Relationship Story: ‘‘अगर हम इस पार्क के किनारेकिनारे ही टहलें तो कैसा रहेगा?’’
‘‘क्यों, आप को पार्क के अंदर मेरे साथ टहलने में कोई दिक्कत है?’’
‘‘तुम्हें तो पता है, इसी पार्क में बच्चों के खेलने, पार्क के रखरखाव के वास्ते वार्षिक चंदे को ले कर कुछ साल पहले भुवनेश जी से मनमुटाव हो गया था, तब से मैं ने इधर आना ही छोड़ दिया.’’
‘‘तो क्या हुआ, यह तो पुरानी बात हो गई. फिर, पार्क तो सार्वजनिक स्थल है. यहां तो कोई भी आ कर टहल सकता है. कालोनी में रहने वाले आप जैसे बहुत से ऐसे लोग हैं जो कालोनी कल्याण सोसायटी के सदस्य नहीं हैं, फिर भी मैं ने उन्हें रोजाना यहां टहलते देखा है. उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता या रोकताटोकता.’’
‘‘हां, वो तो ठीक है लेकिन मेरा अंतर्मन इस की इजाजत नहीं देता.’’
‘‘तो इजाजत ले लीजिए.’’
‘‘किस से?’’
‘‘अपने अंतर्मन से, और किस से?’’
ये दंपति पार्क के बाहर किनारेकिनारे टहलते, बतियाते हुए जा रहे थे. पति इकहरे बदन का जबकि पत्नी दोहरे बदन की है. पत्नी की दिनचर्या में रोज सुबहशाम इस पार्क में 7 से 8 चक्कर लगाना शामिल है. लेकिन, आज दफ्तर से जल्द आ जाने के कारण पति भी पत्नी संग ‘इवनिंग वाक’ पर आ गए हैं.
पति को शाम को टहलने का मौका कम ही मिल पाता है. वे कभीकभार सुबहसुबह ही कालोनी का एकदो चक्कर लगा लेते हैं. प्रतिदिन टहलने को ले कर उन के बीच एक तरह का अलिखित समझौता यह है कि यदि किसी दिन पति महाशय औफिस से घर जल्दी लौट आएंगे तो पत्नी संग शाम को उन्हें भी ‘इवनिंग वाक’ पर जाना होगा.
आदमी को पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि कालोनी के सभी रहवासी किसी न किसी होड़ में शामिल हैं. सभी एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं. उन के मकानों की मंजिलें दिनोंदिन ऊंची होती जा रही हैं. घरों में दुपहिया की जगह चारपहिया, किसी के पास पहले ही चारपहिया है तो दूसरेतीसरे चारपहिये की आमद बढ़ती जा रही है. यहां तक कि उन के बच्चे भी अब दुपहिया की जगह चारपहियों में फर्राटा भरने लगे हैं.
कालोनी वालों की खाएपिए अघायों सी जीवनशैली, ठाटबाट और अपने में ही मगन रहने की प्रवृत्ति देख कर लोगों को लगता है कि यहां कालोनी के लोगों से मेलमिलाप रखना, बोलनाबतियाना, किसी के घर आनाजाना केवल समय की बरबादी ही है.
‘‘भाभी जी नमस्ते,’’ टहलने से वापस लौटने के बाद ये दंपति अपने घर में घुसने ही वाले थे कि सामने से आती एक अधेड़ सी महिला ने नमस्ते किया.
‘‘नमस्ते दीदी.’’ नमस्कार की औपचारिकता के बाद दोनों महिलाओं को बातचीत में मशगूल होता देख पति ने आगे बढ़ कर दरवाजे का ताला खोला. पत्नी के आने का इंतजार करते अंदर किचन में जा कर चाय बनाने में मशगूल हो गए.
बताते चलें कि पति को लिखनेपढ़ने का शौक है. देश, प्रदेश के लगभग सभी छोटेबड़े पत्रपत्रिकाओं में उन की रचनाएं छप चुकी हैं. सोशल मीडिया पर भी वे काफी सक्रिय रहते हैं. उन की फ्रैंडलिस्ट में लगभग 3 हजार के आसपास फ्रैंड्स तो होंगे ही. ढे व्हाट्सऐप ग्रुप्स भी जौइन कर रखा है. लब्बोलुआब यह कि वे बहुचर्चित साहित्यकार हैं.
ये दंपति इस कालोनी में लगभग बारहतेरह साल से रह रहे हैं. कालोनी में छोटेबड़े 2 पार्क हैं, जिन में सुबहशाम लोगों की काफी चहलपहल रहती है.
शुरूशुरू में इस दंपति ने कालोनी के लोगों से मेलमिलाप बढ़ाया. पड़ोसी सहित कालोनी के दूसरे लोग भी गाहेबगाहे तीजत्योहारों में एकदूसरे के घर आतेजाते. लेकिन बाद के वर्षों में कालोनी में नएनए लोग आते गए, जिस से मेलमिलाप के लिए ज्यादातर लोग अपने पड़ोसियों तक ही सीमित हो गए. कालांतर में धीरेधीरे जीवन की आपाधापी, भागमभाग, बड़े होते बच्चों के कैरियर, पढ़ाई, रोजगार आदि की जिम्मेदारी के साथसाथ मकानों के आकारप्रकार, दिनोंदिन उन के घरों में बढ़ती दुपहियों-चारपहियों की आवक आदि कुछ ऐसे ही कई कारण रहे कि इस कालोनी के पुराने रहवासियों के यहां आवाजाही, बोलचाल कम होतेहोते लगभग खत्म सी हो गई.
आदमी को भी ज्यादा बोलनेबतियाने, लोगों के घर आनेजाने आदि का शौक नहीं रह गया. औफिस, घरपरिवार, बच्चों आदि की जिम्मेदारियों के बाद, उस का ज्यादातर समय लिखनेपढ़ने में ही बीतता. जाहिर है, वह अपने काम से ही काम रखता.
‘‘कौन थी, वो मैडम?’’ कुछ देर बाद पत्नी के घर में अंदर आते ही, अभीअभी गरम की हुई चाय की दूसरी प्याली पत्नी की ओर बढ़ाते, सोफे पर बैठेबैठे चाय की चुस्कियों संग पति ने पूछा.
‘‘मिसेज चौहान थीं.’’
‘‘कौन चौहान?’’ पति ने उत्सुकता जताते पूछा.
‘‘अरे, आप मिस्टर चौहान को नहीं जानते?’’
‘‘शायद नहीं,’’ पति ने कुछ सोचते हुए कहा.
‘‘आप को तो कुछ भी याद नहीं रहता. तभी तो एक दिन कामवाली बाई भी कह रही थी, ‘अंकल जी अकसर औफिस जाने की जल्दी में पहले अपने जूते पहन लेते हैं, फिर उन्हें मोजे पहनने की याद आती है, हेंहेंहें,’’ पत्नी ने तंज कसा.
‘‘अरे यार, उसे क्या पता कि पढ़नेलिखने वालों को किसकिस तरह जुगत भिड़ाते, अपने व्यस्ततम दिनचर्या में से लिखनेपढ़ने के वास्ते एकएक पल चुराना पड़ता है. इस चक्कर में कभीकभी रात में सोने में देर हो जाती है, तो सुबह भी जागने में देरी हो जाना स्वाभाविक है. आखिर, स्वस्थ शरीर के लिए पर्याप्त नींद भी तो जरूरी है न. फिर सुबह जल्दीजल्दी उठ कर दफ्तर के लिए तैयार होने की हड़बड़ी. बहरहाल. क्या ये वही मिस्टर चौहान हैं जो कालोनी कल्याण समिति में कोई पदाधिकारी भी हैं?’’ पति ने तनिक झल्लाते हुए कहा.
‘‘हां, वहीं. उन्हीं की मिसेज थीं. पार्क में टहलते हुए अकसर मिल जाती हैं.’’
‘‘उन का घर किधर है?’’
‘‘अरे, पार्क के फ्रंट गेट के सामने जो चौड़ी सी सड़क निकली है न, उस की दाहिनी तरफ के मकानों में जो आखिरी तिमंजिला मकान है, वह उन्हीं का तो है,’’ पत्नी ने समझाना चाहा.
‘‘वो तो बहुत शानदार मकान है. कोई पैसे वाला आदमी लगता है. किस विभाग में हैं? कोई विजनैसविजनैस तो नहीं है?’’ पति ने जिज्ञासा जाहिर की.
‘‘सुनते हैं किसी बैंक में हैं. उन के 2 लड़के हैं, दोनों ग्रेजुएट हैं. बड़े वाले के लिए तो उन्होंने एक पैट्रोल पंप खुलवा दिया है, छोटा वाला किसी औनलाइन बिजनैस में लगा है. उन के पति, बच्चे अपनेअपने कामों में ही दिनभर औफिस में बिजी रहते हैं. सो, वे लोग देररात तक घर आते हैं. घर में कामकाज, झाड़ूबरतन, खाना बनाने आदि के लिए उन्होंने दोदो आदमी लगा रखे हैं.
“पति, बच्चे जबतक दफ्तर से आते हैं, वे देर शाम तक पार्क में टहलती रहती हैं. चूंकि मैं भी देर में ही पार्क में जाती हूं, तो वही वहां अकेली टहलती मिल जाती हैं. सो, उन से मेरी अच्छीखासी दोस्ती हो गई है. उन का भी मायका गोरखपुर ही है. बोलीबानी भी ऐसी है कि उन से बतियाना मुझे बहुत अच्छा लगता है,’’ पत्नी ने विस्तार से समझाया.
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. कहा भी गया है कि ‘एक अच्छा दोस्त सैकड़ों किताबों के बराबर होता है.’ हमारी किसी न किसी से दोस्ती तो होनी ही चाहिए. देखो, मेरे कितने दोस्त है?’’ यह कहते हुए पति ने सामने रखी किताबों की रैक की तरफ हाथ से इशारा किया.
‘‘यह सब तो ठीक है लेकिन आप को भी अपने आसपड़ोस में दोस्ती, बातचीत रखनी चाहिए. लोगों के घर आनाजाना चाहिए. पता नहीं किस घड़ी किस से, क्या काम पड़ जाए. पर आप को तो अपने औफिस, लिखनेपढ़ने, और सोशल मीडिया के अपने आभासी दोस्तों से जैसे फुरसत ही नहीं मिलती,’’ पत्नी ने तनिक डांटते हुए समझाना चाहा.
‘‘लेकिन मैं अपने काम, अपने लिखन्तपढ़न्त की आदतों से पूरी तरह संतुष्ट हूं और समझता हूं कि खासा पौपुलर भी हूं. ऐसे में और ज्यादा लोगों से दोस्ती बढ़ाना एक तरह से समय की बरबादी ही है. फिर, जानपहचान बढ़ाने के लिए लाइकमाइंडेड पीपल भी तो होने चाहिए न. सभी से दोस्ती भी तो नहीं हो सकती,’’ पति ने तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात कहनी चाही.
‘‘पर मेरी तो मजबूरी है. आखिर, खाली समय में मनबहलाव, सुखदुख बतियाने के लिए कोई संघीसहेली तो होनी ही चाहिए. आप तो औफिस समय के बाद अपने लिखन्तपढ़न्त और सोशल मीडिया की दुनिया में खासा व्यस्त हो जाते हैं. बच्चों का पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों में चले जाने से मैं घर में अकेले खाली पड़ेपड़े बोर हो जाती थी. सो, मिसेज चौहान का संगसाथ, चाहे एकाध घंटे के लिए ही क्यों न हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है,’’ पत्नी ने स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया.
‘‘शायद, तुम ठीक कह रही हो. कम से कम एक सच्चा दोस्त तो हम सभी के पास होना ही चाहिए जिस से गाहेबगाहे मन की बातें, सुखदुख साझा किए जा सकें.” पति ने भी मानो सहमति जताई.
‘‘मेरा तो मानना है कि आप लिखन्तपढ़न्त और इस छपास में चाहे जितना भी व्यस्त रहिए, पौपुलर होइए लेकिन यदि आप को आप के आसपड़ोस वाले ही अच्छी तरह न जानते हों, तो यह पौपुलैरिटी किस काम की? लिखन्तपढ़न्त में जरा नाम क्या हो गया है आप का, खुद को बड़काभारी सैलिब्रिटी ही समझने लगे हैं. याद होगा आप को वह सम्मान समारोह जिस में आप को किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार के नाम पर उन की स्मृति में स्थापित ‘साहित्य रत्न पुरस्कार’ दिया जाना था.
“कार्यक्रम 2 बजे दिन में शुरू होना था लेकिन अतिउत्साह में डूबे, नएनवेले सूट में लकदक तैयार होते आप उस कार्यक्रम में लगभग डेढ़ घंटे पहले ही पहुंच गए थे. कार्यक्रम स्थल पर आप को कोई भी ऐसा परिचित साहित्यकार या पुराना संगीसाथी नहीं मिला जो आप को या आप किसी को जानतेपहचानते हों. इस कारण उस सभागार में पूरे समय आप एक कोने में चुपचाप बैठे अपने मोबाइल फोन में व्यस्त रहे या कभी सभागार से बाहर निकल कर टहलते, तो कभी प्रसाधन कक्ष में जातेआते अपना समय बिताया था.
“अपनी बारी आने पर सम्मान के नाम पर एक मोमैंटो, एक शौल ओढ़े, माला पहने, अनमने से फोटो खिंचवा कर स्टेज से उतरे और वहां दिए गए लंच पैकेट को बिना खोले चुपचाप पार्किंग में खड़ी अपनी कार में सवार हो, आननफानन घर आ गए थे. जिस तरह बमकतेचहकते हर समय अपनेआप को चर्चित साहित्यकार होने का दावा करते फिरते हैं, उस दिन तो आप की सारी हवा और हेकड़ी निकल गई थी. इस कड़वे अनुभव से तो आप भलीभांति वाकिफ ही हैं,” पत्नी ने तनिक व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.
“हां, तुम ने सही याद दिलाया. उस दिन पुरस्कार समारोह में बिलकुल अच्छा नहीं लगा था. नाम पुकारे जाने और पुरस्कार ग्रहण करते समय जब खचाखच भरे सभागार में किसी ने ताली तक नहीं बजाई, तो ऐसा लगा मानो मैं ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ सरीखा आ गया हूं. यहां परसाई जी की कही बात बड़ी शिद्दत से याद आ रही है- “लाभ जब थूकता है तो हथेली पर लेना पड़ता है.” पति ने जैसे उस कड़वे अनुभव को याद करते अफसोस जाहिर किया था.
“उम्मीद है, अब आप मेरी बातों के मायने अवश्य समझेंगे,” पत्नी ने ढ़ाढ़स बंधाई.
‘‘ठी है, मैं इस बारे में सोचूंगा. वैसे, वे और क्या कुछ कह रही थीं? क्या मेरे बारे में कुछ पूछ भी रही थीं?’’ पति की जिज्ञासा अभी भी बनी हुई थी.
‘‘हां, कह रही थीं, ‘अंकल जी हमेशा सीरियस मूड में ही दिखते हैं. ऐसा लगता है मानो कुछ पूछिए तो अभी डांटने लगेंगे,’’ पत्नी ने आगे बताया.
‘‘अच्छा, तो उन्होंने मुझे अंकल जी कहा?” पति को आश्चर्य सा हुआ.
‘‘और क्या कहतीं? जरा आप अपने सिर के खिचड़ी होते बाल, खसखस दाढ़ीमूंछ तो देखिए? आप जैसे आदमी को देख कर कोई और कहेगा भी क्या? चौवनपचपन की उम्र में ही पूरे खूसट बुढ़ऊ से लगने लगे हैं आप,’’ पत्नी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.
‘‘अरे भई, मुझे टहलनेघूमने के लिए इतना टाइम कहां मिल पाता है? फिर भी, दिनभर औफिस आदि के कामों में जहां कहीं जाना होता है, भरसक पैदल ही आनेजाने की कोशिश करता हूं. दिनभर की भागदौड़ अलग से रहती है. औफिस में भी अकसर लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों के इस्तेमाल को ही प्राथमिकता देता हूं. अब फिट रहने के लिए इस से ज्यादा और क्या कर सकता हूं? फिर बालों की सफेदी पर भला किस का वश है? बहरहाल, उन्होंने मेरे बारे में और भी कुछ पूछा?’’ पति की जिज्ञासा अभी भी खत्म नहीं हुई थी.
‘‘हां, आगे यह भी पूछा कि अंकल जी करते क्या हैं?’’ पत्नी ने तंज कसा.
‘‘ओह, इस का मतलब उन्हें मेरे बारे में कोई गलतफहमी है,” पति ने आश्चर्य जताया.
‘‘गलतफहमी उन्हें नहीं, आप को है. आप ने भी सुना होगा अमेरिकी पौप आर्टिस्ट एंडी वारहोल का कथन कि ‘‘दुनिया में हर आदमी 15 मिनट के लिए प्रसिद्ध हो सकता है.’ पत्नी ने कहा.
‘‘ओह, फोमो, यानी फियर औफ मिसिंग आउट के इस नाजुक दौर में आज की दुनिया का शायद यह कड़वा सच है?’’ पति ने मानो खुद को समझाया था. Relationship Story
लेखिका – राम नगीना मौर्य





