Glacier Collapse: प्रकृति के हिसाब से हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने व उन के गिरने और फिर बहती नदी जहां संकरी हो वहां अड़चन पैदा करने से बचाव के लिए एक प्राकृतिक बांध बना कर पानी जमा करना कोई बड़ी बात नहीं. पहाड़ों में जितनी झीलें हैं वे इसी तरह से घाटियों का रास्ता रोक कर प्रकृति द्वारा खुदबखुद बारिश और बर्फ के पिघलने से आए पानी को रोक कर स्टोर करने का नतीजा हैं.
इस बार फर्क यह रहा कि समुद्र तट से 5,200 मीटर ऊंचे हिमालय के बर्फ के पहाड़ों पर ग्लेशियर अचानक टूट कर अलग हो गया. यह लगभग 10 से 20 करोड़ क्यूबिक मीटर का था जो तेजी से नीचे सवा किलोमीटर गहरी घाटी में धड़ाम से गिरा और भूकंप सी स्थिति पैदा की. इस ग्लेशियर का पानी बह कर तिब्बत-नेपाल सीमा के पास लेहंदे खोला नदी में मलबे व पत्थरों के साथ गिरना शुरू हो गया.
घाटी की पतली नदी का रास्ता इस मलबे के कारण रुक गया और यहां एक झील बनने लगी. जब पीछे का पानी बढऩे लगा तो उस के दबाव में जिस मलबे के पत्थरों ने नदी का रास्ता रोक रखा था वह टूट गया. बहता पानी भटकोशी और त्रिशूली नदी में आने लगा जहां आधे घंटे में 9 मीटर जल स्तर बढ़ गया. इन नदियों के किनारे पहले सड़कें बनी थीं. सड़क की सुविधा देख कर ऊपर पहाडिय़ों पर रहने वाले, जो यहां खेती करते थे, रहने के लिए मकान बनाने लगे.
जब लोग रहेंगे तो पुल बनेंगे, हाडड्रो प्लांट भी बनेंगे, गांव भी बसेंगे यह जानते हुए भी कि प्रकृति का मिजाज जानना संभव नहीं है.
जो समाज तकनीक और तार्किकता को तो इस्तेमाल करता है लेकिन सोच धार्मिक व चमत्कारिक रखता है, वह बीचबीच में मंदिर बना कर अपने को सुरक्षित रखना चाहता है. तिब्बत की तरफ चीनी इलाकों में क्या हुआ, यह तो स्पष्ट नहीं है पर नेपाल की तरफ इन घाटियों के किनारों पर जरूरत से ज्यादा लोग रहते थे, जो चपेटे में आ गए.
प्रकृति कब क्या करे, इस का पूर्व अनुमान संभव नहीं है. लेकिन इस तरह की घटनाओं के लिए ग्लोबल वार्मिंग को दोष देना भी बहुत सही नहीं है. ग्लोबल वार्मिंग अगर फौसिल फ्यूल, कोयला व तेल निकाल कर उस से आधुनिक सुविधाएं हासिल करने से हुई है तो उस का कहर झेलना होगा और हंस कर.
आज मानव पहले से ज्यादा सुरक्षित है, स्वस्थ है, प्रकृति की रोजमर्रा की झंझट से दूर है. वह सर्दी में ठिठुरता नहीं, गरमी में झुलस्ता नहीं, बीमारी में आसानी से मरता नहीं है. अगर उस के कारण पर्यावरण खराब हुआ है तो वह उसे ठीक करना जानता है.
कुछ देशों ने इसे पहले पा लिया. नेपाल, भारत जैसे देश इसे देर से समझेंगे क्योंकि यहां अभी भी पूजापाठ पर ज्यादा खर्च हो रहा है प्रकृति के गुणों को समझ कर उन्हें अपने लायक ढालने के काम करने की जगह.
नेपाल में ग्लेशियर के टूटने की घटना वैज्ञानिकों के लिए चुनौती है पर साथ ही पूजापाठ के व्यवसाय में लगे लोगों के लिए अवसर. भारत में तो मानसरोवर जाने वाले, जो इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं जहां बाढ़ आई है, अब और ज्यादा पैसे देने वाली पूजा करेंगे और उन वैज्ञानिकों को भूल जाएंगे जो हिमालय की पहाडिय़ों पर अब कैंप लगा कर ग्लेशियरों के टूटने की चेतावनी देने वाले यंत्र लगाएंगे.
प्रकृति ताकतवर पर तार्किक वैज्ञानिक मानव उसे काबू में करना जानता है. वह इस आपदा से सबक सीखेगा, हिमालय के चप्पेचप्पे पर यंत्र लगाएगा और हफ्तों पहले चेतावनी देगा. यही तो फर्क है विज्ञान की सोच और धर्म के पाखंड में. Glacier Collapse





