Indian Democracy: पिछले 12 सालों में बीजेपी लगातार तानाशाही की ओर बढ़ती हुई दिखाई दी. हर मंत्रालय अपनी जवाबदेही भूल कर मोदी के गुणगान करने लगा. विपक्षी पार्टियों के साथ हर तरह के विरोधी विचारों को कुचला गया. जहाँ भी और जब भी कोई सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे उन्हें देशद्रोही बता कर पीटा गया. 2026 में हालात बदल गये. नीट पेपर लीक के बाद जब बड़ी तादात में स्टूडेंट्स सड़कों पर उतरे तो वो तमाम जनता जिसकी आवाज नहीं सुनी गई थी या कुचल दी गई थी वे भी इस प्रोटेस्ट का हिस्सा बनकर सरकार के खिलाफ एकजुट हो गये और आखिरकार इस बार तानाशाही सरकार को झुकना पड़ा.

यह ऐतिहासिक आंदोलन लोकतंत्र का नया सवेरा ही माना जाएगा. बेशक इस आंदोलन के बाद सबकुछ बदल नहीं जाएगा लेकिन इस प्रोटेस्ट से तानाशाही की ओर तेजी से बढ़ती सरकार को बड़ा झटका जरुर लगा है. अब जवाबदेही शुरू होगी और सत्ता में बैठे लोकतंत्र के दुश्मनों के अंदर डर जरूर पैदा होगा. इसी डर की जरूरत थी. जनता ने यह कर दिखाया. सारे नेरेटिव धरे के धरे रह गये. धर्म की राजनीती की हांडी फूट गई. इस प्रोटेस्ट ने यह भी साबित किया है की जेन जी को बरगलाना आसान नहीं है. यह वो पीढ़ी है जो टीआरपी के खेल से ही बाहर है इसलिए इस पर मेनस्ट्रीम मीडिया का प्रोपगेंडा असर ही नहीं करता.

पिछले कुछ हफ्तों में दिल्ली की सड़कों से लेकर देश के कई शहरों तक जो दृश्य देखने को मिले उससे यह साबित जरूर हुआ कि लोकतंत्र में अंतिम ताकत जनता के पास ही रहती है. लोकतंत्र में विरोध का अधिकार मौलिक है. सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सुनें, जांच करें और सुधार करें. हर असहमति को देशद्रोह बताने या हर प्रदर्शन को कुचलने वाली सरकार कभी लोकतान्त्रिक नहीं हो सकती. बीजेपी सरकार की विचारधारा उसकी नीतियों और व्यवहार में साफ दिखाई देती है. यह आरएसएस माइंडसेट है जिसमें डेमोक्रेसी के लिए कोई जगह ही नहीं है.

एक नेता, एक चुनाव, एक शिक्षा, एक भाषा, एक धर्म, एक रंग का इतिहास और एक ही विचारधारा, यह मानसिकता सिर्फ लोकतंत्र के लिए ही खतरनाक नहीं है बल्कि यह इंसानियत और डाइवर्सिटी के विरुद्ध गहरी साजिश भी है. लोकतंत्र को हाईजैक कर एकतंत्र लाने की कोशिश ही बीजेपी की असली राजनीती है लेकिन इस आंदोलन ने यह साफ कर दिया कि जेन-जेड को ऐसा एकतंत्र पसंद नहीं. एकतंत्र का सूरज डूबा या नहीं यह तो समय तय करेगा लेकिन एक बात तय है की बीजेपी के एकतंत्र की सत्ता हिल जरूर गई है. इस दिशा में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो बस एक शुरुआत है.

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