केवल 7 दिन धर्म को त्याग कर दीजिए , 7 दिन तक कोई धर्म कांड मत कीजिए , 7 दिन के लिए भूल जाइए कि कोई इश्वर है. यकीन मानिये जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ेगा. 7 दिन विज्ञानं का वहिष्कार कीजिए, विज्ञानं के बनाए फ्रिज, मोबाइल और गाड़ियाँ आदि का इस्तेमाल मत कीजिए. हैसियत पता चल जाएगी आपकी.
विवेक मौर्या के फेसबुक पेज पर ऐसी एक नहीं बल्कि दर्जनों रील मौजूद हैं जो धर्म के खोखलेपन के साथ साथ उन कपोलकल्पित किस्से कहानियों और गप्पों की भी पोल खोलती हैं जिनके चलते करोड़ों पंडे पुजारी मुफ्त की दूध मलाई और हलवा पूरी चट कर रहे हैं. मंदिरों की जरूरत और हकीकत पर करारी चोट करते हुए विवेक कहते हैं –
मन्दिरों का निर्माण केवल इसलिए किया गया ताकि ब्राह्मणों को मुफ्त का भोजन और दक्षिणा मिलती रहे और आम जनता अन्धविश्वास और पाखंड में फंसी रहे. क्यों कि अगर भगवान सर्वशक्तिमान है और हर जगह हैं तो उन्हें खुश करने के लिए बीच में दलाल ब्राह्मणों की जरूरत क्यों है. अगर भगवान ने सब कुछ बनाया है तो फिर उन्हें दक्षिणा की जरूरत कहाँ है और भगवान सच में सर्वशक्तिमान है तो क्या वे बिना दक्षिणा के आप की प्रार्थना सुन ही नहीं सकते. फिर सवाल भगवान पर नहीं उस ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर उठता है जिसमे भगवान के नाम पर दक्षिणा ली जाती है. किसी आस्तिक के पास इसका जवाव हो तो कमेंट में जरुर बताइए.
विवेक के फेसबुक पर कोई 25 हजार फालोअर हैं. कुछ ने उनकी इस रील से भी सहमति जताई और अपनी अपनी बात भी कही जिनका सार यह था कि यह बिजनेस है, कारोबार है. लेकिन कुलवीर भाटिया नाम के यूजर ने वह कमेंट किया जो आज से कोई 55 साल पहले ओशो ने कहा था कि मंदिरों से दान पेटियां हटा लो फिर देखो उनमे ताले लग जाएंगे.
यानि आज की जेन जी वे सवाल उठा रही है जो 70 – 80 के दशक में सरिता ने प्रमुखता से उठाए थे और अब तक उठा रही है. लेकिन दशकों बाद युवाओं का इन्हें पूछा जाना लिखे हुए की महत्ता और सार्थकता ही प्रदर्शित करता है.
सालों बाद बल्क में तर्क किए जा रहे हैं. जिन धार्मिक गप्पों और गप्पियों ने देश में लूट मचा रखी है , आम लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा जमा रखा है ,अक्ल पर ताला लगा रखा है. वह यह जनरेशन तोड़ने में जुट गई है. एक नहीं हजारों विवेक सोशल मीडिया पर धर्म और पाखंडों की पोल खोल रहे हैं .
इस पर भक्त, अंधभक्त, पूजा पाठी और किस्म किस्म के बाबा बगैरह सब खामोश हैं. इसकी पहली वजह तो यह है कि उनके पास जेन जी के सवालों के जबाब और तर्कों की काट नहीं. दूसरे वे सब के सब इन युवाओं और काकरोचों का जलवा और जूनून देख चुके हैं जिसके चलते इस जिद्दी सरकार के अडियल मुखिया को झुकना पड़ा था. आरएसएस प्रमुख को भी जेन जी से संवाद करने के लिए मजबूर होना पड़ा था.
सोचा जाना लाजिमी है कि जंतर मंतर प्रोटेस्ट के पहले क्यों संवाद की या हेलो फ्रेंड्स कहने की जरूरत किसी को नहीं पड़ी. 12 साल क्यों किसी ने इनकी सुध नहीं ली और अब ऐसा क्या हो गया कि तमाम भगवा गैंग जेन जी के सामने घुटनों के बल आ रही है. इस सवाल का जबाब बेहद साफ़ है कि प्रोटेस्ट के बाद युवाओं के दिलोदिमाग से धर्म का, उसके ठेकेदारों का दुकानदारों का और योगी, मोदी, शाह सहित भागवत का भी डर और लिहाज दोनों खत्म हो गए हैं
अब ये काकरोच अपनी पर आ गए हैं. इन्हें समझ आ रहा है कि मनुवाद और वर्ण व्यवस्था थोपने का धर्म और राजनीति का घालमेल देश को पीछे बहुत पीछे ले जा रहा था. इसलिए इन्होने उसकी कमजोर नब्ज पकड़ अपनी बात कहना शुरू की .सोशलमीडिया पर ताबड़तोड़ तरीके से गाय और गोबर बाली मानसिकता की छिलाई की जा रही है.
धर्म की पोल खोलते सवाल किये जा रहे हैं. ऐसे हजारों सवाल सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं जिनके जबाब किसी पंडित, ज्ञानी, ऋषि, मुनि, बाबा या शंकराचार्य के पास नहीं . एक सवाल विवेक का ही देखिए जिसमे वे पूछ रहे हैं कि सीता स्वयम्वर के समय जो शिव धनुष राम के पास लाया गया था उसे राम के सिवाय किसी और के न उठाने का दावा किया जाता है तो जो इसे राम के पास लाए थे उन्होंने इसे उठाया ही तो होगा.
एक और सवाल एक दलित युवती यह पूछ रही है कि चलिए मान लिया ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय छाती से, वैश्य पेट से और दलित पैरों से पैदा हुए. लेकिन बताओ यह कि वे प्रिगनेंट कैसे हुए थे .रंजना सिंह के फेसबुक पर 60 हजार फालोअर हैं वे पूछती हैं कि शंकर जी अपने बेटे को नहीं पहचान पाए थे, राम भी अपने बेटे को नहीं पहचान पाए थे और आपको क्या लगता है, एक कलश ( लोटा ) पानी शिवलिंग पर डाल देने से भगवान आपको पहचान जायेंगे
.साढ़े तीन लाख से ज्यादा फालोअर रखने बाली आयुषी यादव ने राममन्दिर चढ़ावा घोटाले के बाद ताना कसा था कि अच्छा हुआ जो भगवान राम लंका बंदरों की सेना लेकर गए थे आदमियों की लेकर जाते तो आधे से ज्यादा तो लंका का सोना देख रावण की तरफ हो गए होते.
जेन जी के सवालों का सिलसिला चलता रहेगा उनके ताने भी जारी रहेंगे और धार्मिक सड़ांध के प्रति उनका आक्रोश अब खत्म होने बाला नहीं. इसलिए चिंता अब भागवत और मोदी सहित दान दक्षिणा की खाने बाले बाबाओ पंडे पुजारियों को करनी चाहिए क्योंकि इनकी तादाद 21 करोड़ के लगभग है. ये तार्किक और वैज्ञानिक सोच बाले ही भारत को विश्वगुरु बना सकते हैं.

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