Healthcare Crisis in India: देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत चिंताजनक है. एसआरएस यानी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की ताजा रिपोर्ट ने बीजेपी सरकार की स्वास्थ्य नीतियों, सरकारी अस्पतालों और आयुष्मान भारत योजना की सच्चाई उजागर कर दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024 में कुल मौतों में से 45 फीसदी मौतें डाक्टर या मैडिकल मदद न मिलने की वजह से हुईं. यह आंकड़ा 2020 के 18 प्रतिशत के आंकड़े से दोगुने से ज्यादा है. यानी, महामारी के बाद से स्थिति और बिगड़ी है.

ग्रामीण इलाकों में मौतों का यह आंकड़ा 49 प्रतिशत तक पहुंच गया है जबकि शहरों में 36 प्रतिशत है. बिहार में 68 फीसदी, झारखंड में 61 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 60 फीसदी मौतें बिना इलाज के कारण हुईं. वहीं केरल में यह आंकड़ा 26 फीसदी और जम्मूकश्मीर में 29 फीसदी रहा. इन राज्यों में स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन राष्ट्रीय औसत बेहद खराब है. 2023 की रिपोर्ट में सीएजी ने बताया था कि 7.5 लाख कार्ड एक ही मोबाइल नंबर 9999999999 पर बनाये गए थे. मृत लोगों को भी इलाज का लाभ पाते दिखाया गया था.

सरकारी अस्पतालों में मौतों का हिस्सा 2024 में सिर्फ 24 प्रतिशत रहा जो 2014 के मुकाबले ज्यादा नहीं बदला. बीजेपी सरकार ने आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को गरीबों के लिए गेमचेंजर बताया था लेकिन सीएजी की औडिट रिपोर्ट कुछ और कहती है. योजना में बड़े पैमाने पर घोटाले, फर्जी दावे, अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और भुगतान में देरी की शिकायतें आम हैं. कई राज्यों में अस्पतालों ने योजना को लागू ही नहीं किया. निजी अस्पतालों ने नियमों का उल्लंघन किया और कुछ अस्पतालों ने मरीजों को भरती तक नहीं किया. सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कई सरकारी अस्पतालों में मशीने खराब थीं, बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था और फायर सेफ्टी जैसे मानक भी पूरे नहीं थे. मर गए लोगों के नाम पर भी दावे स्वीकार किए गए.

मोदी सरकार ने बड़ेबड़े दावे किए थे. नए अस्पताल बनेंगे, पुराने अस्पतालों में बेड बढ़ाए जाएंगे, सभी का स्वास्थ्य बीमा होगा, आयुष्मान कार्ड का फायदा सभी को मिलेगा लेकिन एसआरएस रिपोर्ट साफ बताती है कि जमीनी हकीकत अलग है. सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी, दवाओं का अभाव, इमरजैंसी सुविधाओं की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच न होने से आम आदमी इलाज से महरूम रह जाता है. महंगाई और निजी अस्पतालों के चंगुल में फंस कर गरीब परिवार कर्ज में डूब जाते हैं या घर पर ही मौत का इंतजार करते हैं.

शिशु मृत्युदर और मातृ मृत्युदर में सुधार के दावे किए गए लेकिन कुल मौतों में बिना इलाज के आंकड़े इन दावों को खोखला साबित करते हैं. ऐसा लगता है कि मंदिरमसजिद की राजनीति में अस्पतालों की सुध लेने की फुरसत सरकार को नहीं है. समय है कि सियासी दावों से ऊपर उठ कर जमीनी सुधार किए जाएं वरना इलाज के बिना मौत के ये आंकड़े बढ़ते रहेंगे. हां, सुधार करने के लिए सरकार ने एक अचूक उपाय अपनाया है सीएजी की रिपोर्ट तैयार करने वाले औडिट अफसरों का तबादला कर डाला. Healthcare Crisis in India

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