Romantic Movies: पिछले कुछ सालों में हिंदी और साऊथ के सिनेमा को देखें तो एक बदलाव दिखाई देता है. बड़े पर्दे का हीरो पहले जहां प्यार, रिश्तों, परिवार के बीच नजर आता था, वहीं अब वह अक्सर बंदूक, तलवार, गैंग, बदला और मारधाड़ करता दिखाई देता है. एनिमल, पुष्पा, और RRR जैसी फिल्मों ने अलग-अलग अंदाज में एक ऐसे सिनेमा को लोकप्रिय बनाया जिस में हीरो की ताकत, वौइलेंस और एक्स्ट्राऔर्डिनरी पावर कहानी का बड़ा आकर्षण बन जाती हैं. इसके मुकाबले रोमांस कई बार कहानी का छोटा हिस्सा बनकर रह जाता है. दर्शक ऐसे किरदारों को पसंद कर रहे हैं जो समस्याओं को बातचीत से नहीं बल्कि ताकत से सुलझाते हैं. इससे पूरे सिनेमा का मूड बदल गया है. बॉक्स ऑफिस के आंकड़े भी बताते हैं कि ऐसी फिल्में अच्छी कमाई कर रही हैं. इसलिए निर्माता भी इसी फॉर्मूले को दोहराने में जुटे हुए हैं
लेकिन सवाल यह है कि क्या दर्शक सचमुच रोमांस से ऊब गया है? क्या आज के दर्शक को प्रेम कहानी में वह रोमांच नहीं मिलता जो एक्शन और हिंसा में मिलता है?
2000 का दशक: नरम और रोमांटिक फिल्में
2000 के दशक का हिंदी सिनेमा आज के मुकाबले काफी अलग था. उस दौर में रोमांटिक फिल्मों की एक पूरी जनरेशन थी. जब वी मेट जैसी फिल्म में शाहिद कपूर का आदित्य ऐसा हीरो था जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी सेंसिटिविटी थी. वह किसी गैंग से नहीं लड़ रहा था, किसी अपराधी का पीछा नहीं कर रहा था और उसके हाथ में बंदूक भी नहीं थी. उसकी लड़ाई उसके अपने भीतर चल रही थी. आदित्य का किरदार इसलिए याद रह जाता है क्योंकि वह एक आम इंसान जैसा लगता है. वह परेशान है, चुप है, जिंदगी से निराश है. गीत से मिलने के बाद उस के जीवन में बदलाव आता है. फिल्म का रोमांच इस बात में है कि दो अलग-अलग लोग एक-दूसरे की जिंदगी को कैसे बदलते हैं. यहां किसी दुश्मन को हराने के बजाय व्यक्ति खुद को समझने की कोशिश करता है.
उस दौर की कई फिल्मों में यही बात दिखाई देती थी. कल हो न हो, हम तुम, जिंदगी न मिलेगी दोबारा, बर्फी और वेक अप सिड जैसी फिल्मों में मारधाड़ से ज्यादा इमोशंस ज्यादा दिखाई देते थे.
आज के हीरो क्लीन शेव्ड नहीं
आज सिनेमा की बड़ी फिल्मों में हीरो को अक्सर एक असाधारण व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है. वह सामान्य आदमी से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है. उसके सामने दर्जनों लोग खड़े हो सकते हैं, लेकिन वह अकेले सबको हरा सकता है. उसके ऊपर हमला हो सकता है, लेकिन वह फिर उठकर लड़ता है.
एनिमल मूवी इसका एक उदाहरण है. फिल्म में रिश्ते और परिवार मौजूद हैं, लेकिन कहानी का केंद्र एक ऐसे मेल रोल के गुस्से, जुनून, हिंसा और पिता के साथ उसके खराब रिलेशनशिप पर है. पुष्पा में अल्लू अर्जुन का स्टाइल और एक्शन सीन चर्चा में रहे. आरआरआर में भी बड़े पैमान पर एक्शन और ड्रामा था.
ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं. इससे साफ है कि दर्शक अब ऐसे किरदार चाहते हैं जो ताकतवर और आक्रामक दिखें.
क्या दर्शक सचमुच हिंसा देखना चाहता है?
थिएटर में बैठी औडियंस जानती है कि वह एक वर्चुअल दुनिया देख रही है. एक बड़ा कारण यह है कि असल जिंदगी में लोगों के आसपास हिंसा कम हो गई है. शहरों में कानून-व्यवस्था पहले से बेहतर हुई है. रोजमर्रा की जिंदगी में झगड़े या खून-खराबा कम दिखता है. ऐसे में फिल्मों में दिखने वाले बड़े एक्शन सीन दर्शकों को ज्यादा रोमांचक लगते हैं.
रोमांस अब नौर्मल हो चला है
रोमांस अब बहुत आम हो गया है. सोशल मीडिया, वेब सीरीज और रोज की जिंदगी में प्यार-मोहब्बत की कहानियां हर तरफ हैं. लेकिन कहानी में दम नहीं. आज डेटिंग के जमाने में लड़के और लड़कियां इतन आजाद हैं कि रिलेशनशिप में और रिलेशनशिप के बिना आज सैक्स नौर्मल हो गया है, ऐसे में पर्दे का रोमांस उतना रोमांचक फील नहीं होता. लोगों को अब गूसबम्प्स रोमांस से नहीं बल्कि हीरो के गुस्से वाले डायलॉग और एक्शन से आते हैं. पुष्पा का स्टाइल इसका अच्छा उदाहरण है.
सोशल मीडिया ने फिल्मों की भाषा कैसे बदल दी?
आज किसी फिल्म को केवल थिएटर में नहीं देखा जाता. उसका प्रचार सोशल मीडिया पर शुरू होता है और कई बार फिल्म रिलीज होने से पहले ही उसके सबसे अट्रैक्टिव विजुअल्स वायरल हो जाते हैं.
हीरो की एंट्री, एक दमदार डायलॉग या एक बड़ा फाइट सीन कुछ सेकंड में सोशल मीडिया पर हजारों बार शेयर हो सकता है. इससे मेकर ऐसी चीजों को महत्व देते हैं जो लोगों का ध्यान खींचे.
रोमांस के साथ समस्या यह है कि उसकी खूबसूरती कई बार धीरे-धीरे सामने आती है. दो किरदारों के बीच बनता रिश्ता पांच सेकंड की क्लिप में पूरी तरह समझाना मुश्किल है. इसलिए सोशल मीडिया ने सिर्फ दर्शकों की पसंद नहीं बदली है, बल्कि फिल्म बनाने वालों की सोच भी बदली है.
अगर रोमांस आज कमजोर दिखाई दे रहा है तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि फिल्म निर्माता प्रेम कहानी को नए तरीके से खोजने में उतना जोखिम नहीं ले रहे हैं. एक्शन में नए स्टंट और नई तकनीक के जरिए लगातार कुछ नया दिखाया जा सकता है. रोमांस में नया करने के लिए लेखन की जरूरत होती है.
साउथ फिल्मों का बढ़ता प्रभाव
भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय फिल्मों की सफलता ने भी हिंदी सिनेमा की भाषा बदल दी है. पुष्पा, RRR, KGF और बाहुबली जैसी फिल्मों ने बड़े पैमाने पर यह साबित किया कि भारतीय दर्शक असाधारण एक्शन को पसंद कर सकता है.
स्टारडम भी बदल गया है
एक समय अभिनेता का स्टारडम रोमांटिक गानों और प्रेम कहानियों से भी बन सकता था. आज अभिनेता से फिजिकल अपीयरेंस, एक्शन ट्रेनिंग और अलग-अलग लुक की उम्मीद की जाती है.
फिल्म की रिलीज से पहले अभिनेता के जिम वीडियो, ट्रेनिंग क्लिप, बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन और एक्शन सीक्वेंस की झलक प्रमोशन का हिस्सा बन जाते हैं. Romantic Movies





