Fuel Prices India: भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत तक कच्चे तेल की जरूरत बाहर से इम्पोर्ट करता है इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का असर देश पर पड़ना स्वाभाविक है लेकिन सवाल यह है कि जब कच्चे तेल की कीमतें घटती हैं तब आम जनता को राहत क्यों नहीं मिलती? इराक अमेरिका युद्ध के वक़्त कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी थीं सरकार ने इसी बहाने पेट्रोल डीजल के रेट बढ़ाये भी थे. इस वक़्त कच्चे तेल की इंटरनेशनल मार्किट डाउन फॉल में है लेकिन आम आदमी को इससे कोई राहत नहीं मिली.
यह कैसी लूट है? पेट्रोल डीजल के रेट बढ़ने से महंगाई बढ़ती है जिसका खामियाजा आम आदमी भुगतता है. पेट्रोल और डीजल केवल ईंधन नहीं हैं बल्कि पूरे देश की इकोनॉमी की रीढ़ हैं. जब दाम बढ़ते हैं तो ट्रक का किराया बढ़ता है, बस का किराया बढ़ता है, खेती की लागत बढ़ती है और दाल, आटा, दूध, सब्जी, सीमेंट, स्टील और लगभग हर सामान महंगा हो जाता है. इसका सबसे बड़ा बोझ गरीब और मिडिल क्लास पर ही पड़ता है.
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार अप्रैल से जून 2026 के बीच सरकारी तेल कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. यह सच है कि कभी कंपनियों का मार्जिन बढ़ता है तो कभी अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर उन्हें नुकसान भी होता है लेकिन सवाल वही है कि जब लाभ होता है तो उसका फायदा जनता तक तुरंत क्यों नहीं पहुंचता?
असल में सरकार आम लोगों के साथ बड़ा धोखा कर रही है. तेल कंपनियां पिछले 36 दिन से 11 रूपये प्रति लीटर कमा रही हैं. आज कच्चा तेल सिर्फ 68.69 डॉलर प्रति बैरल है. यह पिछले 6 महीने के सबसे सबसे निचले भाव पर है. इस रेट पर तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर 11 रुपये प्रति लीटर का मुनाफा हो रहा है. दिल्ली में 8 जुलाई 2026 के अनुसार पेट्रोल की खुदरा कीमत 102 रूपये प्रति लीटर और डीजल 95 रूपये प्रति लीटर है. कीमत में केवल कच्चे तेल का खर्च ही नहीं, बल्कि रिफाइनिंग, माल ढुलाई, डीलर कमीशन, केंद्र की एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकार का वैट भी शामिल होता है. जब कच्चा तेल 157 डॉलर था तब भी यही दाम था और आज 68 डॉलर है तब भी यही दाम है यानी फायदा हुआ तो कंपनी का नुकसान हुआ तो जनता का.
मुनाफा 70 प्रतिशत तक बढ़ गया पर दाम 1 रुपया भी नहीं घटा. सरकार कहती है कंपनियां घाटे में थीं लेकिन अब 11 रूपये प्रति लीटर का मुनाफा क्या कम है? क्या पिछले एक माह में भरपाई नहीं हो पाई? पेट्रोलियम कम्पनियों के लगातार मुनाफे के आंकड़े सरकार के झूठ की पोल खोल देते हैं.आईओसीएल का मुनाफा 8,398 करोड़ से बढ़कर 15,176 करोड़ हो गया यानि 80 प्रतिशत से ज्यादा. बीपीसीएल का मुनाफा 2,509 करोड़ से बढ़कर 3,214 करोड़ हो गया यानि शुद्ध मुनाफा 28 से ज्यादा हो गया. एचपीसीएल का मुनाफा 3,413 करोड़ से बढ़कर 6,060 करोड़ हुआ यानि 77 परसेंट से ज्यादा. देश की कुल 3 कंपनियों का मुनाफा ही 14,320 करोड़ से 24,450 करोड़ हो चुका है यानि औसतन 70 फीसदी से ज्यादा. 70 मुनाफा बढ़ गया तब भी पेट्रोल 102 रुपये और डीजल 95 रुपये ही है.
2018 में जब कच्चा तेल 80 डॉलर था तब पेट्रोल 72 रुपये था. 2020 में कच्चा तेल 43 डॉलर था तब भी पेट्रोल 68 रुपये था. आज कच्चा तेल 68 डॉलर है और पेट्रोल 102 रुपये है. कच्चा तेल 75 हो या 120 रूपये प्रति बैरल पेट्रोल पम्प पर दाम एक ही रहते हैं क्योंकि जैसे ही इंटरनेशनल मार्किट मे दाम घटते हैं सरकार एक्साइज और वैट बढ़ा देती है. सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर जनता को बेवकूफ बनाया है. कंपनियां 36 दिन से हर लीटर पर 11 रुपये कमा रही हैं. मुनाफा 70 फीसदी बढ़ गया पर सरकार ने जनता को 1 रुपया की राहत नहीं दी.
लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी केवल कंपनियों के मुनाफे का ख्याल रखना नहीं होता बल्कि महंगाई पर कंट्रोल रखना भी होता है अगर पेट्रोल और डीजल के दाम लंबे समय तक ऊंचे बने रहते हैं तो इसका असर पूरी इकोनॉमी पर पड़ती है इसलिए सवाल खड़ा होता है कि क्या पेट्रोल और डीजल आम आदमी की जरूरत हैं या सरकारों के लिए मुनाफा बनाने का सबसे आसान जरिया? Fuel Prices India





