Kanwar Yatra Controversy: यह नया भारत है जहाँ अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे क्षात्रों को डंडे से पीटा जाता है और सड़कों पर धर्म का नंगा नाच करने करने वाले कांवडियों के लिए हेलीकोप्टर से फूल बरसाये जाते है, पुलिसवाले पैर दबाते हैं और बड़े बड़े अधिकारी उनकी सेवा में लगे रहते हैं. कांवड़िये उत्पात करें, गाड़ी तोड़े या सड़कों को जाम करें, खुली छूट है.
हरिद्वार के मंगलौर में 1 अगस्त 2026 की शाम को एक आल्टो कार हरिद्वार से दिल्ली की तरफ जा रही थी. कार का ड्राइवर खुद कांवड़िया था और गंगाजल लेकर लौट रहा था. पैदल चल रहे एक कांवड़िए की कांवड़ कार से टकरा गई और टूट गई. इसके बाद नाराज कांवड़ियों की भीड़ जमा हो गई. उन्होंने कार ड्राइवर से मारपीट की और उसकी गाड़ी तोड़ दी. करीब 40 मिनट तक नेशनल हाईवे जाम रहा. एंबुलेंस और आम लोग फंसे रहे. मौके पर पुलिस पहुंची लेकिन शांति बनाए रखने के नाम पर दोनों पक्षों को समझाकर मामला रफा-दफा कर दिया. कार ड्राइव करने वाला शक्श खुद कांवड़ लेकर निकला था. अगर यही कार किसी छात्र की होती तो लाठीचार्ज और जेल पक्की थी.
कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों लोग गंगाजल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में यह यात्रा सड़क पर कब्जा, हिंसा और कानून का खुला मज़ाक बन चुकी है. साइड टच या छोटी सी टक्कर पर कार तोड़ना, मारपीट करना यह भक्ति नहीं, गुंडागर्दी है. हरिद्वार वाली घटना में खुद कांवड़िया ड्राइवर था, फिर भी भीड़ ने कार तोड़ी और पीटा. पुलिस आई, एक गिरफ्तार हुआ बाकी की तलाश जारी है लेकिन सवाल यह है क्या हर छोटी घटना पर इतनी हिंसा जायज है?
दूसरी तरफ छात्र परीक्षा सुधार को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो डंडे पड़ते हैं, लाठीचार्ज होता है और गिरफ्तारियां होती हैं. वहीं कांवड़ियों के लिए सड़कें खाली कर दी जाती हैं. स्कूल बंद कर दिए जाते हैं. अधिकारी फूल बरसाते और पुलिस सेवा में लगी रहती है. भाजपा सरकारें इस खुशामद को धर्म की रक्षा बताती हैं.
नेशनल हाईवे पर जगह-जगह कांवड सेवा शिविर लगे हैं. जहाँ IAS, IPS, DM, SP खुद पानी पिला रहे हैं और पैर दबा रहे हैं. ड्रोन से निगरानी रखी जा रही है. सरकारी खजाने से करोड़ों का खर्च हो रहा है और मीडिया इसे आस्था का सम्मान बता कर तय कर रही है कि किसे भक्त बोलना है और किसे उपद्रवी. मतलब साफ है. जब छात्र प्रोटेस्ट करते हैं तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” कहकर पीटा जाता है और जब सड़क पर हुड़दंग होता है तो उन्हें इनाम दिया जाता है.
असल में तो धर्म को सत्ता की ढाल बना दिया गया है. कानून अंधा नहीं है बल्कि सरकार ने उसे अंधा कर दिया है. IPC की धारा 427 सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले पर लगाई जाती है. जंतर मंतर प्रोटेस्ट के दौरान इस क़ानून के अलावा IPC की कई धाराओं के तहत FIR दर्ज हुई हैं. दिल्ली पुलिस ने CJP के प्रोटेस्ट के दौरान हिंसा और बैरिकेड तोड़ने के मामले में अब तक 10 FIR दर्ज की हैं. इसके अलावा सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप में आईपीसी की धारा 186, बैरिकेड्स तोड़ने, सरकारी संपत्ति को नुकसान और पहुँचाने और दंगा फैलाने के आरोप में आईपीसी 147, 149 के तहत मुकदमे दर्ज हुए हैं. पुलिस ने CCTV और वीडियो फुटेज के आधार पर पहचान करके केस दर्ज किए हैं. सैकड़ों छात्रों को हिरासत में लेकर पहले छत्रसाल स्टेडियम फिर अलग-अलग थानों में भेजा गया.
2023 में महिला पहलवानों का प्रोटेस्ट हुआ. दिल्ली पुलिस ने आयोजकों पर FIR दर्ज की. इस दौरान IPC 147, 149, 186, 188, 332, 353 और PDPP Act की धारा 3 के तहत मुकदमे दर्ज हुए थे.
अगर अपने अधिकारों के लिए जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट करने वाले लोगों पर संगीन आरोपों में मुकदमे दर्ज किये जा सकते हैं तो सड़कों पर हुड़दंग करने वाले कुछ कांवडियों पर यह मुकदमे क्यों नहीं हो सकते? क़ानून तो सब पर लागू होनी चाहिए. कार तोड़ने वाले और सरकारी प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाने वाले पर भी मुकदमे दर्ज होने चाहिए लेकिन यहां नियम कांवडियों के लिए अलग है.
सवाल यह है कि आम जनता के टैक्स का पैसा धर्म पर क्यों बर्बाद हो? हेलीकॉप्टर का डीजल, पुलिस की तैनाती, बैरिकेडिंग, पैलेट गन और आंसू गैस ये सब आम जनता के टैक्स से आता है. अस्पताल में बेड नहीं, स्कूल में टीचर नहीं लेकिन धार्मिक आयोजनों पर लुटाने में कोई कंजूसी नहीं. धर्म निजी मामला है लेकिन जब वही धर्म सड़क जाम करे, तोड़फोड़ करे और सत्ता उसे संरक्षण दे तो वो धर्म नहीं, राजनैतिक हथियार बन जाता है.
नये भारत की नई तस्वीर यही है. अगर कोई व्यक्ति भगवा भीड़ में है और हुड़दंग कर रहा है तो वह कानून से ऊपर है लेकिन अगर कोई स्टूडेंट आंदोलन की भीड़ में हो, सत्ता से सवाल पूछ रहा हो और संविधान की बात कर रहा हो तो वह कानून के दायरे में है. जब तक सत्ता धर्म के नाम पर गुंडागर्दी को सेवा और सवाल पूछने वालों को दुश्मन मानेगी तब तक न सड़कें सुरक्षित होंगी और न ही लोकतंत्र. आस्थाऐं सभी धर्मों की अलग अलग हैं लेकिन क़ानून सबके के लिए एक होना चाहिए. Kanwar Yatra Controversy





