Corruption in India: कभी कहा जाता था कि भ्रष्टाचार इस देश की सबसे बड़ी बीमारी है. फिर एक दौर आया जब दावा किया गया कि “न खाऊंगा, न खाने दूंगा”. लेकिन लगता है कि भ्रष्टाचार ने भी समय के साथ खुद को “आत्मनिर्भर” बना लिया है. अब वह इतना आत्मविश्वासी हो चुका है कि नोट घर के पलंगों, बक्सों, टाइलों के पीछे मिल रहे हैं और सोना-चांदी बैंक के लॉकरों में नहीं, घर की तिजोरियों में ऐसे सजा है मानो कोई निजी टकसाल चल रही हो.
उत्तर प्रदेश के सेवानिवृत्त एआरटीओ ललित कुमार के लखनऊ, अलीगंज स्थित आवास पर 8 जुलाई की सुबह विजिलेंस की छापेमारी में जो कुछ मिला, वह उस व्यवस्था का आईना है जो वर्षों से भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” का दावा करती रही है. आइये विजिलेंस के छापे में मिली ललित कुमार की संपत्ति पर एक नजर डालते हैं –
पैकेट में छिपाकर रखे 1.62 करोड़ रुपये नकद करीब 20 करोड़ के सोने चांदी के 22 किलो बिस्किट व आभूषण13 करोड़ रुपये से अधिक की अचल संपत्तियों के दस्तावेज –
1. – सी-143, सेक्टर-ई, अलीगंज, लखनऊ (आवासीय भवन)
2. – सी-145, सेक्टर-ई, अलीगंज, लखनऊ (आवासीय भूखण्ड)
3. – खसरा नं-1321, मोहल्ला भरावन कला, बालकगंज, लखनऊ (आवासीय भूखण्ड)
4. – 532/491 बनारसी टोला, अलीगंज, लखनऊ (आवासीय भवन)
5. – 1631, कल्ली पश्चिम, मोहनलालगंज, लखनऊ (आवासीय भूखण्ड)
6. – मोहनलालगंज चौरहिया, लखनऊ में कृषि भूमि
7. – ग्राम बेगरिया मोहनलालगंज में कृषि भूमि
8. – इस्माइलगंज, लखनऊ में आवासीय भूखण्ड
9. – 10 सी/40 वृंदावन योजना लखनऊ में आवासीय भूखण्ड
10. – फ्लैट संख्या-3002 अंसल एपीआई, लखनऊ में बुकिंग
11. – माहेश्वरी इंफ्राटेक नोएडा में फ्लैट बुकिंग
12. – आम्रपाली स्प्रिंग मीडोज, नोएडा में फ्लैट बुकिंग
13. – ग्राम जीतपुरवा जनपद बाराबंकी में कृषि भूमि
14. – एक अन्य-ग्राम जीतपुरवा जनपद बाराबंकी में कृषि भूमि
15. – ग्राम सहगो कोठी नूर मार्केट रायबरेली में कृषि भूमि
अनेकों निवेश के प्रमाण और शुरुआती अनुमान में लगभग 35 करोड़ रुपये की संपत्ति, यह सब किसी उद्योगपति, कारोबारी या विरासत में मिली रियासत की कहानी नहीं, बल्कि एक सरकारी अधिकारी की कमाई की कहानी है. सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि यह सब मिला कैसे? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि यह सब इतने वर्षों तक दिखाई क्यों नहीं दिया?
ललित कुमार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति होने की शिकायत वर्ष 2020 में हुई थी. इसकी लम्बी जांच चली. एफआईआर 2024 में दर्ज हुई और अब जाकर छापा पड़ा. इतना कुछ हो रहा था मगर साहब का कॉन्फिडेंस देखिये कि पूरा खजाना घर में जमा कर उस पर कुंडली मार कर बैठे थे. कॉन्फिडेंस इस बात का था कि कभी पकड़े नहीं जायेंगे.
ये कॉन्फिडेंस इसलिए भी था क्योंकि तीन साल पहले भी जांच हुई थी, लेकिन अपनी पहुंच से मामला दबवा लिया था. ऐसे में सवाल केवल एक अधिकारी पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर खड़ा होता है. आखिर किसके संरक्षण में ऐसे मामले वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़े रहते हैं? यह वही शासन है जो रोज भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के दावे करता है. लेकिन यदि एक परिवहन अधिकारी अपनी वैध आय से कई गुना अधिक संपत्ति इकट्ठी कर ले, अनेक भूखंड, मकान, कृषि भूमि, फ्लैट बुकिंग और करोड़ों का निवेश कर ले, और तब भी वर्षों तक व्यवस्था की निगाहों से बचा रहे, तो यह केवल किसी व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि पूरी निगरानी व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है.
और यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है. उत्तर प्रदेश का परिवहन विभाग वर्षों से शिकायतों का पर्याय बन चुका है. ड्राइविंग लाइसेंस, वाहन फिटनेस, परमिट, प्रवर्तन और चेकिंग, हर स्तर पर दलाली और अवैध वसूली होती है. यहां नियमों से अधिक “रेट लिस्ट” काम करती है.
जिस सत्ता का नैरेटिव भ्रष्टाचार के विरुद्ध सबसे बड़ी लड़ाई लड़ने का दावा करता है, उसी के अमृतकाल में राम मंदिर लुट गया. दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग पर 700 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है और ललित कुमार जैसे छुटभैये कर्मचारियों के घरों से अकूत दौलत की गंगा-जमुना बह रही है. ऐसे में बड़े अधिकारियों, जजों, नेताओं की संपत्ति का ज़रा अनुमान भर लगा कर देखिये. भाजपा के अमृतकाल में भ्रष्टाचार की गंगा पहले से कहीं अधिक वेग से बह रही है. Corruption in India





