Cockroach Janata Party: कॉकरोच जनता पार्टी के हाथों बुरी तरह पिट चुकी मोदी सरकार अब इसके संस्थापक अभिजीत दीपके और अन्य सदस्यों की चौतरफा घेराबंदी में जुटी है. दिल्ली के जंतर मंतर पर देश की ध्वस्त शिक्षा प्रणाली और पेपर लीक के खिलाफ चले आंदोलन में एक 12 वर्षीय नाबालिग को शामिल करने पर जीरो एफआईआर दर्ज की गई है. यह एफआईआर सौरभ और अभिजीत के खिलाफ पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज हुई है. पश्चिम बंगाल की एक वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने आरोप लगाया है कि 20 जुलाई को जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान एक 12 साल की बच्ची को लाया गया, जिसके साथ पुलिस लाठीचार्ज में बदसलूकी हुई.

रिंकी चटर्जी सिंह ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी छोटी उम्र की बच्ची को प्रदर्शन में कौन लेकर आया? उनका कहना है कि इस उम्र का बच्चा ‘देखभाल और सुरक्षा की जरूरत वाला बच्चा’ माना जाता है, इसलिए आयोजकों के खिलाफ पोक्सो एक्ट की धारा 13, 14 और 15 तथा बीएनएस की धारा 153 के तहत मामला दर्ज होना चाहिए.

वकील ने यह भी सवाल उठाया कि इस प्रदर्शन के लिए पैसा कहां से आ रहा है और इसे कौन फंड कर रहा है? उन्होंने इसे “डीप स्टेट” की साजिश बताते हुए कहा कि कुछ दलाल और देश विरोधी ताकतें मोदी सरकार को गिराने के लिए एकजुट हो गई हैं.

कितनी हैरानी की बात है कि इस वकील ने उन पुलिस अधिकारियों और पुलिस जवानों पर कोई आरोप नहीं लगाए जिन्होंने कानून का नाजायज इस्तेमाल कर बच्चों को कील लगी लाठियों से पीटा? उन्होंने पुलिस और सरकार से नहीं पूछा कि 12 साल की बच्ची से बदसलूकी क्यों की गयी? उन्होंने नहीं पूछा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले और सरकार से अच्छी शिक्षा की मांग करने वाले बच्चों पर किसके कहने पर लाठीचार्ज हुआ? आंदोलन को कुचलने की कोशिश किन अधिकारियों ने किन नेताओं के इशारे पर की?

जिन पुलिसकर्मियों ने बच्चों के साथ बर्बरता की, एफआईआर उन पर होनी चाहिए या अभिजीत दीपके पर? इस सवाल का ठीक जवाब कोई निरक्षर भी दे देगा, मगर वकील साहिबा को कानून की मोटी मोटी किताबें पढ़ने के बाद भी असली अपराधी कौन हैं, यह समझ में नहीं आ रहा?

हैरानी की बात है कि शिकायतकर्ता पुलिस की भूमिका पर बिलकुल मौन है. उसने यह नहीं पूछा कि बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी, न यह कि नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में पुलिस विफल क्यों रही? उसका पूरा निशाना केवल आंदोलन के आयोजकों पर केंद्रित दिखाई देता है.

इस तरह की एफआईआर अभी कॉकरोच जनता पार्टी के खिलाफ देश भर में होंगी क्योंकि सरकार को यह बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि देश की जेन-जी जिसे वे अभी तक मूर्ख समझ रही थी और जिसे धर्म के मकड़जाल में उलझाए हुए थी, वह सीना तान कर न सिर्फ सरकार से सवाल पूछ बैठेगी, बल्कि उसमें सरकार को हिला देने की अपार शक्ति भी है.

रिंकी चटर्जी सिंह द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर से एक बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है? क्या शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को कानून की धाराओं में उलझाकर खामोश करने की नई परंपरा शुरू हो चुकी है?

मामला केवल एक एफआईआर का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल का है. यदि हर विरोध प्रदर्शन के बाद आयोजकों पर गंभीर आपराधिक धाराएं लगाने का सिलसिला शुरू हो गया, तो क्या भविष्य में कोई नागरिक सरकार से सवाल पूछने का साहस करेगा?

इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिन लोगों पर एफआईआर होनी चाहिए वे अभी तक जांच के दायरे से बाहर हैं, जबकि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले कटघरे में खड़े किये जा रहे हैं. सत्ता का संदेश साफ है – शिक्षा व्यवस्था पर सवाल मत उठाइए अन्यथा आपके लिए कानून की नई-नई धाराएं खोज ली जाएंगी. Cockroach Janata Party

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