Dharmendra Pradhan Resignation: बात पेपर लीक से शुरू होकर भले ही धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे तक आ गई लेकिन बात खत्म नहीं हुई है क्योंकि इस्तीफे के बाद से तेजी दलित सवर्ण होने लगा जो हर लिहाज से  चिंताजनक है. क्या यह लड़ाई महज एक मंत्री के इस्तीफे को लेकर थी या इसकी जड में धार्मिक जकडन और घुटन से मुक्ति की छटपटाहट भी है यह सवाल अब सुरसा के मुंह जैसा बढ़ता जा रहा है जो कहाँ जाकर खत्म होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है.   

द्वापर युग के कुरुक्षेत्र का हिंसक धर्म युद्ध 18 दिन चला था. जंतर मंतर का अहिंसक पर वैचारिक धर्म युद्ध 36 दिन चला जिसमें फौरी तौर पर काकरोच जीत गए हैं. शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर मंतर का माहौल एकदम बदला हुआ था. युवाओं ने अपने सुर और अंदाज दोनों बदल डाले. उन्होंने अपने वीडियोज के जरिए साफतौर पर कहा कि उनकी लड़ाई सिर्फ धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित नहीं है बल्कि असल लड़ाई संविधान बनाम मनुवाद है.

साफतौर पर ही यह उद्घोष भी किया गया कि काकरोच जनता पार्टी के मुखिया अभिजीत दीपके भीमराव आम्बेडकर के नए संस्करण हैं जो सदियों से धार्मिक उत्पीडन, प्रताड़ना और भेदभाव के शिकार दलितों को न्याय दिलाने के लिए अमेरिका से भारत आए हैं. वे चाहते तो अमेरिका में रहते शानदार लक्झरी लाइफ जी सकते थे. लेकिन जैसे ही जस्टिस सूर्यकांत ने युवाओं को काकरोच कहा तो वे भीतर तक तिलमिला उठे. नतीजतन देखते ही देखते अनायास ही काकरोच जनता पार्टी बन गई और फिर जो हुआ वो सबके सामने है.

सामने जो है जिसे सामने होते हुए भी कल तक देखना लोग गवारा नहीं करते थे, वह सदियों पुराने ब्राह्मणवाद का सत्ता और समाज खासतौर पर शैक्षणिक संस्थाओ पर कसता आरएसएस का शाश्वत शिकंजा है. जिसे काफी हद तक जंतर मंतर के आंदोलन ने ढीला करने में कामयाबी हासिल कर ली है. लेकिन यह शिकंजा खत्म हो गया है ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. बिलाशक मुद्दा शिक्षा था, उसमें सुधार का था, नीट पेपर लीक का था, जिसे पैसे बाले सवर्ण ही खरीद सकते थे. जैसे तैसे डाक्टर बनने का सपना लिए कलयुगी एकलव्यों के लिए तो कोचिंग भी बहुत दूर का सपना है जिनके पेरेंट्स हाडतोड़ मेहनत के बाद भी फीस तक नहीं भर पाते.

यह सड़ांध के प्रति भड़ास भी थी

जंतर मंतर पर मौजूद लाखों और देश दुनिया से उनका समर्थन कर रहे करोड़ों युवाओं के दिलोदिमाग में आखिर चल क्या रहा था, यह अब सामने आने लगा है कि वह क्या है और क्यों है. इसे समझने लगभग 50 साल पीछे चलना होगा जब राम मंदिर आंदोलन के चिराग को मठ मंदिरों से निकालकर गाँव गाँव तक फ़ैलाने की साजिश भगवा गैंग रच रहा था. मकसद एक नहीं अनेक थे मसलन धर्म की राजनीति के जरिये सत्ता हथियाना, मन्दिरों के जरिए पैसा कमाना और उससे भी अहम वर्ण व्यवस्था को और पुख्ता करना था. यह सब तभी मुमकिन था जब सामाजिक तौर पर बैचेनी और जूनून की हद तक उथल पुथल मचाई जा सके.

भगवा गैंग ने पहले गाँव गाँव और घर घर जाकर मंदिर की अलख जगाई. मुगल शासकों की लूट और मुसलमानों का डर दिखाया. दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को लुभाने समरसता और समानता का राग अलापा. इससे भी बात उम्मीद के मुताबिक बनती नहीं दिखी तो देश के इस्लामिक राष्ट्र बन जाने का होव्वा फैलाया. इससे बचने और बचाने के नाम पर लोगों के सामने मंदिर निर्माण के लिए झोली फैलाई जाकर मंदिर आंदोलन की मुहिम की शक्ल दी.

जब धार्मिक उन्माद प्लान के मुताबिक फैलने लगा तो विश्व हिन्दू परिषद ने साधु संतों का साथ लेकर 1984 में बिहार के सीतामढ़ी से लेकर अयोध्या तक यात्रा निकाली जिसका मुखिया प्रमुख कट्टर हिन्दूवादी भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बनाया गया.  1986 में अयोध्या के राम मंदिर का ताला जब खुला तो हिंदूवादियों ने नया शिगूफा यह छेड़ा कि हमारे राम लला खुले में पड़े हैं हम उनका भव्य मंदिर बनाएंगे.फिर सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीँ बनायेंगे और बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का और एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो सरीखे दर्जनों उन्मादी नारे रोजमर्राई  जिंदगी का हिस्सा मन गए.

इस दौरान मंदिर का मुकदमा चलता रहा लेकिन भगवा गैंग की कुत्सित मंशा तब उजागर हुई जब सितम्बर 1990 की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा के दौरान देश भर में सांप्रदायिक दंगे भडक उठे. यह यात्रा जहाँ से भी निकली थी वहा दहशत ने पाँव पसारे थे .फिर आया 6 दिसम्बर 1992 का दिन जब हिंदूवादियों ने जय जय श्रीराम का नारा लगाते हुए बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. इसके बाद भाजपा को कुछ खास नहीं करना पड़ा सिवाय हिंदुत्व की लगी आग को सुलगाए रखने के जिसके चलते साल 2014 में वह पूरे बहुमत से केन्द्रीय सत्ता में आई. और गोधरा दंगों के हीरो नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री बनाए गए जो रथ यात्रा के दौरान आडवाणी के पीछे बैठे धार्मिक हिंसा का तमाशा देखते रहे थे .

यह पीढ़ी जो जंतर मंतर पर आम्बेडकर की दुहाई दे रही थी तब पैदा भी नहीं हुई थी. लेकिन उसने अपनी टीन एज और युवावस्था में बहुत गौर से यह देख और महसूस लिया था कि कैसे विकास के दावों की आड़ में हिन्दू मुस्लिम और दलित सवर्ण किया जा रहा है. जिससे ब्राह्मणों और पंडे पुजारियों के सिवाय किसी को कोई फायदा नहीं हो रहा. उलटे नुकसान ढेरों हो रहे हैं .

इस पर भोपाल के एक युवा व्यवसायी निरंजन सूर्यवंशी कहते हैं कि मोदी राज में बाबाओं और धर्म का कारोबार बहुत ज्यादा फला फूला है, जिसका दलितों और हम पिछड़ों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है. लोगों का धार्मिक खर्च बढ़ता जा रहा है और वे हर लिहाज से  पिछड़ रहे हैं. दलितों के गली मोहल्लों में छोटे मोटे देवी देवताओं के मंदिर खुल गए हैं जिनमे जमकर पूजा पाठ हो रहा है वहां ओझा तांत्रिक और गुनिया टाइप के लोग धूनी रमाकर लोगों को बरगला रहे हैं . हर कहीं हर किसी महिला के सर कोई न कोई देवी आ रही है. इन तबकों की औरतें इफरात से कलश यात्राओं में कलश ढो रही हैं

बकौल निरजन जंतर मंतर में जो हुआ वह दलितों की शिक्षित और जागरूक होती युवा पीढ़ी का इसी सड़ांध के प्रति  प्रतिकार और प्रतिक्रिया थे.  अगर आंदोलन करती कोई लडकी वीडियो में मनु स्मृति और रामचरित मानस के हवाले से महिलाओं की दयनीय दशा बता रही है. ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ये सब ताडन के अधिकारी… जैसे दोहों की हकीकत बताती मनु स्मृति के उस श्लोक को भी अंडरलाइन कर रही है जिसमे यह नसीहत दी गई है कि स्त्री को बचपन में पिता के, जवानी में पति के और बुढ़ापे में पुत्र की गार्जियनशिप में रहना चाहिए तो कौन सा गुनाह कर रही है.

वह यही तो बता रही है कि धर्म ने कैसे कैसे औरतों को गुलाम बनाए रखने के प्रपंच रच रखे हैं. लेकिन वह बराबरी से काउन्टर करते पूरे कान्फिडेंस से यह भी बता रही है कि बाबा साहब के बनाए संविधान और कानूनों से औरतें शिक्षित और जागरूक हुईं कि आज यहाँ जंतर मंतर पर अपनी बात कह पा रही हैं तो बताइए वे क्या गलत कर रही हैं.

इस जनरेशन ने धर्म बहुत बारीकी से पढ़ा होगा ऐसा लगता नहीं. लेकिन धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जो उसने संविधान और आम्बेडकर की दुहाई देना शुरू किया और रामचरित मानस और मनु स्मृति की छीछलेदार शुरू की तो न केवल समझ आया बल्कि यह साबित भी हो गया कि असल लड़ाई और भड़ास वही है जो पैरियार और फुले से शुरू होते आम्बेडकर से होते अभिजीत तक ज्यों की त्यों चल रही है.सवर्ण दलित का जो सिलसिला हिन्दू मुस्लिम की जगह रीप्लेस हुआ वह बहुत ही घातक औरखतरनाक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है.

अष्टावक्र से लोकतांत्रिक काकरोच

काकरोचों ने बेहद एहतियात वरतते अपनी मुहिम को अंजाम दिया. आंदोलन के शुरू में बात और मांग धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा था लेकिन 25 जुलाई की शाम से काकरोच अपने असली रंग में आ गए कि 40 साल की सड़ांध से निजात पाने उन्होंने नीट पेपर लीक की आड़ में धार्मिक सरकार का सर वैसे ही झुका दिया जैसे कभी अष्टावक्र ने जनक की सभा में ब्राह्मण समुदाय का झुकाया था.

दिलचस्प बात यह है कि अष्टावक्र खुद ब्राह्मण थे जिनके पिता ऋषि कहोड़ के वेद पाठ की गलतियों को उन्होंने गर्भ में रहते ही सुधार दिया था. इससे गुस्सा होकर कहोड़ ने उन्हें टेढ़े मेढ़े पैदा होने का श्राप दे दिया था. इस कहानी का मकसद यह बताना भी था कि जो भी वेद, पुराणों, स्मृतियों और संहिताओं का मजाक उडाएगा उनमें त्रुटियाँ निकालेगा उन्हें गलत साबित करने की कोशिश करेगा फिर भले ही वह ब्राह्मण ही क्यों न हो उसे श्राप देकर दलितों की जमात में खड़ा कर दिया जाएगा. अष्टावक्र की शारीरिक बनाबट के चलते हमेशा ही दलितों की तरह उनका मजाक बनाया गया और उन्हें मुख्यधारा से दूर रखा गया.

अष्टावक्र जब बड़े हुए तो उन्हें इस सोशल स्ट्रक्चरसे चिढ़ और कोफ़्त दोनों होने लगे कि विद्वान होने का हक वर्ण और जाति की बिना पर सर्फ ब्राह्मणों को ही क्यों. दूसरों यानी शूद्रों यानी आज के दलित, पिछड़ों और आदिवासियों सहित औरतों को क्यों नहीं. अष्टावक्र की कहानी के मुताबिक उन्होंने राजा जनक की सभा में ब्राह्मणवाद की बखिया मय तर्कों और उद्धरणों के उधेड़ कर रख दी थी

अष्टावक्र ने जात पात से मुक्ति की बात करते हुए कहा था कि मनुष्य को जन्म या जाति की बिना पर खांचो में बांटने के बजाय उसे एक शुद्ध चेतना के रूप में देखा और आँका जाना चाहिए यानी आदमी की शिक्षा, विचार और ज्ञान बगैरह देखकर बर्ताब और मूल्याकन किया जाना चाहिए. जन्मना जाति देखकर नहीं करना चाहिए. आत्मा का कोई वर्ण नहीं होता. अष्टावक्र मानसिक अहंकार और पाखंडों के भी विरोधी थे. वे पूजा पाठ, यज्ञ हवन बगैरह में भरोसा नहीं करते थे .यानी ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणवाद के विरोधी थे.

यही और ऐसे ही बातें काकरोचों ने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद 25 जुलाई की शाम से कहना शुरू की तो बात या मुद्दे को खत्म मानने की खुशफहमी में बेफिक्र हो गई भगवागैंग का माथा ठनका कि चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास या सर मुंडाते ही ओले पड़े या कि आए थे नमाज माफ़ कराने  रोजे गले पड़ गए…. जैसी सिचुएशन बन गई अब क्या करें

अब इस नई सिचुएशन जिसे अष्टावक्र ने शुद्ध चेतना कहा था से मनुवादी कैसे निबटेंगे यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा कि क्या वे बुद्ध की तर्ज पर कल के लड़के अभिजीत दीपके को भी अवतार घोषित कर देंगे. आम्बेडकर सरीखा भगवान बना देंगे या फिर रामदास अठावले, चिराग पासवान और अनुप्रिया पटेल सहित नीतिश कुमार जैसे अपने पाले और खेमे में लेने के लिए कोई और नया टोटका ईजाद करेंगे. इस पर भगवा गैंग के अंदर गंभीरता से मंथन चल रहा है

लेकिन चेलेंज इस बार बहुत बड़ा है शिक्षित और जागरूक युवाओं की तरफ से है जिनके नेता अभिजीत दीपके ने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आम्बेडकर की तस्वीर के सामने सर झुकाते कोई आभार मोदी का व्यक्त नहीं किया. कोई चापलूसी या खुशामदी लहजा नहीं दिखाया   बल्कि उनकी मज़बूरी और बेबसी का फायदा उठाते खिल्ली सुबह हो गई मामू …कहते उड़ा डाली. यही अष्टावक्र ने जनक की सभा में किया था उन्होंने मौजूद ब्राह्मणों को तर्कों के साथ  चमार करार दिया था.

 पौराणिक व्यवस्था से जूझते काकरोच

मंथन तो काकरोच जनता पार्टी में भी चल रहा है कि पहली लड़ाई तो जीत ली अब क्या देश समाज, धर्म और राजनीति से जुड़े मुद्दे उठाए जाकर सनातनियों से लड़ाई जारी रखी जाए और लड़ी अगर जाए तो उसकी दिशा कैसी हो. हालफिलहल तो काकरोचों के तेवर धर्म और पाखंड विरोधी ज्यादा नजर आ रहे हैं. धर्मेब्द्र प्रधान के इस्तीफे के तुरंत बाद न केवल जंतर मंतर पर बल्कि देश भर में संविधान जिंदाबाद, मनु स्मृति मुर्दाबाद और बाबा साहब अमर रहें जैसे नारे लगाकर उन्होंने अपने इरादे और मंशा दोनों जाहिर कर दिए हैं.

पौराणिक व्यवस्था यानी ब्राह्मणवाद से काकरोच लड़ पाएंगे यह सवाल अब धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ज्यादा मौजू और अहम हो चला है. सोशल मीडिया पर युवा खुलकर अपनी बात अब कह पा रहे हैं तो जाहिर है आंदोलन की सफलता ने उन्हें आत्मविश्वास से लबरेज कर दिया है. जनहित 24 लाइव नाम के एक चेनल को इंटरव्यू देते एक खूबसूरत और अपनी बेबाकी से चर्चित हो गई दलित युवती नेहा भारती बेहिचक यह कहते दिखाई दी कि एक बात याद रखिए कि वे ( सनातनी ) मुझे गालियाँ दे रहे हैं क्योंकि मैंने माना कि मैं हिन्दू नहीं बल्कि दलित हूँ. .

ये लोग जितनी नफरत मुसलमानों से नहीं करते उससे ज्यादा दलितों से करते हैं. खासकर आंबेडकरवादियों से क्योंकि बाबा साहब ने उन्हें और हमे बराबर के अधिकार दे दिए. बकौल नेहा उन्हें भंगन , शूद्र, जाटव , दलित और नीच जात तक कहा गया और खुद कुछ दलित भी नेहा को इसी तरह ताने मारते नजर आए. उन्हें लताड़ते हुए नेहा कहती है कि क्यों वे मंदिरों में घुसते हैं. ये लोग बाबा साहब की वजह से जी पा रहे हैं वर्ना तो ये पीछे झाड़ू लगाकर चल रहे होते. नेहा के मुताबिक हिन्दू राष्ट्र की बात से दलितों को खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि हिन्दू राष्ट्र अगर बना तो भी वे दलित ही रहेंगे और पहले से ज्यादा प्रताड़ित किए जायेंगे.

एक और न्यूज़ चैनल टाइम्स वर्ल्ड पर एक और सुंदर लडकी खुद को गर्व से चमार स्वीकारते धार्मिक मानसिकता या मनु स्मृति कुछ भी कह लें की बखिया उधेड़ते सांस्कृतिक विविधता के माने समझाती नजर आई. ऐसे सैकड़ों इंटरव्यू और वीडियो वायरल हुए जिनमे युवा ब्राह्मणवाद पर आम्बेडकरवाद का हथोडा मारते नजर आए. लेकिन हैरत के साथ साथ स्वागत की बात यह है कि इस मुहिम में सवर्ण युवा भी शामिल हैं वे कितने हैं और कितने दिन तक इस मुहिम में टिकने दिए जाएंगे यह अभी कह पाना मुश्किल है.

ऐसा ही वायरल हुआ एक वीडियो एक ब्राह्मण युवती आयुषी पांडे का है जो कह रही है कि पहले तो जय भीम जय आम्बेडकर . मैं एक ब्राह्मण लड़की हूँ और बहुत तेजी से चल रहा है कि अब तो ब्राह्मण ही एज्यूकेशन मिनिस्टर बन गया है. तो दलितों ने कभी ब्राह्मण का विरोध किया है क्या. विरोध तो वर्षो और सदियों से दलितों का होते हुए आया है. दलित किस चीज का विरोध कर रहे हैं हरिजन भाई, जाटव भाई ब्राह्मणवाद का विरोध करते हैं. छुआ छूत उंच नीच जाति पाती का विरोध कर रहे हैं. वे समानता का अधिकार मांग कर रहे हैं. आयुषी ने भी एक के बाद एक कर कई वीडियो पोस्ट किए जिनमे उसने खुद को ब्राह्मण बताते हुए ब्राह्मणवाद पर कमेंट्स किए हैं.

यानी लड़ाई अब ब्राह्मणवाद से है जिसकी जड़ें पाताल से भी गहरी हैं. ये युवा जो दरअसल में आम्बेडकर को जातिगत दायरे से बाहर लाने की जिद पर अड़े हैं इन जड़ों को खोद पाएंगे इसमें शक है. क्योंकि इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई उनका साथ नहीं देने बाला खासतौर से राजनितिक पार्टियाँ जिनके पास मुद्दों का टोटा नहीं . कांग्रेस , सपा और आप जैसे दल संविधान की बात तो करते हैं, आम्बेडकर की भी दुहाई देते हैं लेकिन सिर्फ आम्बेडकरवाद पर टिके रहकर राजनीति करेंगे ऐसा कहने की कोई वजह नहीं.

यह ठीक है कि ये पार्टियाँ भाजपा की तरह संविधान विरोधी नहीं हैं जो संविधान को कुचल देना चाहती है. ये पार्टियाँ सिर्फ वोट झटकने ही संविधान की दुहाई देती हैं इसलिए उसे कुचलती नहीं. इन्हें इस बात का इल्म है कि सिर्फ आम्बेडकरवाद पर सियासत करना एक बड़ा जोखिम है क्योंकि इससे अधिकतर सवर्ण सहमत नहीं. दूसरे आम्बेडकरवाद में सीधे सीधे पोंगापंथ का, कर्मकांडों का , धर्म का और उसके सिद्धांतों का कड़ा और खुला विरोध करना पड़ता है जो इनके बूते की बात नहीं. क्योंकि मूलतय ये लोग भी पूजा पाठी ही हैं.

देश में दलित नेतृत्व का अभाव है. कांशीराम के बाद कोई सर्वमान्य दलित नेता पैदा नहीं हुआ या होने नहीं दिया एक ही बात है जिसकी मिसाल बसपा और उसकी मुखिया मायावती हैं.  सांसद चन्द्रशेखर रावण जरुर इस दिशा में काम कर रहे हैं और उन्होंने काकरोच आंदोलन को दूसरों के मुकाबले ज्यादा समर्थन दिया भी. लेकिन उनका घोषित मेलमिलाप अगर काकरोच जनता पार्टी से हुआ तो तय है कि सीजीपी का सवर्ण युवा जय राम जी की कर लेगा .

बात जहाँ तक सीजीपी की है तो वह ब्राह्मणवाद की तो विरोधी है लेकिन धर्म विरोधी है या नहीं यह कहना कठिन है क्योंकि अभिजीत दीपके दो टूक विरोध धर्म का करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. मुमकिन है ऐसा वे जानबूझकर किसी खास मकसद से भी कर रहे हों लेकिन जब तक उनकी मंशा और मकसद क्लियर नहीं हो जाते तब तक उन्हें लेकर संशय नाम की चीज तो बनी रहेगी. शक तो भगवा गैग को लेकर भी बना हुआ है कि उसका अगला कदम क्या होगा जिसकी पहली कोशिश यह है कि धर्मेन्द्र के साथ धर्म भी न चला जाए. Dharmendra Pradhan Resignation

 

 

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