Hindi Stories: डोरबेल बजी तो चाय ले कर रसोई से निकलते मेरे कदम लौबी में ही ठिठक गए क्योंकि अमेय ने  बेडरूम से आ कर मुख्य दरवाजा खोल दिया था. सामने एक अपरिचित सुंदरी को देख में हैरान थी. ‘सर, कल होने वाली मीटिंग की ये फाइल्स. आप औफिस से निकल चुके थे, मैं ने सोचा आप को देती चलूं. कुछ करना हो तो.’

डोरबेल बजी तो चाय ले कर रसोई से निकलते मेरे कदम लौबी में ही ठिठक गए क्योंकि अमेय ने  बेडरूम से आ कर मुख्य दरवाजा खोल दिया था. सामने एक अपरिचित सुंदरी को देख में हैरान थी. ‘सर, कल होने वाली मीटिंग की ये फाइल्स. आप औफिस से निकल चुके थे, मैं ने सोचा आप को देती चलूं. कुछ करना हो तो.’

‘मुझे औफिस के काम के नाम पर लोगों का घर आना पसंद नहीं,’ अमेय ने रूखेपन से कहा तो लड़की सहम गई. मैं ने तुरंत आगे बढ़ कर स्थिति संभाली. ‘यहां टेबल पर रख दो फाइल्स.’ रख कर वह तुरंत तीर की तरह निकल गई. मेरी अनुभवी नजरों ने उस की आंखों को पनीली होते देख लिया था. भारी मन से ट्रे थामे मैं अमेय के पीछेपीछे उस के बेडरूम में प्रविष्ट हो गई. चाय पीते मैं ने उसे झिड़क दिया था, ‘ऐसे बात करते हैं लड़कियों से, यही सब सिखाया है मैं ने तुझे?’

‘दादी, आप को तो पता ही है कि काम के मामले में मैं कितना अनुशासित हूं. और यही अपेक्षा कंपनी के कर्मचारियों से रखता हूं. इस मामले में मैं कोई लैंगिक भेदभाव नहीं रखना चाहता. बस, इसीलिए.’

‘वैसे, है कौन यह?’

‘रशिका, कंपनी की नई एचआर.’ अमेय एक कौल सुनने लगा तो मैं अपने कमरे में लौट आई. वैसे भी, कहां हिम्मत जुटा पा रही थी मैं उसे वह खबर बताने की. पूरा दिन ही रोते गुजर गया था. यदि अमेय मेरी आंखें देखता तो अवश्य पकड़ लेता. इतना धोने के बाद भी अभी तक गुलाबी बनी हुई थीं. जिंदगी भी एक के बाद एक क्या रंग दिखा रही है.

सुबह कोरियर के साथ आया पत्र पढ़ते मेरे हाथ कांपने लगे थे. ‘उफ्फ, अब तो उठा ले मुझे. अब और क्याक्या दिखाएगा.’ साथ आया पैकेट खोलने की हिम्मत ही नहीं हुई थी. कपड़ों की अपनी अलमारी में मैं ने पार्सल और पत्र अच्छी तरह छिपा दिए थे. क्या अमेय को बताना उपयुक्त होगा? बताना तो पड़ेगा. उस की क्या प्रतिक्रिया होगी?

किशन ने खटखटाया तो मेरी तंद्रा भंग हुई. उसे डिनर में क्या बनाना है, बता कर मैं दसियों बार पढ़े जा चुके पत्र को फिर से पढ़ने लगी.

“प्रणाम माताजी,

“अत्यंत दुख के साथ सूचित कर रहा हूं कि आप की बहू और बेटी सुनंदा अब इस दुनिया में नहीं है. एक लंबी बीमारी के बाद पिछले महीने की 10 तारीख को उस का देहांत हो गया. उस की अंतिम इच्छाअनुसार उस के द्वारा छोड़ी गहनों की पेटी साथ छोड़े गए पते पर भिजवा रहा हूं. यह एक मां की ओर से उस की बहू को भेंट है. मैं नहीं जानता अमेय की शादी हो गई है या नहीं. बस, आशीर्वाद सहित उस की अमानत आप को सौंप रहा हूं. सुनंदा ने मुझ से जो वादा किया था, अंत तक निभाया. मेरा घरपरिवार संभाला. कभी अमेय को लाने की बात नहीं की. हालांकि उस के गंभीर रूप से बीमार हो जाने पर मैं पश्चात्ताप की अग्नि में झुलसने लगा था. सोचता रहा कि अमेय को लौटा लाऊं. पर साहस नहीं जुटा सका.

“मन में यह भय भी था कि आप और अमेय मुझे अपनाएंगे भी या दुत्कार देंगे. हां, सुनंदा के सम्मुख मैं ने अवश्य पश्चात्ताप कर लिया था. और तब उस ने अपनी यह अंतिम और एकमात्र इच्छा जताई थी. आप लोगों के सामने आने की हिम्मत नहीं है मुझ में. हो सके तो मुझे क्षमा कर दीजिएगा.

“अभागा मनोज.”

पत्र समाप्त करतेकरते मेरी आंखों से एक बार फिर गंगाजमुना बह निकली थी. सोच रही थी कि किशन रसोईबरतन समेट कर अपने कमरे में चला जाएगा तो अमेय को इस पत्र के बारे में सूचित करूंगी. देररात गए इसी इरादे से मैं अमेय के कमरे में गई. खुली हुई फाइलों में उलझा वह मोबाइल पर व्यस्त था. “सोया नहीं अभी तक?”

“नहीं दादी, बहुत काम पड़ा है. अपने नए प्रोजैक्ट के संदर्भ में कल क्लाइंट से बहुत जरूरी मीटिंग है और ढेर सारे पौइंट्स रह गए हैं. आप सो जाओ और किशन से कह दो, मेरे को गरम कौफी पकड़ा जाए.” किशन की घंटी बजा कर मैं थके कदमों से आ कर बिस्तर में घुस गई थी. कल की महत्त्वपूर्ण मीटिंग हो जाने दो. फिर बात करूंगी. तब तक मुझ में भी थोड़ी हिम्मत आ जाएगी.

सवेरे नाश्ते की टेबल पर अमेय फोन पर किसी को निर्देश दे रहा था, “प्रेजैंटेशन के सारे महत्त्वपूर्ण बिंदु मैं ने देररात तैयार कर डाले हैं. वह तो भला हो रशिका का जो घर फाइलें पहुंचा गई वरना तो…”, बात करते उस की नज़रें मुझ से टकराईं तो झेंप गया. चलो, अपनी गलती तो समझ आई इसे. अज्ञानी गलती छिपा कर बड़ा बनना चाहता है और ज्ञानी गलती सुधार कर. फोन रख कर अमेय मुझ से मुखातिब हुआ. “तारा दादी का फोन आया था उन की पोती की शादी हेतु. आप की कब की फ्लाइट करवानी है, बता देना.” उस के ‘आप की’ शब्द पर जोर देने का मतलब मैं समझ रही थी कि हमेशा की तरह वह मुझे अकेले ही भेजना चाहता है. कानों में पत्र के शब्द गूंजने लगे ‘ये गहने अमेय की बहू के लिए है. नहीं मालूम उस की शादी हो चुकी है या नहीं.’ यदि यही हाल रहा तो इस की शादी कभी होगी ही नहीं. रिश्तेनाते, शादीब्याह हर पारिवारिक अवसर से दूरी बना ली है इस लड़के ने.

“नहीं जा रही मैं भी.”

“क्यों? एक ही तो सगी बहन है आप की. उन्हें कितना बुरा लगेगा?”

“और तेरे तो 10-20 सगी दादियां हैं. एक की नहीं मानी तो क्या फर्क पड़ेगा? मैं ने ठान लिया है कि तू चलेगा तो ही मैं जाऊंगी.”

“क्या दादी, सब जानतेसमझते हुए भी बेकार की जिद कर रही हो, अपना दर्द जगजाहिर करने से क्या फायदा? मरहम एकआध घर में होता है, नमक घरघर में होता है.”

अमेय का दुख समझ मैं ने चुप्पी साध ली. वातावरण बोझिल हो गया था. अमेय चला गया. अब तो देररात ही लौट पाएगा. लंच क्लाइंट के साथ औफिस में ही लेगा. और यदि डील सफल रही तो रात को भी उन्हें होटल में डिनर करवा कर ही लौटेगा. बिजनैस अच्छा चल रहा है, रिश्ते भी अच्छे आ रहे हैं लेकिन अतीत है कि पीछा ही नहीं छोड़ रहा. अमेय शादी के नाम से ही बिदकने लगा है जबकि मुझे लवमैरिज से भी आपत्ति नहीं है.

पति के असामयिक देहांत के बाद मैं संभल ही रही थी कि बेटे राहुल ने सुनंदा को सामने ला कर खड़ा कर दिया था. मैं ने सहर्ष विवाह संपन्न करवा दिया था. पोते अमेय के जन्म ने मुझ में फिर जीवन भर दिया था. पर यह खुशी चार दिनों की ही थी. बेटेबहू में खटपट चल रही है, ऐसा आभास तो मुझे हो गया था लेकिन स्थिति तलाक तक पहुंच जाएगी, मैं ने सोचा नहीं था. तलाक का कारण था बेटे की प्रवासी प्रेमिका. मैं ने राहुल को खूब समझाया, डांटा. लेकिन वह सबकुछ छोड़छाड़ कर हमेशा के लिए विदेश चला गया. सुनंदा तो नौकरी कर ही रही थी पर फिर भी भविष्य की सुरक्षा हेतु मैं ने एक छोटा सा बुटीक आरंभ कर दिया था. मैं उसे बढ़ाने में इतना तल्लीन हो गई कि जान ही नहीं पाई कि मेरी बहू की जिंदगी में कोई और आ गया है.

एक दिन मैं ने उसे फोन पर गिड़गिड़ाते सुन लिया कि मुझे मेरे बच्चे से दूर मत करो. मेरे कान खड़े हो गए. सुनंदा से सबकुछ उगलवाया. हकीकत जान कर एक ओर तो मेरे हाथों के तोते उड़ गए, दूसरी ओर, खुद पर ग्लानि भी हुई. मैं ने कैसे सोच लिया कि मेरी युवा बहू ताउम्र मेरी तरह अकेले विधवा का जीवन गुजार लेगी? क्यों नहीं मैं ने उसे बेटी मान कर उस के लिए दूसरा वर खोजा? उस का सहकर्मी मनोज उस से शादी करना चाहता था पर वह अमेय को अपनाने के लिए तैयार नहीं था. मैं ने उसे आश्वस्त किया कि अमेय पूरी तरह से मेरी जिम्मेदारी होगा. मुझे यही सही पश्चात्ताप लगा.

एक सादे समारोह में मैं ने सुनंदा को बेटी की तरह विदा किया. विदाई से पूर्व वह अपने गहनों की पिटारी मुझे सौंपने आई जिसे मैं ने उसे बहू के रूप में सौंपा था. ‘आप की अमानत. अब मेरा इस पर कोई अधिकार नहीं है,’ यह कह कर वह रोने लगी.

‘समय कई घाव देता है. तभी तो घड़ी में फूल नहीं, कांटे होते हैं. पर समय हर समय को बदल देता है. बस, समय को थोड़ा समय चाहिए. पहले मैं ने तुझे ये गहने बहू के रूप में उपहार दिए थे और अब बेटी के रूप में दे रही हूं. अपनी सब से बड़ी अमानत, सब से कीमती गहना तो तुम मुझे सौंप कर जा रही हो. जिस के सहारे मैं पूरी जिंदगी खुशीखुशी गुजार दूंगी.’ गहनों का विचार आते ही मैं ने अलमारी खोल कर कल आया पार्सल निकाला. पैकिंग खोलते ही सामने चिरपरिचित बरसों पुरानी गहनों की पिटारी देख मेरी आंखें भर आईं. कांपते हाथों से मैं ने उसे खोला. अपना चंद्रहार, कर्णफूल, मांगटीका, चांदबाली, करघनी, बाजूबंद एकएक गहने को सहलाते मैं उस से जुड़ी स्मृतियों में डूबतीउतराती रही. कुछ शादी में सास ने दिए थे तो कुछ अलगअलग मौकों पर पति ने जुटाए थे. मुझे गहनों का बहुत शौक रहा है, इसलिए हर छोटेबड़े अवसर पर या थोड़े से पैसे जुडने पर वे मेरे लिए कोई न कोई गहना बनवा देते थे. ‘यह भी तो एक तरह की बचत ही है. अभी तुम पहन कर शौक पूरा कर लो, फिर बच्चों को दे देंगे.’ उन के जाते ही मेरे सारे शौक-अरमान खत्म हो गए थे और मैं ने पूरी पिटारी ज्यों की त्यों सुनंदा को सौंप दी थी. मन फिर अतीत से जुड़ गया था.

3 बरस के अमेय को सीने से चिपका कर सुनंदा फूटफूट कर रोई थी. शुरू में वह जल्दीजल्दी हम से मिलने आती रही. फिर यह अंतराल बढ़ने लगा. फिर एक दिन उस ने बताया कि उन की नौकरी दूसरे शहर में लग गई है. वहां से भी वह फोन करती रहती थी. फिर कभीकभी ही फोन आते. अमेय पढ़ाई में व्यस्त होता गया और सुनंदा अपनी नई गृहस्थी, नौकरी में. जो सच दुनिया जानती है वही अमेय भी जानता है.

हमें किसी से कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है. पर अमेय का प्यार, शादी आदि से विश्वास उठ गया है. न उसे पारिवारिक समारोहों में जाना पसंद है, न किसी लड़की के बारे में रुचि है. डोरबेल की आवाज से मैं चौकी. और तुरंत सब गहने समेट कर यथास्थान रख दिए. इस वक्त कौन होगा? किशन ने दरवाजा खोल दिया था. रशिका को देख मैं चौंक उठी.

“सर क्लाइंट के साथ डिनर कर के लौटेंगे. ये आज की डील की गोपनीय फाइल्स हैं. आप रख लीजिए’ रशिका लौटने लगी तो मैं ने कुछ सोच कर उसे रोक लिया. ‘चाय पी कर जाना. दरअसल अकेले चाय के घूंट मेरे गले से नहीं उतरते. इसलिए रोज अमेय के आने पर ही चाय पीती हूं.”

रशिका सकुचाते हुए आ कर बैठ गई. “यहां आप और सर 2 लोग ही रहते हैं? सर की फैमिली?”

“अभी अमेय की शादी नहीं हुई.” मैं शांत थी. और गौर से रशिका को निहार रही थी. मेरे गहने कल्पना में रशिका पर एकएक कर सजने लगे.

“आप मुझे ऐसे क्यों देख रही हैं? वैसे, आप का स्वभाव तो अच्छा है.”

मैं इस का मतलब भलीभांति समझ रही थी. “तुम भी औफिस के काम में अच्छी होने के साथसाथ बहुत व्यवहारकुशल भी हो.” मेरे प्रयास रंग लाए. वह खुलने लगी. “आप में मुझे अपनी दिवंगत दादी का अक्स दिखता है. वे मुझे खूब कहानियां सुनाती थीं. राजकुमारराजकुमारी की, परी की, दैत्य की, देवीदेवता की. आप भी सर को सुनाती होगीं?” उस ने भोलेपन से पूछा.

“‘बचपन में.”

“हां, मेरा वही मतलब था.” वह खिलखिला उठी. हंसते हुए वह मुझे और भी सुंदर लगी. एक कप चाय  के साथ मैं ने उस के बारे में सारी जानकारी जुटा ली. “तुम्हारे साथ वक्त का पता ही नहीं चला. वरना तो समय काटे नहीं कटता. ऐसे ही मिलने आती रहोगी तो मुझ पर बहुत एहसान होगा.”

“कैसी बातें कर रही हैं, आप? मैं जरूर आऊंगी.” जितनी बार रशिका मिलने आती. मेरी उसे बहू बनाने की इच्छा तीव्रतर हो जाती.

उस रात अमेय लौटा तो कपड़े बदल कर मेरे पास आ गया. और मेरी गोद में सिर रख कर लेट गया. अच्छे मूड में होने पर वह अकसर ऐसा करता है. मैं उस के बाल सहलाने लगी. “याद है जब तू छोटा था तो कहानी सुनने के लिए ऐसे ही मेरी गोद में आ कर लेट जाता था.”

“हां, वे फैंटेसी वाली कहानियां- एक राजकुमार था. उसे अपने पिता की जान बचाने के लिए बहुत दूर से एक विशेष प्रकार का फूल तोड़ कर लाना था. कई खतरनाक जंगल, पहाड़, समुद्र पार कर वह अपनी मंजिल के करीब पहुंचता है तो उसे कोई परी या देवी मिलती है. जो उसे वह फूल प्राप्त करने में मदद उपलब्ध कराती है. उस के बाद चेतावनी देती है कि फूल ले कर तुम सीधे चले आना. पीछे मुड़ कर मत देखना. चाहे कोई कितना भी पुकारे, चिल्लाए, तुम्हारा नाम ले, पर पीछे मुड़ कर मत देखना. अगर पीछे मुड़ कर देखोगे तो या तो किसी मुसीबत में पड़ जाओगे या पत्थर बन जाओगे या हमेशा के लिए वहीं रह जाओगे…”

“वाह, तुम्हें तो सब याद है, अमेय. तुम ने कभी सोचा कि उन सभी कहानियों में पीछे मुड़ कर न देखने की बात क्यों कही जाती थी, वह भी मंजिल के इतने समीप पहुंच कर?”

“नहीं.”

“वह इसलिए कि जब हम तमाम परेशानियों से जूझ कर अपनी मंजिल तक पहुंचने वाले हों तो उन सब बातों के बारे में न सोचें कि हमारे जीवन में क्या परेशानियां आईं, किस ने हमारे साथ क्या किया, किस ने आगे बढ़ने से रोका? क्योंकि ये सब नकारात्मक बातें सोच कर, सुन कर, याद कर के हम अवसाद में जा सकते हैं. यदि हम इन बातों को सुनने या याद करने लगे तो हमारे बढ़ते कदम रुक जाएंगे. हम कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे.” अमेय को गंभीर देख मैं ने उसे कल आए पार्सल और पत्र के बारे में भी बता दिया. जैसा कि स्वाभाविक था उस की आंखें भर आईं और वह गमगीन हो गया.

धीरेधीरे उस का सिर सहलाते मैं ने उसे अपने पास सुला लिया. अमेय दिल का बहुत अच्छा है. संवेदनशील है. थोड़ा और प्रयास करूंगी तो शादी के लिए भी मान जाएगा. शादी के खयाल से मेरे सामने फिर रशिका का चेहरा आ गया. क्यों न तारा दीदी वाली शादी में रशिका को साथ ले लिया जाए? दीदी भी परख लेंगी.

सवेरे नाश्ते की टेबल पर अमेय सामान्य था. उसे ‘परी हो तुम…’ गुनगुनाते सुन मेरे सामने रशिका का चेहरा कौंध गया. “बड़े रोमांटिक मूड में हो, अपनी परी से मुझे भी मिलवा दो.”

“आप ही हैं वो. राजकुमार को उस की मंजिल तक पहुंचाने में मदद करने वाली परी. दादी, मैं सोच रहा हूं तारा दादी वाली शादी में हमें 2 दिन पहले तो जाना ही चाहिए. तो मैं आज ही 2 टिकट करवा देता हूं. हम दोनों के. आप चलने की तैयारी करो.”

“अरे, पर तैयारी करेगा कौन? तुझे समय नहीं और मेरे हाथपैरों में जान नहीं. पोती के लिए साडी, गहना खरीदना होगा. वहां मुझे साड़ी आदि पहनाना होगा. नई जगह होगी तो वाशरूम भी किसी को साथ ले कर ही जा पाऊंगी. तू तो रशिका का भी टिकट करा दे.”

“क्या?”

“अरे, क्या क्या? मैं दे दूंगी उसके  टिकट के पैसे. मैं उस के अलावा किसी पर भरोसा नहीं कर सकती.”

“पर?”

“ठीक है, फिर मैं भी नहीं जा रही. तू नहीं समझता तो क्या, दीदी मेरी मजबूरी अवश्य समझ जाएंगी. मैं उन्हें कौल लगाती हूं.” मैं ने मोबाइल उठा लिया.

“नहीं, रहने दीजिए. मैं 3 टिकट करवाता हूं.

 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...