लियोनार्डो दा विंची का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में मोनालिसा या द लास्ट सपर जैसी पेंटिंग आती है लेकिन दा विंची सिर्फ चित्रकार नहीं थे, वो वैज्ञानिक, इंजीनियर और आविष्कारक भी थे. उनकी लिखी एक किताब आज भी दुनिया की सबसे महंगी बिकने वाली पांडुलिपियों में से एक है. इस किताब का नाम है Codex Leicester.
1994 में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में इसकी नीलामी हुई थी और यह नीलानी गिनीज बुक में दर्ज हो गई. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार 11 नवंबर 1994 को ये पांडुलिपि 3 करोड़ 8 लाख 25 हजार डॉलर में बिकी थी. आज के हिसाब से ये करीब 250 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है. इसे खरीदने वाले कोई और नहीं, माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट्स थे. उस समय किसी भी हाथ से लिखी हुई सचित्र पांडुलिपि के लिए यह सबसे बड़ी कीमत थी.
असल में तो यह कोई छपी हुई किताब नहीं है. यह दा विंची की खुद हाथ से लिखी हुई नोटबुक है. इसमें कुल 18 बड़ी शीट हैं जिन्हें मोड़ने पर 72 पन्ने बनते हैं. इन पन्नों पर दा विंची ने सन 1506 से 1510 के बीच अपने विचार लिखे थे. लिखावट भी अजीब है. उन्होंने मिरर राइटिंग में लिखा है. यानी उल्टी दिशा में लिखा है जिसे सिर्फ शीशे में देखने पर सीधा पढ़ा जा सकता है. शायद वो अपने विचारों को दूसरों से छिपाकर रखना चाहते थे.
दा विंची के लिखे इन 72 पन्नों में कोई एक विषय नहीं बल्कि पूरी दुनिया है. दा विंची ने पानी को बहुत ध्यान से देखा था. पानी कैसे बहता है. नदी में भंवर क्यों बनता है. पानी की गति कैसे नापी जाए. पुल के पाये से टकराकर पानी का बहाव कैसे बदलता है. इस पर उन्होंने कई चित्र बनाए हैं. इसके अलावा उन्होंने चंद्रमा की रोशनी पर भी लिखा है. उन्होंने बताया था कि चंद्रमा की चमक असल में सूरज की रोशनी का प्रतिबिंब है और पृथ्वी से टकराकर गई रोशनी भी चंद्रमा पर पड़ती है. ये बात उन्होंने दूरबीन के आविष्कार से भी 100 साल पहले लिख दी थी.
दा विंची ने जीवाश्म यानी फॉसिल के बारे में भी लिखा है. पांच सौ साल पहले के लोग जब पहाड़ों पर सीपीयां देखते थे तो हैरान होते थे. उस समय लोग मानते थे कि बाढ़ में बहकर सीपियां पहाड़ों पर चली गईं होंगी लेकिन दा विंची ने लिखा कि सीपीयां बाढ़ में बहकर पहाड़ों पर नहीं चढ़ी बल्कि ये समुद्र कभी वहीं था जहां आज पहाड़ हैं. यानी उन्होंने जियोग्राफी की सोच अपने समय से बहुत आगे रखी थी.
इस किताब की असली कीमत इसके पन्नों में नहीं बल्कि इस किताब के पन्नो में दर्ज सोच उस में है जो यह सवाल खड़े करती है कि 500 साल पहले एक आदमी बिना लैब और बिना कंप्यूटर के सिर्फ अपनी आंखों से प्रकृति को कैसे समझ रहा था. बिल गेट्स ने इसे खरीदने के बाद इसे अपनी निजी लाइब्रेरी में नहीं रखा बल्कि यह किताब हर साल अलग-अलग म्यूजियम में भेजी जाती है. ताकि लोग देख सकें कि विज्ञान और कला दो अलग चीजें नहीं हैं. दोनों एक ही जिज्ञासा से पैदा होती हैं.





