BRICS Summit 2026: भारत चौथी बार ब्रिक्स का अध्यक्ष बना है. इस मौके पर कमल पर नमस्ते का लोगो छापा गया है और 25 शहरों में 350 बैठकें हो रही हैं, हर एयरपोर्ट पर बैनर है और हर चैनल पर बताया जा रहा है कि भारत अब विश्व गुरु बन गया है लेकिन यह कोई नहीं बता रहा कि 2012 से 2021 तक की पिछली तीन अध्यक्षताओं में क्या हासिल हुआ?
बीजेपी सरकार में 2016 और 2021 की अध्यक्षता के बाद ब्रिक्स बैंक से भारत को चीन से आधा पैसा ही मिला. लोकल करेंसी में व्यापार का वादा कागज पर ही रहा और चीन के साथ व्यापार घाटा 40 बिलियन से 100 बिलियन पार हो गया. इस बार जब ट्रंप 50 फीसदी टैरिफ लगा रहे हैं और चीन रेयर अर्थ रोक रहा है तब ब्रिक्स के नाम पर दिल्ली का यह तामझाम वाकई देश को डॉलर की गुलामी से बचाएगा या यह समिट भी इस बार भारत मंडपम की लाइटों में एक और इवेंट शो बनकर रह जाएगा?
पहली बार 2012 में मनमोहन सिंह ने दिल्ली में ब्रिक्स समिट किया था. उस वक़्त ब्रिक्स समिट पर कुल खर्च सिर्फ 25 करोड़ हुआ था. होटल अशोक में मीटिंग रखी गई थी और होटल के बाहर एक बड़ा होर्डिंग भी नहीं लगा था. 2012 की ब्रिक्स समिट की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही की मनमोहन सिंह ने ब्रिक्स बैंक के लिए सभी देशों को राजी कर लिया था. वही बाद में न्यू डेवलपमेंट बैंक यानि NDB बना, जिसका ऑफिस शंघाई में है और इस बैंक का प्रेसिडेंट कभी-कभी भारतीय भी होता है.
दूसरी बार ब्रिक्स समिट 2016 में गोवा में हुआ. सरकार बदल चुकी थी, डॉ मनमोहन सिंह की जगह नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री थे. इवेंटबाजी शुरू हुई, BIMSTEC को बुलाया गया और इन मेहमानों के लिए गोवा के बीच पर योगा इवेंट हुआ. इस इवेंटबाजी का नतीजा यह हुआ कि उसी साल भारत ने चीन से 52 बिलियन डॉलर का माल ज्यादा खरीदा और जिस ब्रिक्स बैंक को मनमोहन सिंह ने बनाया था उस ब्रिक्स बैंक से भारत को सिर्फ 350 मिलियन डॉलर मिले तो वहीं चीन को 1.2 बिलियन डॉलर मिल गए.
तीसरी बार 2021 में कोरोना की वजह से ब्रिक्स समिट वर्चुअल हुआ, सब घर से लैपटॉप पर बैठे बैठे मीटिंग में हिस्सा ले रहे थे. 150 बैठकें हुईं. कोई फोटो शूट नहीं हो पाया और कोई इवेंटबाजी भी नहीं हो पाई.
अब चौथी ब्रिक्स समिट में G20 में जो मॉडल हिट हुआ वही यहां कॉपी किया जा रहा है. भारत के हर राज्य की राजधानी में लाइटिंग, होर्डिंग लगा दी गई है और हर एयरपोर्ट पर ब्रिक्स का बोर्ड टांग दिया गया है. हर अखबार में पूरे पेज का विज्ञापन छप रहा है और प्रधानमंत्री की फोटो के साथ इसे ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे कि भारत विश्व गुरु बन गया है.
पिछले G20 समिट में 4100 करोड़ का खर्च आया था, यह तो सरकारी आंकड़ा है. RTI में पता चला कि सिर्फ दिल्ली की सड़कों की पुताई में 200 करोड़ लग गये थे. अब ब्रिक्स 2026 का खर्च कितना आएगा और इससे देश का कितना फायदा होगा? यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.
ब्रिक्स का मूल काम है डॉलर की दादागिरी से बचना. 2012 से हम कह रहे हैं लोकल करेंसी में व्यापार करेंगे लेकिन सवाल यह है कि आज 2026 में कितना व्यापार लोकल करेंसी में हो रहा है? RBI के आंकड़े कहते हैं भारत का ब्रिक्स देशों के साथ 90 फीसदी व्यापार अभी भी डॉलर में है. रूस से तेल रुपये में लेने चले थे, रूस ने कहा रुपये का क्या करूं, हमें तो चीन को देना है. चीन ने कहा युआन में करो. युआन के लिए रूपये को गिरवी रखकर फिर डॉलर में ही पेमेंट करनी पड़ी. अब सवाल यह है कि 2016 और 2021 के ब्रिक्स का अध्यक्ष बनने का क्या फायदा हुआ?
ब्रिक्स का दूसरा काम है NDB यानि विकास बैंक से सस्ता पैसा लाना. यह वही ब्रिक्स बैंक है जो 2012 में मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में शुरू हुआ था. NDB ने अब तक भारत में 32 प्रोजेक्ट में 8 बिलियन दिए हैं, जबकि एशियन डेवलपमेंट बैंक ने उसी दौरान 25 बिलियन दिए हैं, यहां ब्याज भी कम है तो NDB से हमें फायदा कहाँ हुआ? असली फायदा तो चीन को है उसके कॉन्ट्रैक्टर NDB के पैसे से अफ्रीका में रोड बना रहे हैं.
ब्रिक्स का तीसरा काम है सप्लाई चेन दुरुस्त करना. ट्रंप ने 50 फीसदी टैरिफ ठोक दिया, चीन ने Rare Earth पर रोक लगा दी, ब्राजील ने कहा सोयाबीन हम बेचेंगे. इस माहौल में ब्रिक्स से भारत को क्या मिला? अभी तक तो सिर्फ वादा ही मिला है कि हम रेजिलिएंट बनेंगे, इनोवेटिव बनेंगे लेकिन कैसे बनेंगे? इसका जवाब किसी के पास नहीं है. सेमीकंडक्टर का 90 फीसदी कच्चा माल आज भी चीन के पास है, तेल रूस के पास है, सोना UAE के पास है, हम क्या देंगे? सिर्फ नमस्ते वाला लोगो? या नरेंद्र मोदी की बड़ी तस्वीर?
G20 के बाद सरकार ने कहा था कि इससे FDI दोगुनी होगी लेकिन नतीजा क्या हुआ? 2023-24 में FDI 16 प्रतिशत तक गिर गई. ब्रिक्स के बाद भी वही होगा. दिन के इस इवेंटबाजी को लेकर शाम को टीवी पर अलग तरह की ड्रामेबाजी चलेगी. मोदी ने पुतिन को गले लगाया, शी को समझाया और पूरी दुनिया में सिर्फ भारत की धाक है यही सब हेडलाइन होगी लेकिन इस इवेंटवाजी की अगली सुबह फिर वही ढाक के तीन पात.
इस समिट के बाद अगर NDB से 5 बिलियन के नए प्रोजेक्ट साइन हों, रुपी-रूबल ट्रेड का क्लियरिंग हाउस बने और क्रिटिकल मिनरल्स पर 11 देशों का जॉइंट बफर स्टॉक बने तो इस बैठक को भारत के फायदे का समिट समझा जा सकता है लेकिन इस समिट में भी प्रचार और फोटो शूट की पुरानी परंपरा दोहराई गई तो समझ लीजिए यह भी सिर्फ एक नई इवेंटबाजी ही है. BRICS Summit 2026





