दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के आसपास की झुग्गियां हटाई गईं. तीन प्रमुख झुग्गी बस्तियों – भाई राम कैंप, डीआईडी कैंप और मस्जिद कैंप को दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद 2026 में हटाया गया. सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जमीन चाहिए.
अदालत के आदेश के बाद बुलडोजर चले और देखते ही देखते सैकड़ों परिवारों की पूरी दुनिया मलबे में बदल गई. फिर उन्हें सावदा घेवरा में फ्लैट देकर कहा गया – लो, अब नई जिंदगी शुरू करो. सावदा घेवरा मूल स्थान से लगभग 45 किमी दूर है. वहां रोजगार, स्कूल, परिवहन और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मुश्किल है.
सरकार ने गरीबों को नई जिंदगी शुरू करने के लिए तो कह दिया मगर नई जिंदगी शुरू होने से साथ एक नया सवाल सामने खड़ा हो गया – अब वोट कहां डालें?
यानी पहले घर का पता बदला, अब लोकतंत्र का पता भी बदलना है. लेकिन कैसे? इसका जवाब किसी के पास नहीं है.
77 वर्षीय लल्लू जैक की परेशानी सुनिए. लोग उन्हें सलाह दे रहे हैं कि पुराने बीआर कैंप जाओ, वहीं से फॉर्म लो और वहीं जमा करो. लेकिन जिस जगह जाने के लिए कहा जा रहा है, वहां अब उनका घर ही नहीं बचा. वहां सिर्फ़ खाली मैदान और मलबा है. ऐसे में वे पूछते हैं – ‘जब घर ही नहीं रहा तो फॉर्म में पता क्या लिखें?’
उनकी परेशानी सिर्फ कागज़ की नहीं, जेब की भी है. सावदा घेवरा से पुराने इलाके तक आने-जाने में करीब एक हजार रुपये खर्च हो जाते हैं. एक फॉर्म लेने और जमा करने के लिए कोई गरीब इतना पैसा कहां से लाए?
उधर उनकी 73 वर्षीय पत्नी उमा देवी की कहानी और भी गजब है. जब पिछली बार वह वोट डालने पहुंचीं थीं तो पता चला कि उनका नाम पहले ही वोटर लिस्ट से गायब हो चुका है. किसी ने कभी बताया तक नहीं. लोकतंत्र में नागरिक को सबसे आखिर में पता चलता है कि उसका वोट चुपचाप गायब हो चुका है.
सावदा घेवरा में बसाए गए अधिकांश परिवार इसी उलझन में हैं. क्षेत्र का बीएलओ खुद कन्फ्यूज्ड है. कभी कह रहा है पुराने पते से प्रक्रिया पूरी करो, कभी कह रहा है नए पते से. सरकारी दफ्तरों से साफ़ जानकारी नहीं मिल रही है. नतीजा यह कि लोग पड़ोसियों, स्थानीय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछ-पूछकर अपना लोकतांत्रिक भविष्य तय कर रहे है.
दिल्ली में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन अभियान के तहत हजारों बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर फॉर्म भरवा रहे हैं. लेकिन जिन बस्तियों को बुलडोज़र ने मिटा दिया है, वहां जब अधिकारी पहुंचते हैं तो घर नहीं मिल रहे सिर्फ़ खाली जमीन मिल रही है.
चुनाव अधिकारियों ने इसे “विशेष मामला” माना है, लेकिन जिन लोगों की ज़िंदगी विशेष रूप से प्रभावित हुई, उन्हें अब तक कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं मिली है. दिल्ली में एसआईआर का काम अब समापन की ओर है. एक बीएलओ का कहना है कि जिन लोगों का पुनर्वास हो चुका है, वे पहले फॉर्म-8 भरकर पता बदलें, फिर सत्यापन होगा और बाद में उनका नाम नई वोटर लिस्ट में चला जाएगा. सुनने में प्रक्रिया आसान लगती है, लेकिन सवाल यह है कि अगर लोगों को जानकारी समय पर मिल ही नहीं रही है, तो वे यह सब करेंगे कैसे?
यानी सरकार की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि नियम मौजूद हैं, लेकिन जानकारी लोगों को नहीं है. प्रक्रिया है, लेकिन मार्गदर्शन नहीं है. अधिकार है, लेकिन उसे हासिल करने का रास्ता नजर नहीं आ रहा है. कुछ परिवारों का कहना है कि सावदा घेवरा में मोबाइल नेटवर्क तक ठीक से नहीं चलता है. अधिकारी से बात करनी हो, ऑनलाइन जानकारी लेनी हो या किसी हेल्पलाइन पर फोन करना हो, सब अपने आप में एक चुनौती है.
लोकतंत्र में वोट सिर्फ़ एक बटन दबाने का अधिकार नहीं होता है. यह नागरिक की पहचान भी है. अगर पहचान ही बार-बार कागज़ों में भटकती रहे, तो फिर लोकतंत्र की सबसे बड़ी कीमत वही लोग चुकाते हैं जिनकी आवाज़ पहले से ही सबसे कम सुनी जाती है.





