सत्य निकेतन हादसा भ्रष्ट सिस्टम की देन है या सरकार की धार्मिक मानसिकता से भी इसका कोई कनेक्शन है यह सवाल संभव है असहजता पैदा करने बाला लगे लेकिन है वजनदार जिसका जबाव ढूंढने इस हादसे से परे कई पहलुओं पर चिंतन मनन करने से मिलता भी है. लेकिन इसके पेरेलल चलने बाला सच यह भी है कि सात मौतों की सीधी जिम्मेदारी एमसीडी और पीजी संचालकों की बनती है.

`नियमानुसार` हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली में एमसीडी ने प्री मानसून सर्वे के तहत कोई 30 लाख इमारतों का सर्वे किया था. यह सर्वे रुटीनी तौर पर मार्च से जून के बीच किया जाता है जिसका मकसद बिल्डिंगों की फिटनेस आंकना और जांचना होता है. यह कम हैरत की बात नहीं कि इस अहम सर्वे में महज 62 इमारतों को ही खतरनाक स्तर का पाया गया था. लेकिन सत्य निकेतन इलाके की कोई भी बिल्डिंग उनमें से एक नहीं थी. एमसीडी ने अपनी शुरूआती रिपोर्ट में यह माना था कि इस कालोनी की प्रापर्टियों के खिलाफ कोई रिकार्ड बुकिंग या सीलिंग का नहीं है और कोई शिकायत भी नहीं मिली थी

बुकिंग और सीलिंग की शिकायत के न होने का सीधा सा मतलब यह होता है कि बिल्डिंगों में कोई अवैध निर्माण मसलन बिना इजाजत अतिरिक्त निर्माण, बेसमेंट में बदलाब और मंजिलों को बढ़ाना बगैरह नहीं थे. और न ही इस बाबत एमसीडी ने पहले कभी कोई काररवाई की थी. यानी एमसीडी के रिकार्ड में सत्य निकेतन इलाके की हरेक बिल्डिंग पाक साफ़ दर्ज है. अगर ऐसा कुछ होता तो एमसीडी इमारत को या उसके उस हिस्से को सील कर देता

एमसीडी के रिकार्ड में सत्य निकेतन का सबसे बड़े पीजी में से एक हास्टल डेज नाम की पाक साफ़ बिल्डिंग बीती 6 सितम्बर को कैसे कब्रगाह में तब्दील हो गई यह समझने से पहले यह जानना बेहद अहम है कि एमसीडी की इमारत सुरक्षा नीति मुख्य रूप से डीएमसी एक्ट यानी दिल्ली म्यूनिसपल कारपोरेशन एक्ट 1957 और यूनिफाइड बिल्डिंग बाय – लाज 2016 पर आधारित है इसके प्रमुख प्रावधान कुछ इस तरह हैं
1 – डीएमसी एक्ट की धारा 348 के तहत अगर कोई इमारत जर्जर असुरक्षित या लोगों के लिए खतरनाक पाई जाती है तो एमसीडी उसे खतरनाक घोषित कर सकती है.
2 – इसी एक्ट की धारा 349 के तहत एमसीडी को उस इमारत को खाली कराने का अधिकार है और
3 – बिल्डिंग मालिक को मरम्मत या बिल्डिंग को ध्वस्त कराने का नोटिस दिया जाता है. अगर मालिक नोटिस के मुताबिक काररवाई नहीं करता है तो एमसीडी को इसे ध्वस्त करने का अधिकार है. जिसका खर्च बिल्डिंग मालिक से ही वसूला जाता है.

सत्य निकेतन की कुंडली में अमंगल

दिल्ली के दक्षिण पश्चिम जिले में स्थित सत्य निकेतन कालोनी दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ केम्पस से पैदल दूरी पर स्थित है. मोती बाग़ इलाके के तहत आने बाला सत्य निकेतन सैन मार्टिन मार्र्ग और नानकपुरा के बीच में है, जिसके एक तरफ रिंग रोड है. यह इलाका आवासीय भी है और व्यवसायिक भी है जो डीयू सहित आधा दर्जन कालेजों के छात्रों की आवाजाही से गुलजार रहता है
स्टूडेंट हब में तब्दील हो गए इस पूरे इलाके के इर्द गिर्द कालेजों की भरमार है. श्री वेंकटेश्वर कालेज तो इसके ठीक सामने ही है अलावा इसके मैत्री कालेज, जीसस एंड मेरी कालेज, एआरएसडी कालेज, मोतीलाल नेहरु कालेज और राम लाल आनंद कालेज भी इसके बेहद नजदीक हैं.

यहाँ का सत्य निकेतन मार्केट अपने बजट फ्रेंडली कैफे, रेस्टोरेंट्स और स्ट्रीट फूड्स के लिए दिल्ली भर के युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है. इस इलाके में पीजी और होस्टल्स की भरमार है. बॉयज होस्टल डेज उन्हीं में से ही एक है. पीजी की भरमार है इसका यह मतलब नहीं कि सभी छात्रों को आसानी से कमरा मिल जाता है. न केवल इस इलाके में बल्कि पूरे देश में डिमांड एंड सप्लाई की थ्योरी लागू होती है कि इतने पीजी कहीं नहीं हैं कि पढ़ने बाले सभी छात्रों को आसानी से रहने ठिकाना मिल सके. इस मांग को पूरा करने के चक्कर में ही कमरों के नाम पर दडबे बन रहे हैं. जिनमे छात्र भेड़ बकरियों की तरह ठुंसे डाक्टर, कलेक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट और सीए बगैरह बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए बदहाली से समझौता करने के नाम पर घुटने यह सोचते टेक देते हैं कि बस तीन चार साल ही की तो बात है. इसके बाद तो रहने को शानदार मकान फ्लेट या सरकारी बंगला मिल ही जाएगा.

यह समझौता कभी कभी कितना महंगा पड़ता यह बीती 6 सितबर को जाहिर हुआ. इस दिन देश भर में उस वक्त हडकम्प मच गया जब हास्टल डेज के ढहने की खबर जंगल की आग की तरह फैली. शुरूआती खबरों में पांच मौतों की बात सामने आई जो तीसरे दिन बढ़कर सात हो गई. इनमे से पांच छात्र और दो मजदूर थे. 6 सितम्बर को 20 के लगभग लोग इसके मलबे में दबे थे .
हल्ला मचा तो न केवल हास्टल डेज बल्कि पूरे सत्य निकेतन की जन्म कुंडली सामने आई.

एमसीडी के पंचांग पोथों के मुताबिक इसमे कोई दोष नहीं था. लेकिन असली कुंडली के ग्रह नक्षत्रों पर गौर करें तो एमसीडी की कुंडली पूरी तरह फर्जी निकली. सारी इमारतों के इतिहास की जिम्मेदारी सँभालने बाले एमसीडी में यह ही दर्ज नहीं है कि सत्य निकेतन का निर्माण कब हुआ था. अलबत्ता यह जरुर सामने आया कि इसका जन्म यानी निर्माण वर्ष 1965 से 1970 के बीच कभी का है. उस दौर में दिल्ली विकास प्राधिकरण यानि डीडीए ने इसे झुग्गी झोपडी हटाने की योजना के तहत बसाया था. तब इसे जेजे कालोनी के नाम से जाना जाता था.

तब यहाँ के झुग्गी वासियों को 40 से लेकर 55 वर्ग गज के प्लाट अलाट किए गए थे. मूल योजना में ग्राउंड फ्लोर और एक मंजिल मकान बनाने का ही प्रावधान या अनुमति थी. साल 1973 में जब यहाँ डीयू के साउथ केम्पस बनने की शुरुआत हुई तो इलाके की जमीन की कीमतें और अहमियत दोनों बढ़ने लगे. 1980 में साउथ केम्पस तैयार हो गया तो इलाके का हुलिया और नक्शा भी बदलने लगे. देखते ही देखते झुग्गी झोपडी पुनर्वास योजना के तहत बना यह इलाका आधुनिक हो गया.

झुग्गी झोपड़ियों की जगह पक्के एक मंजिला मकानों ने ले ली.
सत्य निकेतन की शक्ल पूरी तरह बदलना शुरू हुई 2011 से जब सरकार ने इसे फ्री होल्ड घोषित कर दिया. देखते ही देखते ही बहुमंजिला इमारतें बनने लगीं और होस्टल पीजी भी इफरात से आकार लेने लगे. क्योंकि देश भर से आने बाले छात्रो की तादाद हर साल बढ़ रही थी जिन्हें केम्पस के नजदीक ही रहने के लिए कमरे चाहिए रहते थे. बहुत जल्द ही इलाके को स्टूडेंट हब का ख़िताब हासिल हो गया.

दिलचस्प है मोची से मोती बाग़ तक का इतिहास

हादसे बाली इमारत हास्टल डेज जिसका साइज 55 गज था भी उन 299 इमारतों में से एक थी जिसे किसी झुग्गी झोपडी बाले से मौजूदा मालिक उर्मिला गुप्ता पत्नी हरिराम गुप्ता के नाम से साल 1982 में ख़रीदा गया था. कितने में और किससे ख़रीदा गया था इसका जिक्र भी एमसीडी के रिकार्ड यानी पोथे पत्रों में नहीं है. इसी वक्त में मोची बाग़ जिसे अब मोती बाग़ या साउथ मोती बाग़ के नाम से जाना जाता है के साथ साथ नानकपुरा भी पुनर्वास क्षेत्र के रूप में विकसित हो रहे थे. लेकिन पीजी और किराए के मकान सत्य निकेतन इलाके में ज्यादा बने

ब्रिटिश काल और आजादी के वक्त तक सत्य निकेतन लगभग गाँव था. जिसमे खेत खलिहान और किसानो और मजदूरों की गरीबी और बदहाली बयां करते झोपड़े नजर आते थे. इसके और बहुत पहले मुगल काल में जहाँगीर ने इस इलाके को रोहतक के रहने बाले रामदास मोची नाम के शख्स को तोहफे में दिया था.

एक उर्दू लेखक और एएसआई यानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन अधिकारी मौलवी जफर हसन की साल 1919 में लिखी किताब `मूमेंट्स आफ दिल्ली` में इसका जिक्र मिलता है कि मूलतः यह एक बड़ा बाग़ था जिसके एक तरफ पत्थरों की दीवार थी और बीचों बीच कोई 120 वर्ग फीट का तालाब हुआ करता था. इसके पीछे बने एक कुए के पास एक शिलालेख में फारसी में लिखा था कि इसे रामदास मोची ने जहाँगीर के शासन काल ( यानी 1605 और 1627 के बीच कभी ) में बनबाया. इसी मोची सरनेम के चलते इसे अरकपुर मोची बाग़ या गाँव कहा जाने लगा.

इस इतिहास के अगले महत्वपूर्ण अध्याय में दर्ज है कि अंग्रेजो को यहाँ रहने बालों पर दया आई तो उन्होंने गरीब, मजदूर और किसानो को प्रति परिवार 40 वर्ग गज के प्लाट एलाट कर दिए. एवज में इन परिवारों से हर महीने महज एक आना टेक्स लिया जाने लगा जिसे `चूल्हा टेक्स` नाम दिया गया था. जातिगत इतिहास में दिलचस्पी रखने बालों को यह बात भी अहम साबित हो सकती है कि वाल्मीकि समुदाय के लोगों को इस टेक्स के दायरे से बाहर रखा गया था. इसे मौजूदा क्रीमी लेयर विवाद या चर्चा से जोड़कर देखा जाना अप्रासंगिक नहीं होगा. कि दलितों में जो महादलित होते हैं वे महागरीब भी होते हैं.

यह चूल्हा टेक्स टेक्स आजादी मिलने के बाद 1957 तक जारी रहा. इसके बाद सरकार ने अरकपुर बाग़ मोची गाँव के वाशिंदों के लिए लीज पर दे दिया. मोची बाग़ गाँव नाम से चूँकि `शूद्रियत` की बू आती थी इसलिए इसे मोती बाग़ नाम से जाना जाने लगा. यह और बात है कि नाम बदलने से गरीबी और बदहाली नहीं बदल गई. इस इलाके में रहने बाले अधिकतर लोग गाँव के नाम के मुताबिक मोची और दूसरे दलित समुदायों के ही थे. जिनके हिस्से में पौराणिक ग्रंथो के मुताबिक ऊँची जाति बालों की सेवा खुशामद का काम आया था.
गरीबों का पलायन

1960 के शुरुआत में सरकार ने अपने अधिकारियों के लिए आनंद निकेतन बनाना शुरू किया तो इसके यानी आनंद निकेतन के आसपास रहने बाले अवैध निवासियों को नजदीक ही जिस झुग्गी झोपडी यानी जेजे कालोनी में बसाया. वही इलाका आज का सत्य निकेतन कहलाता है. यहाँ के अधिकतर गरीब दलित अपने पूर्वजों की तरह आनंद निकेतन के साहबों के यहाँ पौराणिक धर्म निभाते बतौर सेवक काम करने लगे.

1968 के लगभग डीडीए ने सत्य निकेतन के लिए एक योजना बनाई जिसके तहत यहाँ के वाशिंदों को 40 वर्ग गज के प्लाट इस शर्त के साथ एलाट किए गए कि बनने बाले तमाम मकान एक मंजिला ही होंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं जिसके जिम्मेदार मकान मालिक, तेजी से पनपता पीजी माफिया और एमसीडी तीनों थे

सत्य निकेतन इलाके की गरीबी दूर होती दिखाई देने लगी क्योंकि गरीबो ने अपने प्लाट व कच्चे पक्के मकान उर्मिला गुप्ता पत्नी हरिराम गुप्ता जैसे दूरदर्शियों को बेचने शुरू कर दिए थे. जिन्हें इस इलाके में एक बेहतर व्यवसाय और तगड़ा मुनाफेदार आर्थिक भविष्य नजर आ रहा था. इन खरीददारों की सहूलियत के लिए थोक में जमीन जायदाद के दलाल यानी ब्रोकर्स भी सक्रिय हो गए जो गरीबों को सब्ज बाग़ दिखाते और लगभग मुफ्त के भाव मिली जमीनों को बेचने के फायदे गिनाते थे.

इनके झांसे में आते गरीब जमीन के अपने टुकड़ों और मकानों के उम्मीद से ज्यादा दाम लेकर बाहरी इलाकों में शिफ्ट होने लगे. कुल जमा हुआ यह कि डीयू के आने से गरीबी दूर नहीं हुई सत्य निकेतन इलाके के गरीब दूर हो गए. वक्त गुजरते सत्य निकेतन में उपर बताए मुताबिक निर्माण होने लगे. लेकिन इनमे से अधिकतर बिना एमसीडी की अनुमति के बने थे यानी अवैध निर्माण थे. तब भी एमसीडी के कान पर जूं नहीं रेंगी थी.

नए मकान मालिकों ने अपनी मनमर्जी से मकान बनाए और एमसीडी ने बनने दिए. जाहिर यह बगैर घूसखोरी के मुमकिन नहीं था. इसी घूसखोरी के चलते पहले एक मंजिला मकान दो मंजिला और तीन मंजिला में तब्दील होते चले गए और फिर चार पांच माले के हो गए जैसे कि हास्टल डेज भी हुआ.
शुरू से लापरवाह रहा एमसीडी

अब सत्य निकेतन दिल्ली का अहम हिस्सा हो गया, लेकिन यहाँ के हाल बेहाल ही रहे. तंग गलियां, बेतरतीब बने मकान, छतों के उपर झूलते बिजली के तार, गंदगी और अतिक्रमण इसकी भी तकदीर हो गए. एक अदद कमरे के सिवाय जरूरत की हर चीज यहाँ भी आसानी से मिलने लगी.इस मार्किट में चाय समोसे और छोले भटूरे सहित चाइनीज फूड्स की दुकानें इफरात से हैं.
नए मकान मालिकों ने लालच और ज्यादा आमदनी के लालच में मुंबई की चालों और खोलियों की तर्ज पर दडबेनुमा छोटे छोटे कमरे बनाना शरू कर दिए. इनमे न तो वेंटीलेशन की व्यवस्था की गई और न ही सलीके से इन्हें बनाया गया. वजह हर तरह की मिली छूट और किसी निगरानी का न होना थी. लागत कम करने की गरज से कन्स्ट्रक्शन मटेरियल भी अधिकतम घटिया क्वालिटी का इस्तेमाल किया गया

एमसीडी ने कभी ऐसी घटिया और कमजोर इमारतो और उनके मालिकों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया क्योंकि इसकी उसे मुंहमांगी कीमत घूस की शक्ल में मिलती थी. जाहिर है डेज हास्टल के गुप्ता दंपत्ति से भी मिली होगी. क्योंकि इमारत नम्बर पी – 14 यानी डेज हास्टल में कोई 2 साल पहले 2 मंजिलें और बनाई गई थीं. इस इमारत के बेसमेंट में बारिश का पानी जमा था. हादसे के लगभग 15 दिन पहले से बेसमेंट में मरम्मत और ग्राउंड फ्लोर में बदलाब के नाम पर जगह बढ़ाने का काम शुरू किया गया था. चूँकि नींव पुरानी और कमजोर हो गई थी इसलिए अतिरिक्त भार बर्दाश्त नहीं कर पाई और भरभराकर ढह गई.

हादसे के दिन इतवार की छुट्टी थी इसलिए अधिकतर छात्र लंच लेने के बाद अपने अपने कमरों में ही थे. इस पांच मंजिला बिल्डिंग में कुल 8 कमरे हैं जिनमे 16 छात्र रह रहे थे. इनमे से 5 की मौत हो गई. मरने बाले युवाओं में चंदौली उत्तरप्रदेश का अभिषेक कुमार और ओरिया का पवन कुमार, छत्तीसगढ़ के दुर्ग का युवराज सोनी, मध्यप्रदेश के देवास का अर्पित जाज और कटनी का अक्षत सिंह यादव शामिल हैं. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके पेरेंट्स और परिवार बालों पर क्या गुजरी होगी. सुरिन्दर सिंह और परम लाल कोरी नाम के दो मजदूरों की कब्र भी डेज हास्टल का मलबा बन गया.

मौत से रूबरू हुए ये युवा

बचे हुए जिन छात्रों ने मौत को बेहद नजदीक से गुजरते देखा उनमे से दो नीतिश छिब और नीरज बाबा हैं. इन दोनों के मुताबिक दोपहर का खाना खाकर हम अपने कमरे में बैठे थे कि तभी अचानक से हमें तेज पानी बहने जैसी आवाज सुनाई दी. पहले तो हम इसे सामान्य बात समझते रहे लेकिन यह आवाज बढ़ती गई तो हम घबरा गए.इसी घबराहट में हम दोनों सीढ़ियों से नीचे भागने लगे, लेकिन नीचे पहुँच पाते इसके पहले ही इमारत भरभराकर गिर गई.

चंद सेकेंडों बाद ही इन्होने खुद को मलबे तले दबा पाया. दोनों की हालत खराब थी. नीतिश के उपर कांक्रीट का वजनी स्लेब गिरा था. लेकिन इत्तफाक से स्लेब और कांक्रीट के बीच एक छोटा सा गेप बन गया था जिसमे से वह सांस ले पा रहा था और यहीं से मदद की गुहार लगा रहा था. हम दोनों एक दूसरे की तरफ देख भी नहीं पा रहे थे, नीतिश बताता है, लेकिन एक दूसरे की आवाज सुन पा रहे थे. मैंने जैसे तैसे खुद को सँभालते एक सीनियर को फोन कर कहा भाई हम मर रहे हैं. और अपनी लोकेशन भेजी. इसके बाद भी हम मलबे में कोई डेढ़ घंटे दबे जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे. इलाज के बाद नीतिश को अस्पताल से छुट्टी मिल गई लेकिन गंभीर चोटों के चलते नीरज को अस्पताल में ही भर्ती रहना पड़ा.

मलबे के नीचे दबे एक और छात्र आदित्य कुमार ने तुरंत ग्यारह सेकंड का एक एसओएस वीडियो बनाकर अपने परिजनों को भेजा. जिसमे उसका चेहरा धूल, मिटटी और खून से सना साफ़ नजर आ रहा था. आदित्य ने अपनी बहन को फोन कर कहा था मैं मलबे में दबा हूँ मुझे बचा लो, मेरे फोन की बेटरी भी खत्म हो रही है. यह वीडियो बहुत तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिससे उसकी लोकेशन पहचानने में मदद मिली. चोटों के चलते राणा सांगा बन गए आदित्य को भी इलाज के बाद छुट्टी मिल गई. लेकिन इस हादसे के सदमें से कभी छुट्टी उसे मिलेगी ऐसा कहने की कोई वजह नहीं.
खबर फैली तो डेज हास्टल और सत्य निकेतन के आसपास भीड़ जमा हो गई और जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. धीरे धीरे हादसे से ताल्लुक रखती तमाम बातें उधड़ते सामने आने लगीं मसलन यह कि यह तो एक न एक दिन होना ही था. लेकिन पांच बच्चे और दो मजदूरों की मौतों की शर्त पर होगा इसका अंदाजा किसी को नहीं था और यह भी कि हास्टल डेज का ढांचा कुछ ज्यादा ही कमजोर था.

इमारत बीम और मजबूत आरसीसी पिलर्स के बिना केवल लोड बियरिंग दीवारों के सहारे बनाई गई थी. चंद घंटो में नेताओं के बयान भी सामने आने लगे. जिनमे राहुल गाँधी और अभिजीत दीपके भी शामिल थे. हादसे की खबर सुनते ही दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी मौके पर पहुंची और बयान दिया कि यह 40 – 50 साल पुरानी इमारत है जिसके बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर पर अवैध रूप से तोड़फोड़ और मरम्मत का काम चल रहा था. बेसमेंट में पानी जमा होने से दीवार व पिलर खिसक गए जिससे यह हादसा हुआ. अच्छा तो उनका यह न कहना रहा कि चूँकि यह इमारत नेहरु कांग्रेस और इसके बाद अरविन्द केजरीवाल के दौर में बनी थी इसलिए गिर गई इसमें एमसीडी का क्या दोष

पर जल्द ही हकीकत समझते वे एमसीडी पर गरजती भी नजर आई कि जो फंड आता है वह कहाँ जा रहा है क्या जेब में रखने के लिए ..तुम्हारी और बदतमीज हो तुम लोग बगैरह बगैरह. जाहिर है झल्लाई मुख्यमंत्री ने मान लिया था कि एमसीडी में घूस का बोलबाला है और फंड्स में भी गड़बड़झाला होता है. फिर रिवाज के मुताबिक जांच, बर्खास्तगियों, घोषणाओ और गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया मकान मालिक 81 वर्षीय हरिराम गुप्ता, उनकी पत्नी उर्मिला गुप्ता और डेज हास्टल का प्रबंधन संभाल रहे उनके बेटे महेश गुप्ता के साथ साथ सनोज गुप्ता नाम के लेबर कांट्रेक्टर को भी गिरफ्तार किया गया. जिसका गुनाह लालची मालिकों से कमतर नहीं था कि उसने इमारत की मुख्य लोड बियरिंग दीवार को ही तुडवा दिया था. जबकि इमारत में पिलर ही नही थे गिरफ्तार सुधांशु लवनीश और उसके पार्टनर शुभम त्यागी को भी किया गया जो डेज हास्टल को एक साल से लीज पर चला रहे थे.

इस हादसे से पूरा देश स्तब्ध रह गया और हर कोई बिल्डिंग मालिक को कोसता नजर आया लेकिन यह सवाल भी हर किसी के जेहन में था कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई. बिल्डिंग कमजोर थी तो उसके रिनोवेशन की परमीशन क्यों दी गई और हैरानी लोगों को इस बात पर भी हुई कि इसमें रह रहे छात्र इतने छोटे भी नहीं थे कि उन्हें यह हकीकत न दिख रही हो कि वे एक कमजोर और जर्जर पीजी में रह रहे हैं जिसका बेसमेंट खोदा जा रहा है.

अब तक चूँकि एमसीडी अमले की कारगुजारियां और लापरवाही भी सामने आने लगी थी इसलिए उसके आठ अधिकारीयों को सस्पेंड कर दिया गया. जिनमे डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार, सुपरिटेडिंग इंजीनियर रणवीर सिंह, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ललित कुमार गोयल, असिस्टेंट इंजीनियर सुनील चौहान और जूनियर इंजीनियर आशीष कुमार प्रमुख हैं. इसके बाद जांच आगे बढ़ी तो एक और असिस्टेंट इंजीनियर रविन्द्र कुमार सहित दो और जूनियर इंजीनियर्स सुमन सौरभ व मोहित यादव को भी सस्पेंड कर दिया गया.

इस गिरोह पर आरोप ये हैं कि इन्होने अवैध निर्माण पर चुप्पी साधे रखी जो 50 साल पुरानी इमारत पर अनियमित अन्तराल से हो रहा था. इमारत पांच मंजिला हो गई लेकिन इन्होने कोई काररवाई नहीं की और न ही निरीक्षण किया. लेकिन इनसे भी अहम बात मानसून के दौरान या उससे पहले इलाके की जर्जर और खतरनाक इमारतों का स्ट्रक्चरल सेफ्टी आडिट नहीं कराया गया था.
पर अमला है कहाँ

हकीकत में आडिट और सर्वे अक्सर न केवल दिल्ली बल्कि देश भर में कागजी होते हैं. जिन्हें पिछले साल की बिना पर नगर निगम अमला आफिस में ही बैठे बैठे संपन्न कर लेता है. अगर अकेला यह काम या जिम्मेदारी ही ईमानदारी से पूरी होने लगे तो सत्य निकेतन जैसे हादसे होने की कोई वजह नही रह जाएगी. मिसाल दिल्ली की ही लें तो उसमे 250 वार्ड हैं जिनका प्री मानसून सर्वे करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी ही नहीं हैं.

इस अहम सर्वे की अहम जिम्मेदारी जूनियर इंजीनियर की होती है जो अघोषित रूप से टेक्निकल टीम लीडर होता है. एमसीडी में जूनियर इंजीनियर के स्वीकृत पद 834 के लगभग हैं जिनमे से लगभग 25 फीसदी खाली पड़े हैं. लेकिन इसकी जानकारी एमसीडी की वेब साइट में दर्ज नहीं है. साल 2025 में एक आरटीआई जानकारी के मुताबिक एमसीडी में इंजीनियर्स के कुल स्वीकृत पद 1385 थे जिनमे से 216 खाली पड़े थे. जूनियर इंजीनियर्स के खाली पदों की संख्या 64 थी

क्या इतना कम अमला प्री मानसून सर्वे जैसा अहम काम कर सकता है इसका जबाब हाँ में तो किसी भी सूरत में नहीं निकलता. वजह एक वार्ड में औसतन 12 हजार इमारतें दिल्ली में हैं. जिनके सर्वे के लिए लगभग 15 मेम्बर्स की टीम बनाई जाती है. चार महीने में छुट्टियाँ काट दें तो कुल कार्य दिवस सौ बचते हैं. यह कागजों में ही मुमकिन है कि महज 15 कर्मचारी सौ दिन में 12 हजार यानी एक दिन में 120 इमारतों का सर्वे कर लें. ऐसे में सत्य निकेतन जैसे हादसों का ठीकरा केवल मकान मालिक के सर फोड़ा  जाना व्यवहारिक और न्यायसंगत तो कतई नहीं कहा जा सकता. उसे तो कानून की भाषा में सह अभियुक्त कहा जाना चाहिए. मुख्य अभियुक्त तो एमसीडी ही होना चाहिए. रही बात जूनियर इंजीनियर की तो वह किसी भी नगर निगम में पसरी घूसखोरी की सबसे अहम कड़ी होता है. वजह फिर उसका निर्मार्ण कार्यो से कोई सरोकार नहीं रह जाता उसे इंस्पेक्टरी में मजा आने लगता है क्योंकि इसमें पैसा, रुतबा और रसूख तीनों होते हैं.

इस पद की अहमियत बखान करते भोपाल नगर निगम के एक जूनियर इंजीनियर ने ही ज्ञान या सार की बात यह बताई कि दहेज़ के बाजार में एक जूनियर इंजीनियर की कीमत मरी गिरी हालत में कम से कम 25 लाख रु होती है.

ज्यादा छात्र – कम होस्टल- ज्यादा नियम क्यों

सत्य निकेतन हादसे के बाद कई अहम लेकिन चिंताजनक हकीकतों में से एक यह भी उजागर हुई कि न केवल दिल्ली बल्कि देश भर के सरकारी कालेजों में हास्टल्स न के बराबर हैं. जिसके चलते हर शहर यहाँ तक कि कस्बों में भी पीजी का चलन और मांग बढ़ रहे हैं. ये पीजी देखा जाए तो एक महती सहूलियत के अलावा पढ़ने बाले छात्रों के लिए किसी वरदान से कम नहीं.यह और बात है कि यह वरदान अधिकतर जगहों पर नारकीय है.

अब अगर सरकार हास्टल्स बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही तो यह उसकी मजबूरी नहीं बल्कि भगवा एजेंडा है कि कम से कम बच्चे पढ़ें और दिमागी नक्सल न बनें. पढ़ नहीं पाएंगे तो झख मारकर कांवड़ यात्राओं की भीड़ बढ़ाएंगे, गणेश और दुर्गा काली की झांकियां लगायेंगे, भंडारे कराएँगे, हनुमान चालीसा और सुंदर कांड के पाठ जगह जगह आयोजित करवाएंगे.

लेकिन अगर शिक्षित हो गए तो जंतर मंतर जैसे प्रोटेस्ट का हिस्सा बनकर मंत्री का इस्तीफ़ा दिलवाने मजबूर कर देंगे , शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करेंगे, धार्मिक ढोंग पाखंडॉ पर तार्किक हमला करेंगे, उनकी बखिया उधेंडेगे. इससे भी बड़ी दिक्कत यह कि स्कूल कालेज और हास्टल पीजी की उपलब्धता अगर आसान रही तो लड़कियां भी तेजी से शिक्षित होंगी. फिर ये धार्मिक आयोजनों की कलश यात्रा में शामिल नहीं होंगी और न ही बाबाओं की कथाओं की जीनत बनेगी. कुल जमा धंधा विप्रो का मारा जाएगा जो मौजूदा सरकार को रत्ती भर भी बर्दाश्त नहीं.

आंकड़ो की जुबानी दिल्ली के सरकारी कालेजों के हाल देखें तो सबसे बड़े शिक्षण संस्थान डीयू में कुल 7210 सीटें हास्टल्स में उपलब्ध हैं जो सभी भरी हुई हैं .दिल्ली के कुल 188 में से 91 कालेज डीयू के तहत आते हैं जिनमे से सिर्फ 20 में ही हास्टल सुविधा है. डीयू में पढ़ रहे कुल छात्रों की संख्या 6 लाख 21 हजार से भी ज्यादा है जिसमें से नियमित छात्रों की संख्या 2 लाख 51 हजार के लगभग है. इनमे से लगभग एक लाख को हास्टल चाहिए ही चाहिए क्योंकि वे दूसरे शहरों से पढ़ने आए हैं. जाहिर ये सभी उन 3 फीसदी छात्रों जैसे किस्मत बाले नहीं जिन्हें केम्पस हास्टल मिल पाता है.

साल 2024 – 25 में 30 हजार से भी अंडर ग्रेज्युएट छात्रों ने हास्टल के लिए आवेदन दिया था जिनमे से महज 3 हजार को ही सरकारी हास्टल नसीब हुआ. बाकियों को सत्य निकेतन जैसे इलाकों में बने पीजियों की शरण लेने मजबूर होना पड़ा जहाँ दडबेनुमा कमरे के एक बेड के औसतन 12 हजार रु देना पड़ते हैं. इसका यह मतलब नहीं कि बाहर रहकर पढ़ रहे छात्रों का काम इतने में ही चल जाता है हकीकत में एक छात्र की पढ़ाई पर औसतन 40 हजार रु पेरेंट्स को खर्च करना पड़ते हैं जिसमे कालेज फीस, कपडे, प्रेक्टिकल, प्रोजेक्ट्स ट्रांसपोर्ट और बच्चों की दीगर जरुरी खर्चे शामिल हैं. लगभग 5 लाख रु साल खर्च करने के बाद भी अच्छी नौकरी मिलने की गारंटी अब इस देश में नहीं रही.

अब लाख टके का सवाल यह कि कम हास्टल्स के बाबत सरकार को कोसा जाए या कुकरमुत्ते से उग रहे पीजियों के बाबत उनके मालिकों को दोष या धन्यवाद में से कोई एक दिया जाए जो सत्य निकेतन के हास्टल डेज सरीखे हैं. ये मनमाना किराया वसूलते हैं और एवज में सहूलियतें न के बराबर देते हैं. इस तराजू पर पीजी मालिकों का पलड़ा इस लिहाज से सरकार पर भारी पड़ता है कि वे छात्रों को उनके सपने पूरे करने का महंगा ही सही मौका तो देते हैं जिसको देने और पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार की बनती है.

इस लिहाज से तो सरकार को पीजी मालिकों की पीठ थपथपाना चाहिए उन्हें प्रोत्साहन और पुरुस्कार देना चाहिए. सबसीडी दे तो और स्वागत योग्य बात होगी क्योंकि वे वह सहूलियत छात्रों को मुहैया कराते हैं जो सरकार नहीं दे पा रही. मौजूदा सरकार तो जानबूझकर नहीं दे रही. इतना भी नहीं कर सकती तो इतना भर कर दे कि जो लोग पीजी बनाएं उन्हें नगर निगम के चक्कर मंजूरी और नक्शा पास करवाने न काटना पड़ें. वे इस काम को स्वतंत्र आर्टिटेक्ट से करवा लें इसमें सरकार और उसकी एजेंसियां टांग नहीं अड़ाएंगी.

पीजीज की मांग लगातार बढ़ रही है लेकिन वे मांग के मुकाबले बन कम रहे हैं. क्योंकि इन्हें बनाने में दर्जनों तरह के नियम कायदे कानून आड़े आते हैं. इसलिए बुद्धिमान लोग अक्सर नए पीजी नहीं बनाते क्योंकि उनकी लागत इन नियमों जो घूसखोरी के जनक हैं के चलते डेढ़ गुना तक बढ़ जाती है. यह भविष्य में और भी बढ़ सकती है क्योंकि दिल्ली सरकार के प्रस्तावित `पेईंग गेस्ट अकोमोडेशन रेगुलेशन एंड सेफ्टी बिल 2026` के मसौदे के मुताबिक पीजी संचालकों को पुलिस वेरीफिकेशन अनापत्ति प्रमाणपत्र स्ट्रकचरल और फायर सेफ्टी को कवर करने बाली नगरपालिका मंजूरी और क्षेत्रीय

प्रशासनिक अधिकारियों की मंजूरी प्राप्त करना जरुरी होगा.इस प्रस्ताव में हैरतअंगेज अंदाजा यह जताया गया है कि दिल्ली में 2 लाख के लगभग पीजी हैं. पीजी की संख्या का सच जो भी हो लेकिन अब आधा दर्जन के लगभग सरकारी दफ्तरों में घूस देना पड़ेगी जो जाहिर है संचालक निर्माण लागत में जोड़ते छात्रों से ही वसूलेंगे. यह सोचना फिजूल की बात है कि एवज में सरकार इस बात की गारंटी और जिम्मेदारी लेगी कि अगर भविष्य में सत्य निकेतन सरीखे हादसे हुए तो इसकी जिम्मेदारी अकेले उसकी होगी.

हर शहर में सत्य निकेतन की तर्ज पर पीजी ज्यादा फल फूल रहे हैं. आमदनी के लिए लोग मौजूदा मकान में ही दो चार कमरे ज्यादा बनाकर उन्हें छात्रो को किराए पर देना फायदे का सौदा समझते हैं. 90 के दशक से कोचिंग केपिटल कोटा से शुरू हुआ यह ट्रेंड देश भर में फ़ैल चुका है . लेकिन जिन्होंने इसे व्यवसाय के तौर पर अपना लिया है वे भी सरकारी नियमों के झंझट में पड़ने से बचते हैं जैसे कि हरिराम गुप्ता और उनका परिवार बचता रहा था. मिसाल मध्यप्रदेश के इंदौर की लें तो वहां के अकेले विजय नगर इलाके में ही थोक में पीजी हैं जिनके एक बेड का औसत किराया मय खाने सहित दस हजार रु है.

ऐसे ही एक पीजी संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर इस प्रतिनिधि को बताया कि 15 कमरों बाले पीजी से सीधे सीधे तीन लाख रु की आवक होती है जिसमे से लगभग एक लाख ही खाने और मेंटेनेंस पर खर्च होते हैं. लेकिन अखरते हमे वे 20 – 30 हजार रु हैं जो बतौर घूस पुलिस और नगर निगम बालों को देना पड़ते हैं. इन लोगों को कानूनन अनाप शनाप अधिकार मिले हुए हैं जिनका नगदीकरण ये हर पीजी से कराते हैं. इसके बाद भी महज पांच साल में इस संचालक ने दो और पीजी बना लिए हैं और दो और 75 हजार रु महीने की लीज पर लिए हुए हैं.

इस संचालक के मुताबिक एक पीजी की तीन साल की इनकम से एक दूसरा नया पीजी आसानी से खड़ा किया जा सकता है. इन्दोर में ही एक संचालक के तो एक दो नहीं बल्कि दर्जन भर पीजी हैं और सभी बारह महीनों भरे रहते हैं. क्योंकि यहाँ भी दिल्ली की तरह प्रतियोगी परीक्षाओ की कोचिंग के लिए हजारों छात्र हर साल आते हैं. फर्क इतना है कि वहां यूपीएससी की कोचिंग के लिए ज्यादा जाते हैं और यहाँ एमपीपीएससी की तयारी के लिए ज्यादा आते हैं. इस संचालक के मुताबिक ही कई कोचिंग इंस्टीटयूटस का तो हम पीजी बालों से करार रहता है कि हम उनके यहाँ आने बाले छात्रो को रहने, खाने की सहूलियत मुहैया कराएँगे.

पर सरकार का फोकस तो यहाँ है

सत्य निकेतन हादसे पर कई नेताओं ने प्रतिक्रियाए दीं जिनमे से युवा कांग्रेसी नेता कन्हैया कुमार की प्रतिक्रिया काबिलेगौर थी. उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि एक तरफ भाजपा ने हर जिले में फाइव स्टार दफ्तर बनवाए हैं जो नहीं गिरते. लेकिन दूसरी तरफ पुल सड़कें और सरकारी इमारतें गिर रही हैं प्रधानमन्त्री मोदी के पास मैलोनी को बधाई संदेश देने का समय है लेकिन सत्य निकेतन जाने और बच्चों के लिए संवेदना व्यक्त करने का समय नहीं है.

जाहिर है यह बयान अर्ध राजनैतिक था नहीं तो कन्हैया कुमार और अभिजीत दिपके और मनु स्मृति को कोसने की हिम्मत करने बाले राहुल गाँधी से भी उम्मीद तो यह की जाती है कि वे यह कहें कि प्रधानमन्त्री के पास न केवल देश बल्कि दुनिया भर के मंदिरों में जाने के लिए वक्त है. उन्हें चमकाने के लिए पैसा है. लेकिन हास्टल बनबाने के लिए पैसा नहीं है. मिसाल डीयू की ही लें तो वहां आखिरी हास्टल साल 2012 में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान बना था. यही हाल देश भर का है कि सरकार ने छात्रो के लिए सैकड़ो हास्टल्स बनाने की घोषणा की लेकिन बने दहाई भी नहीं. अधिकतर

हास्टल्स निर्माणाधीन हैं या लालफीताशाही के शिकार होकर रह गए हैं. क्योंकि सरकार की मंशा शिक्षा देने की नहीं बल्कि शिक्षा के मौके छीनने की है.
इसका प्रमाण है मोदी सरकार के कार्यकाल में पिछले दस साल में 94 हजार से भी ज्यादा स्कूलों का बंद हो जाना. यह आंकड़ा नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय का है जो उसके शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने 2 फरबरी 2026 को लोकसभा में पेश किया था.

इसके मुताबिक साल 2014 – 15 से 2024 – 25 तक सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई यानी प्रतिदिन औसतन 25 स्कूलों में ताले जड़े गए. इससे 2.26 करोड़ छात्र स्कूली पढ़ाई से वंचित हो गए इनमे से 90 फीसदी छात्र दलित आदिवासी और पिछड़े वर्गों के ही हैं. इस आंकड़े से साफ़ जाहिर होता है कि शिक्षा का अधिकार मजाक और कहने भर की बात रह गई है.
सरकार दरअसल में चाहती यह है कि इन तबकों के बच्चे पढ़े लिखें नहीं बल्कि अपने पूर्वजों की तर्ज पर मनु स्मृति के मुताबिक ऊँची जाति बालों के गुलाम बने रहें. बात बात में अम्बेडकर की दुहाई देने बाली मोदी सरकार कैसे उनके मिशन के चिथड़े उड़ाते शिक्षा के उनके सपने को ध्वस्त कर रही है उसे यह हकीकत जाहिर करती है. यह बात भी कम हैरत की नहीं कि बंद होने बाले अधिकतर स्कूल भाजपा शासित राज्यों के हैं. उत्तरप्रदेश में लगभग 30 हजार और मध्यप्रदेश में बंद होने बाले स्कूलों की संख्या तकरीबन 25 हजार है.

इतना ही नहीं सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या भी 83 हजार से घटकर 79 हजार रह गई है. जबकि इस दौरान 51 हजार प्राइवेट स्कूल बढ़े. उम्मीद की जानी चाहिए कि अगर आलम यही रहा तो 2047 तक सिर्फ ब्राह्मणों के बच्चे ही पढ़ते नजर आयेंगे जिनके दम पर भारत विश्व गुरु बन जाएगा. अब नजर डालें मंदिरों के विकास पर जिससे भगवा सरकार और भगवा गैंग की अघोषित `विप्र पालन पोषण और प्रोत्साहन योजना` का अलिखित मसौदा सामने आता है. जब स्कूल बंद हो रहे थे तब सरकार मन्दिरों के विकास और पुनर्निर्माण पर दरियादिली से पैसा लुटा रही थी और अभी भी यह सिलसिला जारी है. अकेले काशी विश्वनाथ पर कुल 800 करोड़ रु खर्च किए जा चुके हैं. उज्जैन के महालालेश्वर मंदिर के महाकाल लोक पर 850 करोड़ रु फूंके गए तो उत्तराखंड में केदारनाथ धाम पुनर्निर्माण और विकास के लिए लगभग 750 करोड़ और गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर 100 करोड़ रु खर्चे गए.

ये तो थे बड़े ब्रांडेड सनातनी मंदिर इनके अलावा मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर, असम के कामख्या मंदिर और उत्तराखंड के ही बद्रीनाथ मंदिर पर भी दिल और खजाना खोलकर पैसा लुटाया गया है. जिससे फायदा सिर्फ पंडे पुजारियों को होगा जिसकी थ्योरी यह है कि जितना बड़ा मंदिर उतना ज्यादा चढ़ावा और ऐसा हो भी रहा है कि भक्त जिनमे ज्यादातर सवर्ण हैं देश के हिन्दू राष्ट्र बनने के लालच में तबियत से धर्म और तीर्थ स्थलों पर जाकर पैसा लुटा रहे हैं. अयोध्या के राम मंदिर पर ट्रस्ट ने 2370 करोड़ रु अब तक खर्च किए हैं. ( इसमें घपले, चंदा चोरी और लूट की राशि शामिल नहीं है )
इतने पैसों में कितने स्कूल, कालेज और हास्टल्स बन जाते इसका हिसाब किताब और अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं.

लेकिन 15 फीसदी भक्तों को यह मानने में दिक्कत होगी कि स्कूल, कालेज और हास्टल्स से ज्यादा जरुरी मंदिर और धर्म नहीं है. ये वही लोग हैं जिन्होंने रट्टू तोतों की तरह भगवा गैंग का यह सबक दिमाग में फिट कर लिया है कि धर्म गया तो सब गया धन गया तो कुछ नहीं गया. इनकी नजर में तो सात मौतों की जिम्मेदार एमसीडी या पीजी संचालक नहीं बल्कि हरि इच्छा है जिसके आगे किसी की नहीं चलती. Satya Niketan

 

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