Harappan Civilization: भारत का इतिहास बहुत पुराना है. सिंधु घाटी कि सभ्यता की बात करें तो यह 4,500 साल पुरानी सभ्यता है. इस सभ्यता में लोग शहर बसाते थे, नालियां बनाते थे और कलाकारी में भी माहिर थे. इसी सभ्यता की सब से मशहूर कलाकृति है मोहनजोदड़ो की ‘डांसिंग गर्ल’. यह छोटी सी कांस्य मूर्ति लगभग 10.5 सैंटीमीटर की है. यह मूर्ति एक आत्मविश्वासी लड़की की है जो बिना कपड़े के सिर्फ गहने पहने हुए खड़ी है. यह मूर्ति असल में हड़प्पा की खुली सोच, कलात्मकता और उस काल की औरतों की आजादी का प्रतीक है.
दुनियाभर के स्कूलों में इतिहास की नग्न कलाकृतियां बिना छेड़छाड़ के पढ़ाई जाती हैं. प्राचीन ग्रीक, रोमन, इजिप्शियन और सीरियन कल्चर की मूर्तियां, जो उस दौर की औरतों की हैं, ज्यादातर बिना कपड़ों की हैं. ये मूर्तियां तमाम पश्चिमी स्कूलों की किताबों में वैसी की वैसी दर्शाई गई हैं ताकि बच्चों को इतिहास बिना किसी सैंसरशिप के पढ़ाया जा सके. वहीं भारत में जब से बीजेपी सरकार सत्ता में आई है, हर बात में ‘मर्यादा’ का ढोंग शुरू हो चुका है. किताबों से मुगल इतिहास हटा दिया गया, गांधीनेहरू को कम जगह दी गई और अब हड़प्पा काल की दुनियाभर में मशहूर मूर्ति को ढका जा रहा है.
एनसीईआरटी ने कक्षा 9 की नई आर्ट्स की किताब ‘मधुरिमा’ में डांसिंग गर्ल की खूबसूरत मूर्ति के ऊपरी हिस्से को शेडिंग कर के ढक दिया. ऐसा दर्शाया गया है जैसे वह कपड़े पहने हो. मर्यादा और संस्कार के नाम पर इतिहास की तसवीर को ही बदल दिया गया. यह इतिहास से छेड़छाड़ तो है ही, साथ ही, यह बेहद घटिया तरीके की सैंसरशिप भी है. इस में बीजेपी और एनसीईआरटी की कुंठित मानसिकता साफ दिखाई देती है. 4,500 साल पुरानी कलाकृति को भी अपने संकीर्ण नजरिए से देखना बेहद घटिया सोच है. सवाल है कि क्या प्राचीन काल की मूर्ति को आज की मर्यादा के चश्मे से देखना सही है?
डांसिंग गर्ल कोई साधारण प्रतिमा नहीं है. यह हड़प्पा की उन्नत धातुकला का नमूना है. यह मूर्ति साबित करती है कि उस समय के समाज में शरीर को कलात्मक रूप से स्वीकार किया जाता था. कोई शर्म वाली बात नहीं थी. औरतें आजादी से जीतीं थीं लेकिन बीजेपी सरकार ने एनसीईआरटी को इतिहास को संस्कारी बनाने का जिम्मा सौंप दिया है. 2023 में म्यूजियम एक्सपो के लिए डांसिंग गर्ल की बड़ी प्रतिमा को कपड़े पहना कर पेश किया गया था. अब किताबों में भी वही खेल शुरू हो गया. आखिर, इतिहास से इतनी कुंठा क्यों?
हड़प्पा सभ्यता वैदिक काल से पहले की है. इस में कोई मंदिर, कोई शिवलिंग या आज के हिंदुत्व के कोई निशान तक नहीं मिलते. यह खुली, समृद्ध और शहरी सभ्यता थी. बीजेपी इसे अपनी कथा में फिट नहीं कर पाती, इसलिए वह हड़प्पा के इतिहास को ही बदल देने की कोशिश करना चाहती है. 9वीं कक्षा के बच्चे इतिहास और कला सीख रहे हैं. उन्हें सही इतिहास दिखाने में कैसी शर्म? असली मर्यादा इतिहास का सम्मान करना है. डांसिंग गर्ल को कपड़े पहना कर सरकार हड़प्पा के इतिहास को मार रही है. डांसिंग गर्ल की मूर्ति आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और कलात्मकता की प्रतीक है. उसे ढकना महिलाओं की प्राचीन छवि पर हमला करने जैसा है. क्या बीजेपी और एनसीईआरटी को लगता है कि भारतीय बच्चे इतने कमजोर हैं कि एक प्राचीन मूर्ति देख कर बिगड़ जाएंगे?
मूर्ति को कपड़े पहना कर संस्कारी दिखाने के बाद एनसीईआरटी की घोर आलोचना हुई तब जा कर फिर से मूल तसवीर बहाल करने का फैसला हुआ लेकिन एनसीईआरटी सवालों के घेरे में आ गई. यह मानसिकता कहां से आ रही है? इतिहास को राजनीति का गुलाम बनाने की कोशिश असल में इतिहास को मिटाने की साजिश का हिस्सा ही है. हड़प्पा की डांसिंग गर्ल को कपड़ों की जरूरत नहीं थी. स्कूली बच्चों को सच्चा इतिहास बताने में कैसी शर्म? Harappan Civilization





