AI vs Social Media: एआई यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस अब सोशल मीडिया को किल करने को तैयार है. अब तक कंटैंट क्रिएटर अपनी क्रिएटिवटी, टैलेंट, लैंग्वेज, ऐक्शन, प्रौप्स, सिचुएशन का सिलैक्शन कर के कुछ नया कंटैंट भूखेफक्कड़ लोगों को लंगर में मुफ्त दे रहे थे कि एडवर्टाइजर भगवान कहीं से छप्पड़ फाड़ कर कुछ दे दे. अब एआई कहने लगा है कि आप जो कर रहे हैं, वह तो मैं मिनटों नहीं, सैकंडों में कर सकता हूं.

अब इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट् यूब भर गए हैं ऐसे कंटैंट से जिस से यह पता ही नहीं चलता कि क्या असली है क्या नकली. जैसे सिनेमा और स्टेज की ऐक्टिंग में हमेशा फर्क रहेगा, ऐसा अब एआई में भी होगा पर इतना बारीक कि कुछ ही पहचान पाएंगे. मुफ्तखोरों को उस से मतलब नहीं होता कि जो देख रहे हैं वह असली है या नकली, वह मजेदार हो, यही काफी है.

इसीलिए मुफ्तखोर सदियों से रिलीजन की झूठी, बिलकुल बनावटी बातें सुनते आ रहे थे और कुछ उन्हें मान कर अपना तनमनधन सब दे देते थे पर असली क्रिएटर जानते थे कि यह सब झूठ है और वे इसीलिए मिलने वाली मनी, लेबर या लाइफ को अपने लिए महल, मकान बनाने में लगाते थे. सैकड़ों सालों से झूठी कहानियों के सहारे चंदा जमा किया गया, लोगों को लूटा गया, घर जलाए गए, युद्ध हुए, नेशंस बने, पार्टीशन हुए.

एआई अब यही कर रहा है. शुरुआत पहले से हो चुकी थी. ग्राउंड तैयार था. इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप,
यूट् यूब जैसे प्लेटफौर्मों पर जम कर कंटैंट डाला जाता था. जब एआई नहीं था, तो फोटोशौप से ही काम चलाना पड़ता था जो साफ पता चल जाता था. उस की जांच भी हो सकती थी. अब एआई के ऐसे टूल्स आने लगे हैं जो आम फौरेंसिक जांच में भी पकड़ में नहीं आएंगे. अब ये फोटो ही नहीं, वीडियो भी बना सकते हैं जिस में एक बौयफ्रैंड एक नई गर्लफ्रैंड के साथ ताजमहल के पीछे छिप कर किस कर रहा है और इसे सोशल मीडिया पर डाल कर दोनों का ब्रेकअप कराया जा सकता है.

आज यह नहीं पता चल रहा कि नरेंद्र मोदी फोटो में दूसरे वर्ल्ड लीडर्स के साथ पीछे असहाय से हैल्पलैस खड़े हैं वाला फोटो सही है या दूसरा, जिस में सब उन्हें घेरे, उन से सवाल पर सवाल कर रहे हैं. चूंकि दोनों फोटो मुफ्तखोरों के पास जाते हैं, वे इस में दिमाग लगा ही नहीं सकते कि क्या सच है.

एआई टैक्निक दूसरे बहुत से काम करेगी पर जो नुकसान वह पर्सनल रिलेशनशिप में करेगी, वह बहुत डैंजरस है. यूजर्स को अभी से होशियार हो जाना चाहिए कि वे असली देख रहे हैं या आर्टिस्ट की बनाई पेंटिंग के फोटो समझ कर उस में ट्रूथ ढूंढ़ रहे हैं. कंटैंट क्रिएटरों ने एआई को जोड़ कर अपनी पोस्टें ज्यादा डालनी शुरू कर दी हैं. वे खुद ही मिक्सिंग करने लगे हैं. कहीं बैकग्राउंड बदल दिया, कहीं एआई से गारमैंट बदल दिया. कुछ टाइम उन के मुफ्त फौलोअर्स उन को मान लेंगे पर फिर वे ऊब जाएंगे.

अगर आईपीएल वर्ल्ड कप फुटबौल के स्टेडियम भरे रहने लगे हैं तो इसीलिए कि असली चीज की कीमत तो हमेशा रहेगी. एआई ने नकली माल इस तरह बाजार में झोंक दिया है कि असली की कीमत अब बहुत बढ़ गई है. अब छोटेछोटे मैचों में भी महंगे टिकट ले कर पैसे वाले जाने लगे हैं. एआई वरदान नहीं है, यह इंडस्ट्रियल टूल है, लोग इस का इस्तेमाल करेंगे तो नुकसान में रहेंगे. यह पूरी कंटैंट क्रिएशन को किल कर सकता है.

यूक्रेन ने अब साबित कर दिया है कि यदि आप के पास मुट्ठीभर इंटैलिजैंट लोग हों तो हर मुसीबत में बड़े से बड़े एनिमी को झटका दिया जा सकता है. जैसे ईरान द्वारा अपने पहाड़ी बंकरों से इजराइल, अमेरिकी बेसेस, कुवैत, कतर, दुबई पर मिसाइल दागने से अमेरिका को ईरान को डैस्ट्रौय किए बिना पीछे हटना पड़ा वैसे ही यूक्रेन के इन्नोवेटरों ने लंबी दूर तक जा सकने वाले ड्रोन बना कर मास्को और उस के आसपास के स्ट्रैटेजिक पौइंट्स पर ड्रोनों से हमला कर मास्को को पसीनापसीना कर दिया.

पहले अपने सोल्जर्स भेजने होते थे दूसरे देशों पर कब्जा करने के लिए, अब दूर बैठे बिना किसी ह्यूमन के उड़ने वाले ड्रोन हर तरह के एम्युनीशन ले जा सकते हैं और रिमोट से फायर कर सकते हैं. एक्यूरेसी  में भी यह टैक्निक आज वारफेयर का नंबर वन टूल बन गई है. पहले ड्रोन सिर्फ कैमरे वाले होते थे जिन का इस्तेमाल फोटो वीडियो खींचने में होता था पर अब ये डैस्ट्रक्शन टूल बन गए हैं.

आज एक नई टैक्निक कब कैसे मानव को कुछ हैल्प करने के साथ नुकसान पहुंचाने के काम भी कर सकती है, ड्रोन इस का अच्छा एक्जांपल हैं. वैडिंग शूट में आया ड्रोन अब किसी दिलजले प्रेमी का भी हो सकता है जो ब्राइडग्रूम को असल में शूट कर दे. ये ड्रौन अभी क्रिमिनल्स के हाथों में नहीं पड़े हैं पर कब उन्हें मिलने लगें, कह नहीं सकते. इन्हें बाद में ट्रेस और ट्रैक करना और मुश्किल हो जाएगा क्योंकि बहुत से ड्रोनों में एन्क्रिप्टेड कोड होता है जिस के जरिए वे हर मैसेज को घुमाफिरा कर अपने पायलट को भेजते हैं.

आज हर टैक्निक डबल यूज की हो गई है. यह लाइफ ​को ईजी बनाने के साथ उसे डैस्ट्रौय भी कर सकती है. यंग जेनरेशन की यह ड्‍यूटी होगी कि अगले सालों में वह टैक्निक को कंट्रोल और रैगुलेट भी करे ताकि उस का मिसयूज कम से कम हो वरना साइंस फिक्शन मूवीज में दिखने वाली टूटी हुई दुनिया असल में भी दिखने लगेगी. AI vs Social Media

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