आजकल सोशल मीडिया पर लिवर डाक्टर के नाम से मशहूर डा. साइरिएक एबी फिलिप्स काफी चर्चा में हैं. उन्हें कुछ लोग देशद्रोही, आयुर्वेद विरोधी और भारतीय संस्कृति का दुश्मन तक कह रहे हैं. डा. फिलिप्स अपने वीडियोज में लगातार यह मुद्दा उठाते हैं कि आयुर्वेद और होम्योपैथिक के जरिए इलाज के दावे कई मामलों में खतरनाक साबित होते हैं. सिर्फ श्रद्धा या विश्वास ही मैडिसिन का आधार बन जाए तो वह इलाज नहीं, बीमारी बन जाती है.

डा. साइरिएक एबी फिलिप्स एक हेपेटोलौजिस्ट यानी लिवर विशेषज्ञ हैं. डा. फिलिप्स वर्षों से लिवर की बीमारियों का इलाज कर रहे हैं और अपने अनुभवों को सोशल मीडिया के जरिए शेयर करते हैं. वे सोशल मीडिया पर ‘द लिवर डौक’ के नाम से मशहूर हैं.

एक्स यानी ट्विटर पर उन के लगभग 3 लाख फौलोअर्स हैं. इंस्टाग्राम पर लगभग 1 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं और यूट्यूब के उन के चैनल के लगभग 71 हजार सब्सक्राइबर हैं. इन सभी प्लेटफौर्म्स से वे वैज्ञानिक शोध की नईनई जानकारियां शेयर करते हैं, लिवर से जुड़ी डिजीज के बारे में बताते हैं, साथ ही, आयुर्वेद और होम्योपैथी से जुड़े दावों की वैज्ञानिक जांच करते हैं. डा. फिलिप्स ने अपने कई वीडियोज में ऐसे कई मामलों का जिक्र किया जिन में आयुर्वेद या होम्योपैथी दवाओं के बाद मरीजों के लिवर को गंभीर नुकसान हुआ.

डा. फिलिप्स का कहना है कि किसी भी दवा और दावे को साइंटिफिक एविडैंस के बिना स्वीकार करना बेवकूफी ही नहीं, खतरनाक भी है. चिकित्सा का आधार परंपरा नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रमाण होना चाहिए. कोई दवा हजारों साल पुरानी है, इस से यह साबित नहीं होता कि वह हर बीमारी में कारगर है. हर दवा के फायदे और नुकसान का परीक्षण होना चाहिए. मरीज की जान बचाना किसी भी विचारधारा से ज्यादा जरूरी है.

डा. फिलिप्स की इन बातों में ऐसा कुछ नहीं है जो विज्ञान के खिलाफ हो. लेकिन ये बातें परंपराओं और विश्वासों पर आधारित मानसिकता के खिलाफ तो हैं ही. असल में मैडिकल साइंस का पूरा ढांचा तो एक्सपीरियंस और एक्सपैरिमैंट के सिद्धांत पर ही खड़ा है लेकिन आयुर्वेद और होम्योपैथी के मामले में ऐसा नहीं है. समस्या तब पैदा होती है जब बिना पर्याप्त वैज्ञानिक परीक्षण के बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं. डा फिलिप्स को इन्हीं निराधार दवाओं और दावों से एतराज है.

ज्यादातर आयुर्वेद और होम्योपैथिक दवाओं पर हाई क्वालिटी वाले क्लिनिकल ट्रायल नहीं होते. अलगअलग कंपनियों की एक ही दवा की क्वालिटी अलगअलग होती है. कुछ आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स में लीड, मर्करी और आर्सेनिक जैसी भारी धातुएं मिलने की रिपोर्टें पब्लिश हुई हैं. कई बार इन दवाओं को नैचुरल कह कर पूरी तरह सुरक्षित बता दिया जाता है जबकि इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि नैचुरल प्रोडक्ट्स भी नुकसान पहुंचा सकते हैं. यहां यह बात याद रखना चाहिए कि नैचुरल का हमेशा मतलब सेफ होना नहीं होता. सांप का जहर भी नैचुरल ही होता है.

होम्योपैथी का सिद्धांत कहता है कि जिस पदार्थ से बीमारी पैदा होती हैं उसी पदार्थ को ज्यादा पतला कर के इलाज किया जा सकता है. इस बात में समस्या यह है कि इतनी ज्यादा डायल्यूशन के बाद अकसर मूल पदार्थ का एक भी अणु नहीं बचता. आज तक कोई साइंटिफिक एक्सपैरिमैंट यह नहीं बता पाया कि ऐसी दवा शरीर में कैसे काम करती है? कई बड़े एक्सपैरिमैंट में पाया गया है कि ज्यादातर स्थितियों में होम्योपैथी का प्रभाव प्लेसीबो यानी भ्रम पैदा करने वाले इलाज से बेहतर साबित नहीं हुआ. अगर कोई व्यक्ति कैंसर, टीबी, शुगर या गंभीर संक्रमण जैसी बीमारी के इलाज के लिए केवल होम्योपैथी पर निर्भर हो तो इस से उस की जान खतरे में पड़ सकती है.

विज्ञान किसी पद्धति का नाम नहीं है बल्कि यह प्रकृति को जांचने का तरीका है. अगर कल आयुर्वेद की किसी दवा के बारे में साइंटिफिक रिसर्च से यह साबित हो कि यह दवा सुरक्षित और प्रभावी है तो उसे मैडिकल साइंस भी स्वीकार करेगी. इसी तरह अगर एलोपैथी की कोई दवा एक्सपैरिमैंट में फेल हो जाए तो उसे मैडिकल साइंस छोड़ देती है. यानी, विज्ञान किसी परंपरा का विरोध नहीं करता बल्कि सुबूत मांगता है.

किसी डाक्टर की बात से असहमति होना लोकतांत्रिक अधिकार है. अगर किसी को लगता है कि डा. फिलिप्स गलत हैं तो सब से अच्छा जवाब गाली नहीं बल्कि मजबूत वैज्ञानिक शोध है. विज्ञान में तर्क का जवाब तर्क से दिया जाता है न कि व्यक्तिगत हमलों और मांबहन की गालियों से. साइंस का मतलब केवल ईश्वर पर सवाल उठाना नहीं है. इस का मतलब है कि किसी भी दावे को बिना प्रमाण स्वीकार न किया जाए, चाहे यह दावा किसी बाबा का हो, किसी धार्मिक ग्रंथ का हो, किसी आयुर्वेदाचार्य का हो या किसी एलोपैथ डाक्टर का. सब के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिए कि क्या इस के पक्ष में पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण हैं? यदि जवाब हां है तो उसे स्वीकार करना चाहिए लेकिन यदि जवाब नहीं है तो इस का मतलब है कि और शोध की जरूरत है.

डा. साइरिएक एबी फिलिप्स ने यही बात कही है कि इलाज का आधार आस्था, परंपरा, राष्ट्रवाद या भावनाएं नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रमाण होने चाहिए. डा.
फिलिप्स के इस सिद्धांत से असहमत होना मुश्किल है क्योंकि आधुनिक चिकित्सा, टीकों, एंटीबायोटिक्स, सर्जरी और मौडर्न मैडिसिन इसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर काम करते हैं और लाखों लोगों की जान बचाते हैं.

किसी भी चिकित्सा पद्धति का सम्मान तभी तक होना चाहिए जब तक उस के दावे वैज्ञानिक परीक्षणों में सही साबित हों. मरीज की जान किसी भी विचारधारा से बड़ी चीज होती है, इसलिए इलाज के मामले में आखिरी फैसला प्रयोगशाला, क्लिनिकल ट्रायल और सुबूत से होना चाहिए न कि आस्था से.
अगर डा. फिलिप्स के बयान और सोशल मीडिया पोस्ट ध्यान से पढ़ें जाएं तो पता चलता है कि वे किसी धर्म, देश या संस्कृति के विरोधी नहीं हैं. वे सिर्फ एक बात कहते हैं कि किसी भी इलाज को अपनाने से पहले उस के पीछे मजबूत साइंटिफिक एविडैंस होने चाहिए.

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