़ा लिखा और कुलीन वर्ग भी तांत्रिकों, ज्योतिषियों, बाबाओं और झाड़-फूंक के चक्कर से बाहर नहीं है. परिवार और घरेलू जीवन में धार्मिक अनुष्ठानों की जिम्मेदारी महिलाओं पर ज्यादा है.

घर में किसी की तबीयत खराब हो, बच्चा लगातार बीमार हो, पति का व्यवहार बदल जाए, कारोबार में नुकसान हो या परिवार में लगातार कोई अनहोनी हो रही हो तो अक्सर महिलाओं से कहा जाता है, ‘कुछ पूजा करा लो’, ‘नजर लग गई होगी’, ‘किसी की छाया है’, ‘घर में बाधा है.’ यही बातें धीरे-धीरे डर में बदल जाती हैं. और डर के बाद शुरू होता है उपायों का कारोबार – ताबीज, भभूत, झाड़-फूंक, विशेष पूजा, ग्रह-शांति, आत्मा की शांति, टोना काटने के अनुष्ठान और तरह-तरह के कर्मकांड, जिसमें सिर्फ पंडितों की पौ बारह होती है.

समस्या सिर्फ इतनी नहीं थी कि बबिता पूजा और मंत्र जाप करवा रही थी, समस्या यह थी कि उसने पूजा-जाप को इलाज का विकल्प मान लिया था. जबकि महामृत्युंजय जाप से जरूरी था अरविंद को दिमागी डॉक्टर के पास लेकर जाना. अगर कोई व्यक्ति हिंसक हो रहा है, भ्रम में है, लगातार असामान्य व्यवहार कर रहा है, शराब या किसी अन्य नशे का अत्यधिक सेवन कर रहा है या परिवार को डर लग रहा है कि वह खुद अथवा किसी और को नुकसान पहुंचा सकता है, तो ऐसी स्थिति को भूत-प्रेत का साया समझना कितना खतरनाक हो सकता है, यह आजमगढ़ के भयावह गोलीकांड से साफ़ हो जाता है.

भूत जिंदा है

हम चांद पर पहुंच चुके हैं. हमारे हाथ में ऐसा फोन है जो दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी पलक झपकते सामने ला सकता है. गांवों तक इंटरनेट पहुंच चुका है. बच्चे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पढ़ रहे हैं. लेकिन 21वीं सदी में भी ‘भूत’ हमारी सोच में जिंदा है.

कोई बच्चा रात में डर जाए तो भूत. कोई महिला बीमार रहे तो नजर. किसी घर में लगातार मौत हो तो आत्मा. किसी लड़की की शादी न हो तो ग्रह-दोष. किसी पुरुष का व्यवहार बदल जाए तो ऊपरी हवा. और फिर शुरू होता है मंत्र-भभूत का सिलसिला. ये बातें हास्यास्पद तो हैं ही, कई बार यह जानलेवा हो जाती हैं.

आज भी महिलाओं के कन्धों पर अंधविश्वास का बोझ एक जिम्मेदारी की तरह रखा हुआ है. उसे बचपन से धार्मिक कर्मकांडों की सीख दी जाती है. परिवार की शांति के लिए व्रत कौन रखे? घर की बाधा दूर करने के लिए पूजा कौन कराए? बच्चे के लिए कौन मन्नत मांगे? पति की लंबी उम्र के लिए कौन उपवास करे? जवाब है – घर की महिला – मां या पत्नी.

उन्हें बताया जाता है कि घर में अगर कुछ बुरा हो रहा है तो शायद उनकी पूजा कम पड़ गई है. उनके मन में डर बैठाया जाता है. कुछ दिन बाद आजमगढ़ की घटना को केवल ‘एक सनकी आदमी ने गुस्से में अपनी पत्नी और दो पुरोहितों की हत्या कर दी और बाद में पुलिस की गोली से मारा गया’ कहकर खत्म कर दिया जाएगा, और हम उस असली सवाल से फिर बच निकलेंगे, जो इस घटना के पीछे खड़ा है – आखिर एक परिवार को यह क्यों लगा कि उसकी परेशानी का इलाज डॉक्टर के पास नहीं, बल्कि भूत भगाने और महामृत्युंजय जाप में है?

धर्म किसी को सांत्वना दे सकता है, प्रार्थना किसी को मानसिक सहारा दे सकती है. लेकिन जब किसी व्यक्ति का व्यवहार हिंसक हो रहा हो, वह लगातार डर, भ्रम या तनाव में हो, तब सबसे पहले जरूरत इलाज और काउंसलिंग की होती है. आज ज्यादा जरूरत महिलाओं को अंधविश्वास और कर्मकांडों के बोझ से मुक्त करने की है. सदियों से परिवार की सुख-शांति, पति की लंबी उम्र, बच्चों की सलामती और घर की समृद्धि का जिम्मा जो औरत उठाती चली आ रही है, अब समय है कि उसे वैज्ञानिक जानकारी और अपने फैसले लेने की आजादी भी दी जाए. आजमगढ़ में महामृत्युंजय जाप मौत को रोक नहीं सका. क्योंकि भूत-प्रेत के डर से ज्यादा खतरनाक औरतों के मन में पैठा वह अंधविश्वास है, जो असली खतरे को पहचानने से रोक देता है. Azamgarh Shooting Case

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