Indian Culture: जंतर-मंतर पर सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान रुचिका सिंह नाम की एक लड़की ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया. वीडियो वायरल हुआ. नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर कहा कि यह उनके लिए ‘कल्चरल शॉक’ जैसा है. हमारी बेटियाँ ऐसी भाषा कैसे बोल सकती हैं? यह घटना निंदनीय है लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या यह वाकई भारतीय संस्कृति के लिए एक नया झटका है? या इसकी जड़ें इसी महान संस्कृति से निकली हैं?
एक लड़की के मुंह से निकली गाली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कल्चरल शोक्ड लगा. उन्होंने इंस्टाग्राम पर लाईव आकर अपना शोक प्रकट किया. मेनस्ट्रीम मीडिया में भी लड़कियों के इस बर्ताव पर खूब चर्चा हुई. संस्कृति के रक्षक लगातार घड़ियाली आंसू बहाने में लगे हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है की औरतों को लेकर जो गालियां हजारों सालों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहीं उससे किसी को सांस्कृतिक झटका क्यों नहीं लगता?
बीजेपी ने तो गालियां देने के लिए आई टी सेल बना रखा है जिसे अमित मालवीय चलाते हैं. इस आईटी सेल का काम ही विरोधियों को माँ बहन की गंदी गंदी गालियां देना है. शोशल मीडिया पर किसी भी सेकुलर पत्रकार के वीडियो के नीचे के कमेंट पढ़ लीजिये या उनके अनुभव पूछ लीजिये. दिन भर उन्हें माँ बहन की गालियां दी जाती हैं. ये कौन लोग हैं? स्वयं नरेंद्र मोदी ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो औरतों को भद्दी भड्डी गालियां देते हैं.
बॉलीवुड की एक एक्ट्रेस को भी लगा झटका
भूमि पेडनेकर बॉलीवुड की एक एक्ट्रेस और क्लाइमेट एक्टिविस्ट हैं. उन्होंने 2015 में फिल्म दम लगा के हईशा से बॉलीवुड डेब्यू किया. अक्षय कुमार के साथ उन्होंने टॉयलेट एक प्रेम कथा में भी काम किया था. भूमि को नेशनल फ़िल्म अवार्ड, फिल्मफेयर अवार्ड, IIFA जैसे कई अवॉर्ड मिल चुके हैं. यही बॉलीवुड एक्ट्रेस इस वक़्त चर्चा में हैं. उन्हें भारतीय संस्कृति की चिंता हो रही है इसलिए वे आज के युवाओं को कोस रहीं हैं.
भूमि पेडनेकर ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया. इसमें उन्होंने सीजेपी आंदोलन के दौरान लड़कियों द्वारा दी गई ग़ालियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि “इस तरह गालियाँ नहीं देनी चाहिए. क्या हम घर के बड़ों से भी ऐसे बात करते हैं? क्या अपशब्दों का सहारा लेना सही है? यह हमारी संस्कृति नहीं है, यह गलत है. हमारी संस्कृति और मूल्य हमारी रीढ़ हैं, उनसे दूर नहीं जाना चाहिए. प्रधानमंत्री देश के सबसे ऊँचे पद पर हैं, उनके लिए ऐसी भाषा गलत है”
इस वीडियो के अपलोड होने के बाद भूमि की पुरानी एक्टिंग टीचर श्रुति देसाई ने उन्हें टैग करके पोस्ट किया. श्रुति ने लिखा कि “वे मुंबई के एक फिल्म स्कूल में भूमि की टीचर रहीं. उन्हें याद है कि भूमि अपने टीचर्स के प्रति कितनी असम्मानजनक और तिरस्कार से भरी थीं” इस पोस्ट में श्रुति देसाई ने भूमि से पूछा कि इज्जत और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को लेकर भूमि का नजरिया अब कैसे बदल गया और इतने कम समय में सोच में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया?
माँ बहन की गालियां महान संस्कृति का अभिन्न हिस्सा
बीजेपी लगातार यह नैरेटिव बना रही है कि लड़कियाँ गलत संस्कारों की वजह से गालियाँ दे रही हैं. यह भारतीय संस्कृति के खिलाफ है लेकिन सच्चाई इसके बिलकुल उलट है. भारतीय संस्कृति में गालियों का लंबा इतिहास रहा है. धर्मग्रंथों में शूद्रों और महिलाओं के लिए अपमानजनक बातें लिखी गई हैं. तुलसीदास के रामचरितमानस में ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी को ताड़न के अधिकारी जैसे तमाम दोहे लिखे पड़े हैं. मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में भी महिलाओं और निचली जातियों के बारे में कई ऐसी बातें हैं जिन्हें सभ्य समाज में दोहराना भी मुश्किल है.
मनुस्मृति जैसी किताब सदियों तक हिंदू समाज में सामाजिक कानून की किताब मानी जाती रही. इसमें औरतों के बारे में बिलकुल वाहियात और घिनौनी बातों की भरमार है. मनुस्मृति 9.3 में लिखा है, बचपन में पिता, जवानी में पति, बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करे। स्त्री कभी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है” मनुस्मृति 9.17 के अनुसार स्त्री के लिए पति ही देवता है, पति ही गुरु है, पति ही धर्म है”
औरतों के बारे में इस्लाम भी हिन्दू धर्म से ज्यादा अलग नहीं है. दोनों ओर मानसिकता एक जैसी है. कुरान 4:34 के अनुसार पुरुष स्त्रियों के संरक्षक हैं इसलिए जिन औरतों के नाफरमानी का डर हो उन्हें समझाओ, बिस्तर अलग कर दो और तब भी न माने तो उन्हें मारो” बुखारी की हदीस नंबर 2658 में लिखा है, “मैंने जहन्नम में देखा, उसकी ज्यादातर औरतें थीं क्योंकि औरतें अपने पतियों की नाशुक्री करती हैं”
ईसाइयत की बाइबिल में लिखा है- तीमुथियुस 2:11-12 “स्त्री मर्द के अधीन रहकर चुपचाप सीखे मैं स्त्री को उपदेश देने या पुरुष पर अधिकार जमाने की आज्ञा नहीं देता” कुरिन्थियों 11:3 के अनुसार “हर पुरुष का सिर मसीह है और स्त्री का सिर पुरुष है” उत्पत्ति 3:16 में लिखा है “हव्वा के कारण पाप आया इसलिए तेरी लालसा तेरे पति के लिए होगी और वह तुझ पर हमेशा मालिकाना हक रखेगा”
हिंदू धर्मग्रंथों में शूद्रों और औरतों के लिए सीधी-सीधी अपमानजनक भाषा मौजूद है. ये कोई छिपी बात नहीं, बल्कि सैकड़ों साल पहले लिखे गये छंद हैं जिनका समाज पर गहरा असर आज तक है. मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में लिखा है कि वे स्वभाव से ही पुरुषों को बहकाने वाली होती हैं, झूठी होती हैं इसलिए धर्म के ज्ञान से वंचित रखी जानी चाहिए. शूद्रों के बारे में कहा गया है कि अगर वे वेद सुनें तो उनके कानों में पिघला सीसा डाल देना चाहिए, अगर बोलें तो जीभ काट लेनी चाहिए. शूद्र को ब्राह्मण की सेवा के लिए पैदा किया गया है.
इन धर्मग्रंथों के अनुसार महिलाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं मिलना चाहिए और उन्हें स्वतंत्रता भी नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि औरतें अशुद्ध और पाप का स्रोत होती हैं. महाभारत, पुराणों और कई स्मृतियों में भी ऐसी ही भाषा मिलती है जहाँ औरतों को नीचा दिखाया गया है. आंबेडकर ने इन्हीं ग्रंथों को पढ़कर कहा था कि हिन्दू धर्मग्रन्थ समानता के असली दुश्मन हैं. असल में ये धर्मग्रन्थ उस समय के सत्ताधारी वर्ग के ब्राह्मण पुरुषों की सोच का दस्तावेज हैं. उन्होंने धर्म के नाम पर अपनी श्रेष्ठता और बाकियों की गुलामी को जायज ठहराया. अगर कोई किताब किसी वर्ग को जानवर बताए या औरतों को सजा का अधिकारी माने तो उसे पवित्र कहना या संस्कृति का आधार बताना खुद एक हिंसा है.
गालियाँ कोई नई बात नहीं हैं
राजनीतिक लड़ाई में दोनों तरफ से अपशब्द का इस्तेमाल होते रहे हैं. सड़कों की बात तो दूर की है संसद के अंदर माँ बहन की गालियां दी गईं हैं और यह भद्दी भद्दी गालियां औरतों ने नहीं दी बल्कि जनता के चुने हुए पुरुष प्रतिनिधियों ने दी हैं. अंधविश्वास, पाखंडवाद, दक्षिणा के नाम पर बिना मेहनत के हरामखोरी, शूद्रों, दलितों और औरतों के खिलाफ भद्दी भद्दी गालियां यह सब बातें भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही हैं और आज तो बीजेपी की आईटी सेल लगातार इस सांस्कृतिक विरासत का ही इस्तेमाल कर रही है. विपक्षियों और निष्पक्ष पत्रकारों के खिलाफ गाली-गलौज और ट्रोलिंग यह उसी संस्कृति की देन ही हैं.
असल में संस्कृति कोई शुद्ध और पवित्र जैसी चीज कभी नहीं रही. लोकगीतों, कहावतों, नाटकों और रोजमर्रा की भाषा में गालियाँ और अपमान हमेशा रहे हैं. औरतों को रंडी, कुलटा, छिनाल जैसे शब्दों से नवाजा गया. दलितों के लिए चमार, भंगी और शूद्र जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया. आज भी भारत की कई भाषाओं में सबसे गंदी गालियाँ माँ, बहन और औरतों के अपमान से जुड़ी हैं. ये गालियाँ सिर्फ गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि पितृसत्तात्मक संस्कृति की उपज हैं. इस संस्कृति के अनुसार तो औरत की इज्जत मर्दों की संपत्ति होती है इसलिए औरत को नीचा दिखाकर पुरुष अपनी ताकत जताता आया है. अगर एक लड़की द्वारा दी गई गाली सांस्कृतिक झटका है तो फिर सालों से चल रही इस भाषाई हिंसा पर चुप्पी क्यों? संस्कृति की रक्षा का दावा तभी तक जायज है जब वह सभी जगह एक समान लागू हो.
गाली देना किसी भी सभ्य समाज के लिए बेहद विडंबना की बात है लेकिन यह मापदंड सभी जगह एक समान लागू होना चाहिए. बीजेपी का आईटी सेल विरोधियों को माँ बहन की गालियां दे तो यह कल्चरल शौक नहीं लेकिन अगर प्रोटेस्ट में कोई लड़की गाली देती हैं तो अचानक संस्कृति खतरे में पड़ जाती है. इसी संस्कृति की वजह से औरतें हमेशा से खतरे में जीती रहीं. पति परमेश्वर होता है, नारी का धर्म पति की सेवा है, माँ बनना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है, औरतों को तेज नहीं बोलना चाहिए, लड़कियों को खुलकर नहीं हंसना चाहिए. ये सब बातें भारतीय संस्कृति में ही पिरोई हुई हैं. सच बात तो यह है कि जब लड़कियाँ किसी भी मंच से अपना विरोध दर्ज कराती हैं तो असल में वे उस पुरानी जंजीर को तोड़ रही होती हैं जो कहती थी कि औरत को शांत और शालीन रहना चाहिए. Indian Culture





