Dance Bar Culture: और्केस्ट्रा अब कला का नहीं बल्कि उत्पीड़न की वजह बनता जा रहा है. और्केस्ट्रा के कार्यक्रम में कलाकारों द्वारा गीत गाए या नृत्य पेश किए जाते थे लेकिन आज उस स्टेज पर अश्लीलता का खूब प्रदर्शन किया जाता है. जब यह काम अच्छा नहीं तो लड़कियां इन में खुशीखुशी नाचने जाती ही क्यों हैं?

एक समय में और्केस्ट्रा में काम करने की बात कला और प्रतिभा से जुड़ी होती थी. लोग कलाकारों को सम्मान देते थे, उन के लिए तालियां बजाते थे. खैर, तालियां तो अभी भी बजती हैं लेकिन किसी सम्मान या सराहना में नहीं बल्कि एक ओछेपने में. आज कलाकार देह प्रदर्शन की वस्तु सा बन गया है और दर्शक एक रोगीबुद्धि का जीव जिसे एक लड़की को गंदे गानों पर थिरकते देखना और फिर उसे अभद्र भाषा में पुकारना और छेड़ना पसंद आता है.

वैडिंग फंक्शन आदि के नाम पर किया जाने वाला और्केस्ट्रा प्रोग्राम कुछ और नहीं बल्कि वह नग्नता है जिसे समाज सीना चौड़ा कर अपनी शान बढ़ाने के लिए पेश करता है. और्केस्ट्रा प्रोग्राम में नाचती अर्धनग्न लड़कियां कोई कलाकार नहीं बल्कि इसी समाज की काली सच्चाई हैं जिन्हें देखते हुए भी कोई उन की वेशभूषा या हावभाव में बदलाव नहीं चाहता.

ये नाचती लड़कियां कोई कलाकार नहीं बल्कि किसी परिवार की मजबूर बेटी होती है, किसी की बेसहारा बीवी, तो किसी भाई की बहन. वे किसी न किसी संकट में आ, और्केस्ट्रा के नाम पर फैली इस गंदगी से जुड़ती हैं. जिस और्केस्ट्रा ग्रुप की लड़कियां जितने छोटे कपड़े पहन नाचेंगी, वह और्केस्ट्रा उतना ही ज्यादा पैसे और नाम कमाता है. भले उस ग्रुप में डांस केवल नाममात्र का हो.

बहुत लड़कियों, जिन्हें नाचना तक नहीं आता, को ग्रुप का हिस्सा सिर्फ अंग प्रदर्शन करने के लिए बनाया जाता है. वे अपनी विवशता के चलते इस काम को करने से इनकार नहीं कर पातीं. आमजन पहले अच्छा डांस देखने के लिए जाते थे, अब छोटे कपड़े पहने लड़कियों को देखने जाते हैं. जिस ग्रुप में लड़कियां छोटे कपड़े पहन जितना ज्यादा लड़कों को इशारा करेंगी, उस ग्रुप के दर्शक दूसरे ग्रुप के दर्शकों से कहीं अधिक होंगे.

बहुत से लोग यह प्रश्न भी करते हैं कि जब यह काम अच्छा नहीं तो लड़कियां इन में खुशीखुशी नाचने जाती ही क्यों हैं? हमें और आप को ये लड़कियां भले मुसकराते और इशारे करती नजर आएं लेकिन सच यही है कि वह सब एक छलावा होता है, छलावा केवल दर्शकों की भीड़ बढ़ाने का. जितनी ज्यादा भीड़ उतनी ज्यादा कमाई और उतनी ज्यादा बख्शीश. आखिर, इन लड़कियों की कमाई का असली जरिया तो मिलने वाली बख्शीश ही होती है. कोई भी लड़की इस पेशे को खुशी से गले नहीं लगाती, बल्कि किसी संकट या परेशानी के चलते नाचने को तैयार होती है. उन की परेशानियों की वजह कुछ ये हैं :

निरक्षरता:निरक्षरता एक अभिशाप है. गांवदेहात के जो लोग इस अभिशाप का शिकार बन जाते हैं उन के पास रोजगार के अवसर अपनेआप ही बहुत न्यून होते हैं. उन का एकमात्र रोजगार केवल मजदूरी करना रह जाता है. वहीं, मजदूरी आप को जीवन जीने के लिए पर्याप्त धन नहीं दे सकती. निरक्षरता के कारण आप के पास इतनी बुद्धि और विवेक नहीं होता कि आप सहीगलत का फर्क कर पाओ. यह अभिशाप आप को कई ऐसे रास्तों पर चलने के लिए विवश कर देता है जो सही नहीं होते. आज का दूषित और्केस्ट्रा भी उन्हीं रास्तों में से एक है. भारत में और्केस्ट्रा में नाचने वाली अधिकांश महिलाएं अशिक्षित ही हैं. वे शिक्षा के अभाव में रोजगार न मिलने पर ऐसे डांस गु्रप का हिस्सा बनती हैं.

खराब आर्थिक स्थिति:इस पेशे में बहुत सी लड़कियां अपनी टूटी आर्थिक स्थिति के कारण आती हैं. बहुतों के घर में कमाने वाले नहीं होते या जो कमाई होती है, वह जीवन जीने के लिए पर्याप्त नहीं होती. ये लोग आर्थिक रूप से पिछड़े और कमजोर होते हैं. इन के यहां कोई बीमार हो जाए या कोई आर्थिक मार पड़ जाए तो उस का सामना ये कोई मेहनतमजदूरी वाला काम कर के नहीं कर सकते.

कमाई ज्यादा है:और्केस्ट्रा में डांस कर लड़कियां दूसरे कामों के मुकाबले ज्यादा कमा लेती हैं. कुछ तो इतना केवल एक प्रोग्राम या एक रात के डांस से कमा लेती हैं जो किसी दूसरे काम की महीनेभर की तनखाह से ज्यादा होता है. इसलिए कई लड़कियां सिर्फ इसी वजह से इन डांस ग्रुप का हिस्सा होती हैं.

एक पारंपरिक बो?ा:यकीन करना मुश्किल है लेकिन यह पेशा खानदानी पेशा भी है. बहुत सी लड़कियां इस पेशे में अपने परिवार द्वारा ही लाई गई होती हैं. इन में अविवाहित लड़कियों को मांबाप लाते और विवाहित लड़कियों को उन के पति. इन के समाज में हमेशा से लड़कियां इसी रूप से कमाई करती हैं.

असहाय:जिन लड़कियों के सिर से पिता का साया उठ गया हो, जिन महिलाओं को उन के पतियों ने छोड़ दिया हो या वे जीवित न हों उन असहायों को पैसे कमाने के लिए इस पेशे में मजबूर हो आना पड़ता है. उन का जीवनयापन, उन के परिवार और बच्चों का जीवन इसी पर निर्भर रहता है.

आंखों पर पड़ी चमक का चश्मा:जहां बहुत सी लड़कियां मजबूरियों के चलते इस दलदल में पैर रखती हैं वहीं कुछ केवल एक मूर्खता या कहें और्केस्ट्रा की चकाचौंध से भ्रमित हो कर प्रवेश करती हैं. गांवखेरा की लड़कियां जिन की उम्र केवल 14-16 साल की होती है उन्हें इन रंगीन प्रोग्राम, इन की चकाचौंध इस कदर प्रभावित करती है मानो स्टेज पर यों नाचना उन का अपना सपना या कहें मंजिल बन जाता है. उन्हें लगता है कि यों नाच कर वे कोई सितारा या मशहूर कलाकार बन जाएंगी जैसे फिल्म की हीरोइन होती है लेकिन वास्तविकता इस भ्रम से कोसों दूर है. जहां आइटम नंबरों पर नाचने वाली फिल्म कलाकार को दुनियाभर की प्रशंसा मिलती है वहीं इन और्केस्ट्रा की लड़कियों को गंदी नजर व अश्लील टिप्पणियों को बटोरना पड़ता है.

तस्करी का शिकार:और्केस्ट्रा में कई लड़कियां ऐसी भी होती हैं जो ह्यूमन ट्रैफिकिंग अर्थात मानव तस्करी का शिकार होती हैं. इन लड़कियों को काम के बहाने या किसी और बात का बहाना या लालच दे, अपने मूल निवास से दूर ले जा बेच दिया जाता है. भारत में यह अमानवीय अपराध सरकार की नाक के नीचे किया जाता है. आप को ऐसे बहुत से केस देखनेसुनने को मिल जाएंगे जहां देश के कोनेकोने, जैसे बंगाल, झारखंड, ओडिशा से लड़कियों को बहलाफुसला कर बिहार में कई ऐसे गिरोह को बेच दिया जाता है जो उन से जबरन और्केस्ट्रा में डांस तो कराते ही हैं, साथ ही, कुछ गिरोह और्केस्ट्रा के नाम पर इन से जिस्मफरोशी का धंधा भी कराते हैं.

इन लड़कियों का जीवन कोई आम जीवन नहीं होता. आम जीवन में आप के पास जो भी नौकरी होती है उस में रोज इज्जत जाने का खतरा नहीं उठाना पड़ता. न ही मन मार मजबूरी में किसी के इशारे पर अंग प्रदर्शन करते नाचना पड़ता है और न ही उस काम को करते वक्त लोगों के अमर्यादित व्यवहार का शिकार बनना पड़ता है.

आम जिंदगी में तो एक आम नौकरी से आप घर की छांव में लौटते हो तो परिवार और समाज आप की मेहनत को सलाम करता है लेकिन यहां तो इन लड़कियों को न घर की छांव मिलती है, न कोई सम्मान. इन्हें तो अपने घर से कोसों दूर रहना पड़ता है. कुछ तो 3-4 महीने बाद अपने घर जाती हैं और कुछ तो इस कदर घर वालों से दूर होती हैं कि वापस लौटना कभी हो ही नहीं पाता. इन का जीवन किसी भी रूप में एक आम जीवन नहीं होता. इसी जीवन की जटिलता पर यहां एक नजर डालते हैं-

समाज में उपेक्षा:ये लड़कियां समाज में एक समानता के स्तर पर न तो देखी जाती हैं और न ही सम?ा जाती हैं. आप खुद ही बताएं कि आप की अपनी गली या महल्ले में क्या कोई ऐसी लड़की रहती है जो और्केस्ट्रा डांसर हो. नहीं न. यह सोचने की बात है कि जब घर में शादीब्याह होता तो इन्हीं लड़कियों का प्रोग्राम रखा जाता है. इन के साथ थिरका जाता है लेकिन अगर इन्हीं में से कोई लड़की आप की गली या महल्ले में रहने आ जाए तो आप के समाज की मर्यादा खराब होने लगती है या आप की घर की महिलाओं पर गलत प्रभाव पड़ने लगता है और इसी वजह से इन लड़कियों को इन के और्केस्ट्रा ग्रुप का हिस्सा बने रहना पड़ता है या अपना काम छिपा कर लोगों के बीच रहना पड़ता है.

लांछन:और्केस्ट्रा में नाचने वाली लड़कियां भले सिर्फ नाच पेश करती हों लेकिन समाज उन्हें कोई नाच दिखाने वाला कलाकार नहीं बल्कि नाचने वाली ही सम?ाता है और उसी मापदंड पर उन के चरित्र को लांछित किया जाता है. इस से इन का आम जीवन बहुत मुश्किल बन जाता है. आगे जा कर ये लड़कियां किसी सभ्य परिवार में न शादी कर पाती हैं न कोई को अच्छा लड़का इन का हाथ थामता है. बहुत सी लड़कियां अपना पेशा छिपा और छोड़ विवाह करती हैं और बहुत सी दूसरे राज्य जा कर ताकि उन के पिछले जीवन की परछाईं उन के भविष्य पर न पड़े.

जोखिम:और्केस्ट्रा में नाचना किसी जोखिम से कम नहीं. हम ने ऐसी बहुत सी वारदातें देखी हैं जिन में डांसर लड़कियों पर कोई दर्शक पुरुष ?ापट पड़ता है. उसे आपतिजनक छूता है, उन के कपड़ों को भी खींचा जाता है. भला ऐसी नौकरी कोई भी आम लड़की या महिला क्यों करना चाहेगी.

यहां देखने और सम?ाने वाली बात यह है कि और्केस्ट्रा के नाम पर हो रहे ओछेपने के सब से बड़े जिम्मेदार समाज के वही लोग हैं जो मान और मर्यादा की बात करते हैं. आखिर ये प्रोग्राम और कहीं नहीं बल्कि हमारे गलीमहल्ले व गांव में, हमारे ही बीच रहते सभ्य समाज के लोगों के कहने पर ही बनाए और दिखाए जाते हैं.

शादी, सगाई और मेलों में नाचगाना अपनी शान ऊंची करने के लिए आयोजित किया जाता है. जिन के प्रोग्राम में जितनी ज्यादा डांसर नाचेगी, उन की शान उतनी ही ऊंची होगी. गौर करने की बात यह है कि डांसरों के साथ आप के ही परिवार के बच्चे से ले कर जवान, बुजुर्ग और आजकल तो महिलाएं भी जोरशोर से नाचती हैं.

शान की बात

इन डांसरों का नाचना आप की शान इतनी बढ़ा देता है कि आप अगले दिन सिर ऊंचा कर गांवदेहात में यों घूमते हैं जैसे कोई बड़ा तीर मार कर आए या परिवार का कोई लड़का देश का नाम रोशन कर आया हो लेकिन इन्हीं डांसरों में अगर कोई परिवार से जुड़ना चाहे तो आप की इज्जत मैली हो जाएगी. जैसे, मान लीजिए आप के परिवार का लड़का किसी और्केस्ट्रा डांसर से शादी करना चाहे तो? तो आप की सांस रुक जाएगी. समाज में आप कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे लेकिन जब आप और आप का लड़का इन्हीं डांसर के साथ ताल से ताल मिला कर नाच रहे थे तो आप की इज्जत में चारचांद लग रहे थे. तब आप पूरे समाज में अपना मुंह दिखाते फिर रहे थे कि आप ने क्या बहादुरी वाला काम किया है.

यह कड़वी सच्चाई है कि समाज के सभी लोगों, जात, वर्ग, धर्म के छोटे से छोटे हिस्से और इंसान को पता है कि ये लड़कियां किसी खुशी से नहीं बल्कि अपनी किसी न किसी मजबूरी के चलते यों नाचने को मजबूर हैं लेकिन फिर भी समाज न तो इस तरह के नाच का विरोध कर, उन के लिए दूसरे व्यवसाय के रास्ते तलाशता है और न ही उन्हें केवल एक कलाकार या डांसर की नजर से देखता है. इन की मजबूरी को तो एक मौके के रूप से देखा जाता है. मौका अपनी गंदी नजर और इरादों से उन का मानसिक और शारीरिक शोषण करने का.

इंसान नहीं जानवर

इस बात का बहुत बड़ा उदाहरण आप को बिहार के गांवशहर में लगने वाले मेले में मिल जाएगा जहां कई मेलों में स्टेज को पिंजरे में रूप बनाया जाता है ताकि नाचते वक्त किसी डांसर पर कोई दर्शक अपनी गंदी सोच और इरादे से हमला न कर दे.

अब आप खुद सोचिए कि हमारा समाज और समाज के लोग कितनी मात्रा में दूषित हो चुके हैं कि किसी लड़की का एक डांस पेश करना इतना खतरे से घिरा है कि उसे अपनी इज्जत की सुरक्षा के लिए एक पिंजरे में नाचना पड़े. यहां तो स्थिति पूरी तरह से विपरीत है. यह तो ऐसी है कि पिंजरे में रहने वाला एक इंसान और उस के बाहर से उसे ताकने वाला एक जानवर जो कभी भी मौका मिलते आप पर ?ापट सकता है और वह भी पूरे भरे बाजार, पूरी दुनिया के सामने.

ऐसा भी नहीं कि हर और्केस्ट्रा में लड़कियों को जबरन अश्लील नाच नचाया जाता है. कुछ ऐसे भी हैं जो नाच को केवल नाच तक ही सीमित रखते अपने कलाकारों के मानसम्मान का भी ध्यान रखते हैं. मगर फिर भी क्या यह सामाजिक और मानवीय स्तर पर गलत नहीं कि आप के समाज की लड़कियां अपनी मजबूरी में यों नाचने को मजबूर हों? क्या मानव समाज इतना कमजोर हो गया है कि वह उन के लिए कुछ कर नहीं सकता? या इसी और्केस्ट्रा को केवल डांस कला प्रस्तुति का साफ सहीरूप नहीं दे सकता ताकि इन में काम करने वाली लड़कियों को वही इज्जत मिल सके जो किसी और आम परिवार और समाज की लड़कियों को मिलती है.

सम्मान क्यों नहीं

आज समाज में जब अपने परिवार की लड़की मेहतनमजदूरी कर पैसे कमाती है तो उसे आदर और उदार भाव से देखा जाता है. वहीं उसी समाज में जब कोई दूसरी लड़की बेबस हो नाच कर परिवार का पालनपोषण करती है तो उसे एक नचनिया कह कर तिरस्कृत किया जाता है, उस का शोषण किया जाता है.

हैरानी की बात तो यह है कि यहां उन्हें नचाने वाले, उन के साथ नाचने वाले और फिर उन का तिरस्कार करने वाले कोई अगलअलग लोग नहीं बल्कि एक ही समाज के लोग हैं.  Dance Bar Culture

लेखिका – रजनी प्रसाद 

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