Jeddah Tower: सऊदी अरब आज मक्का में करोड़ों लोगों के लिए घर बना रहा है, मीना में एयर कंडीशंड टेंट सिटी बसा रहा है और जेद्दा में 1000 मीटर ऊंचा जेद्दा टॉवर खड़ा कर रहा है. यह टावर जल्द ही दुनिया की सबसे ऊँची ईमारत का ख़िताब हासिल करने वाला है. एक किलोमीटर उंची इस बिल्डिंग को देखकर इसे इस्लामिक मुल्क की उपलब्धि तो कहा जा सकता है लेकिन इस उपलब्धि में इस्लाम का कोई योगदान नहीं है. यह विशुद्ध तौर पर साइंस और टेक्नोलोजी का कमाल है.
जेद्दा टॉवर आज दुनिया की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग साइट बन चुकी है. इसे JEC टॉवर भी कहते हैं. सऊदी अरब के जेद्दा शहर में लाल सागर के किनारे बन रहे इस टॉवर की प्लानिंग 2011 में शुरू हुई थी. निर्माण 2013 में शुरू हुआ लेकिन 2018 में 63वीं मंजिल पर जाकर काम रुक गया. कारण था पैसा, ठेकेदार का विवाद और फिर कोरोना. सात साल तक यह कंकाल की तरह खड़ा रहा. फिर जनवरी 2025 में काम दोबारा शुरू हुआ. सऊदी बिनलादेन ग्रुप को 7.2 अरब सऊदी रियाल का नया ठेका मिला और टर्नर कंस्ट्रक्शन ने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट संभाला.
अब इसकी रफ्तार देखिए. हर 5 दिन में एक नई मंजिल ढल रही है. जनवरी 2026 में यह 85वीं मंजिल पर था. अप्रैल में 91वीं मंजिल और 370 मीटर की ऊंचाई पर पहुंच गया. जुलाई 2026 में इसके मालिक प्रिंस अलवलीद बिन तलाल ने खुद साइट से वीडियो डालकर बताया कि टॉवर 107वीं मंजिल और 430 मीटर पार कर गया है. सितंबर 2026 के अपडेट के अनुसार यह 454 मीटर से ज्यादा ऊंचा हो चुका है और मलेशिया के पेट्रोनास टावर्स को भी पीछे छोड़ चुका है. साइट पर 5200 मजदूर दिन रात काम कर रहे हैं और 80 लाख घंटे बिना किसी मौत के पूरे हो चुके हैं.
यह टॉवर 828 मीटर वाले बुर्ज खलीफा को जल्द पछाड़ देगा. इसकी फाइनल ऊंचाई 1000 मीटर से ज्यादा होगी. यानी 1 किलोमीटर से ऊंची दुनिया की पहली इमारत. डिजाइनर वही हैं जिन्होंने बुर्ज खलीफा बनाया था, एडरियान स्मिथ और Gordon Gill. इसकी नींव में 270 बोर पाइल हैं जो जमीन में 110 मीटर गहरी गई हैं. इसमें दुनिया की सबसे तेज लिफ्ट, 630 मीटर पर दुनिया का सबसे ऊंचा ऑब्जर्वेशन डेक, Four Seasons होटल, ऑफिस और लग्जरी फ्लैट होंगे. कंपनी का दावा है कि 2028 तक यह पूरा हो जाएगा.
अब सोचिए. यह टॉवर उसी जमीन पर बन रहा है जहां धर्म के नाम पर सदियों तक लोगों को बताया गया कि ऊंचाई पर जाना गुनाह है. टॉवर ऑफ बेबल की कहानी में लिखा है कि इंसान जब आसमान छूने चला तो खुदा ने उसकी भाषा भ्रमित कर दी लेकिन यहां विज्ञान ने उस कहानी को झूठा साबित कर दिया है. यह टॉवर दुआ से नहीं बन रहा है. यह बन रहा है हाई स्ट्रेंथ कंक्रीट से, क्लाइंबिंग फॉर्मवर्क से, विंड टनल टेस्ट से और मैथ से. धर्म तो सर ढंकने को टाट भी नहीं देता. टाट भी विज्ञान ही देता है.
धर्म कहता है कि सब ऊपर वाले की मर्जी से होता है लेकिन जेद्दा टॉवर इस बात का सबूत है कि सब इंसान की मर्जी और कैलकुलेशन से होता है. अगर दुआ से इमारत बनती तो सबसे ऊंची इमारत किसी मौलवी, पादरी या पंडे की होती लेकिन सबसे ऊंची इमारत बनने में किसी धर्म की कोई भूमिका नहीं है. यह टॉवर वहां बन रही है जहां इंजीनियर हैं, जहां पैसा विज्ञान में लग रहा है. 1000 मीटर की ऊंचाई पर हवा 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से टकराती है. वहां कोई फरिश्ता इमारत को नहीं संभालता. वहां थॉर्नटन टॉमसेटी जैसी कंपनी का स्ट्रक्चरल डिजाइन ही इस आसमान को छूती बिल्डिंग को संभालता है.
इसलिए जेद्दा टॉवर सिर्फ सऊदी अरब का प्रोजेक्ट नहीं है. यह सबूत है कि इंसान जब धर्म की चादर उतारकर विज्ञान की हेलमेट पहनता है, तब वह हर 5 दिन में एक मंजिल आसमान की तरफ बढ़ जाता है. सऊदी अरब ने मक्का में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमेन्ट किया, करोड़ों लोगो के लिए हाऊसिंग प्रोजेक्ट बनाये, मेगा सिटी बनाये और अब जेद्दा टॉवर ख़डी कर रहा है. यह सब इस्लाम के कारण नहीं विज्ञान के कारण हुआ. किसी इस्लामिक किताब में यह सब बनाने की तकनीक नहीं है. यह साइंस पर आधारित मॉडर्न इंजिनियरिंग का कमाल है.
आज मक्का में हज के लिए 10 लाख से ज्यादा एयर कंडीशंड टेंट वाली मीना सिटी है. 100 से ज्यादा टनल हैं जिनमें वेंटिलेशन सिस्टम है. मक्का मेट्रो है जो एक घंटे में 72 हजार हाजियों को ढोती है. अबराज अल बैत टॉवर है जिसमें दुनिया की सबसे बड़ी क्लॉक लगी है. यह सब किसी इस्लामिक किताब में लिखी तकनीक से नहीं बना है. कुरान या हदीस में टनल बोरिंग मशीन, HVAC सिस्टम, हाई स्पीड रेल या रिक्टर स्केल पर भूकंप रोधी बिल्डिंग का कोई नक्शा नहीं है. यह सब मॉडर्न इंजीनियरिंग, फिजिक्स और मैथमेटिक्स का कमाल है.
जेद्दा टॉवर, NEOM जैसी 500 अरब डॉलर की लाइन सिटी, रेड सी प्रोजेक्ट, यह सब सऊदी अरब सिर्फ विज्ञान और तकनीक की बदौलत ही बना पा रहा है. अगर वह 1400 साल पुरानी किताबों के भरोसे बैठा रहता तो आज भी अरब के लोग छप्पर में रहते और ऊंटों पर खजूर ढो रहे होते. सऊदी अरब के पास तेल था लेकिन उन्नीसवीं सदी के आखिर तक उसे जमीन के नीचे दबे इस खजाने के बारे पता ही नहीं था. तेल निकालने की तकनीक भी अमेरिका और यूरोप के इंजीनियरों ने दी. तेल से पेट्रोल बनाना, उससे पैसा बनाना और उस पैसे से शहर बनाना, यह पूरी चेन विज्ञान की है, दुआ की नहीं.
इस्लाम ने 1400 साल में एक सुई तक का आविष्कार नहीं कराया. कागज चीन ने बनाया, पेन इंग्लैंड ने बनाया, बिजली टेस्ला और एडिसन ने बनाई, माइक लाउडस्पीकर जिससे अजान होती है वह भी गैर मुस्लिम वैज्ञानिकों ने बनाया. मक्का की हरम शरीफ में जो मार्बल हमेशा ठंडा रहता है ताकि हाजियों के पैर न जलें, वह मार्बल भी ग्रीस से आता है और उसे ठंडा रखने की तकनीक थर्मोडायनामिक्स पर काम करती है, किसी आयत की वजह से नहीं. मक्का में करोड़ों लोगों के लिए हाउसिंग, मीना में टेंट सिटी, जेद्दा टॉवर, मेट्रो और एयरपोर्ट, यह सब इस्लाम के कारण नहीं है. यह विज्ञान की बदौलत है. जब अरब ने धर्म की किताब बंद करके लैब पर भरोसा किया तभी वह 1 किलोमीटर ऊंची इमारत बना पाया. वरना आज भी यह मुल्क रेत में ऊंट के निशान देखकर रास्ता ढूंढ रहा होता. Jeddah Tower





