Religion and Politics: तमिलनाडु में पेरियार ई वी रामासामी का आत्मसम्मान आंदोलन 100 साल से चल रहा है. पेरियार ने खुल कर ब्राह्मणवाद, जातिवाद और अंधविश्वास का विरोध किया था. पेरियार की नजर में जो धर्म जन्म के आधार पर इंसान को ऊंचानीचा बनाता है वह धर्म एक बीमारी है. उदयनिधि उसी विचारधारा के वारिस हैं. डीएमके का पूरा राजनीतिक आधार सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता पर टिका है. ऐसे में उन का बयान कोई ‘सरप्राइज’ नहीं है.

मनुस्मृति जैसे तमाम हिंदू ग्रंथों में जाति को धर्म का हिस्सा बताया गया है जिस का नतीजा यह है कि आज भी मंदिर में घुसने पर दलित की पिटाई होती है, घोड़ी चढ़ने पर हत्या कर दी जाती है, मूंछ रखने पर मारपीट की जाती है और ये सब सनातन के नाम पर ही होता है. उदयनिधि ने इसी भेदभाव को बीमारी कहा. डेंगू मच्छर से फैलता है और जातिवाद धर्म से फैलता है, इसलिए इलाज दोनों का जरूरी है.

बीजेपी को एक ‘मुसलिम तुष्टिकरण’ और ‘हिंदू खतरे में’ वाला नैरेटिव चाहिए था और इसी बीच उदयनिधि का बयान हाथ लग गया, इसलिए गोदी मीडिया ने प्राइम टाइम पर इस खबर को प्राथमिकता दी. एक टीवी चैनल के एंकर ने डीएमके के एक नेता से चिल्ला कर पूछा, ‘क्या सनातन को मिटाओगे?’ लेकिन एंकर ने यह नहीं पूछा कि नीट पेपर लीक से लाखों बच्चों का भविष्य क्यों लीक हो गया?

भारत में आज भी जाति पूछ कर कमरा किराए पर मिलता है. सफाई कर्मचारी के बेटे को अभी भी वही काम करना पड़ता है. मिड डे मील में दलित रसोइया का खाना ऊंची जाति के बच्चे नहीं खाते. मीडिया इन मुद्दों पर डिबेट आयोजित नहीं करता. डिबेट होगी कि उदयनिधि ने सनातन के बारे में गलत क्यों कहा? असल में ऐसे मुद्दों को तूल देने से वोट का ध्रुवीकरण होता है, टीआरपी मिलती है और जनता असली सवाल भूल जाती है.

कोई भी विचार, चाहे वह धर्म हो या राजनीति, अगर इंसान को बांटता है तो उस की आलोचना होगी ही. उसे खत्म करने की बात का मतलब है उस के भेदभाव को खत्म करना है. गोदी मीडिया को यह समझना होगा कि स्टूडियो में बैठ कर चिल्लाने से जाति खत्म नहीं होती. जनता को भी यह बात समझनी होगी कि जो चैनल उस को महंगाई नहीं दिखाता, वह धर्म को खतरे में जरूर दिखाएगा क्योंकि एक से पेट भरता है, दूसरे से वोट मिलता है. सवाल पूछना बंद करोगे तो लोकतंत्र बीमार पड़ेगा और बीमारी का इलाज डराने से नहीं होता.

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