Financial Crisis: कोई ग्राहक जब तक लोन लेता नहीं तब तक बैंक उस को तरहतरह के प्रलोभन देता रहता है. जैसे ही ग्राहक लोन के फार्म पर साइन करता है बैंक का रुख बदल जाता है. इस के बाद बैंक और सूदखोर महाजन में कोई फर्क नहीं रह जाता है. टैक्नलौजी के इस दौर में बैंक लोन चुकाने में देरी करने वाले के खिलाफ क्याक्या कर सकते है इस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘सवा सेर गेहूं’ एक गरीब किसान, शंकर की कहानी है. जिस ने एक महात्मा को खिलाने के लिए पंडित विप्र महाराज से ‘सवा सेर गेहूं’ उधार लिया था. समय के साथ उस का ब्याज इतना बढ़ जाता है कि शंकर को अपनी पूरी जिंदगी गुलामी में बितानी पड़ी. उस के मरने के बाद उस का बेटा भी उसी कर्ज के जाल में फंस जाता है. शंकर एक सीधासाधा किसान शंकर था. एक शाम उस के घर एक महात्मा आए. शंकर ने उन को खाने खिलाने के लिए पंडित विप्र से सवा सेर गेहूं उधार ले लिया.
कुछ समय बाद उस ने सवा सेर से अधिक का गेहूं विप्र महराज को दे दिया पर उस का हिसाबकिताब नहीं किया था. करीब 7 साल के बाद विप्र महराज ने ब्याज लगा कर उधार लिए सवा सेर के बदले साढ़े पांच मन (लगभग 200 किलो से अधिक) गेहूं का हिसाब निकाल दिया. शंकर कई बार कर्ज चुका देता था पर कुछ न कुछ ब्याज रह जाता था. इस को चुका न पाने के कारण शंकर को विप्र महराज के यहां बिना मजूरी के काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा. 20 साल के बाद भी कर्ज चुकता नहीं होता. इस बीच शंकर की मौत हो जाती है, कर्ज फिर भी खत्म नहीं होता और विप्र महाराज उस के बेटे को गुलाम बना लेते हैं.
कानपुर के बिल्हौर में पोस्टमास्टर सौरभ शर्मा ने कर्ज और लेनदारों के दबाव से परेशान हो कर आत्महत्या कर ली. दोस्त के घर फांसी लगा कर सुसाइड किया. सौरभ शर्मा हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के कानेना थाना क्षेत्र के चेलवान गांव का रहने वाला था. वह कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र के वीरहूं गांव स्थित डाकघर में ब्रांच पोस्ट मास्टर के पद पर तैनात था. वह घर जाने के दौरान बिल्हौर में अपने दोस्त रोहित के कमरे पर रूका था. रात में दोनों ने साथ खाना खाया और फिर सोने चले गए. सुबह जब काफी देर तक कमरे का दरवाजा नहीं खुला तो रोहित को शक हुआ. उस ने खिड़की से झांक कर देखा तो अंदर का नजारा देख कर सन्न रह गया. सौरभ ने मफलर के सहारे फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी.
रोहित ने पुलिस को बताया कि सौरभ पर बहुत कर्ज हो गया था. लेनदार लगातार उस पर पैसे लौटाने का दबाव बना रहे थे. हालात इतने खराब हो गए थे कि सौरभ ने अपना मोबाइल फोन तक बेच दिया था और नंबर भी बंद कर दिया था. इसी तनाव में उस ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. इस तरह की घटनाएं कम नहीं है. बैंक के कर्ज के चक्कर में लोग मानसिक रूप से बीमार हो जा रहे हैं. निजी बैंकों ने लोन की वसूली के लिए ठेकेदार रख लिए हैं जो समय पर लोन न देने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाते हैं. जिस से परेशान लोग खतरनाक कदम उठा लेते हैं.
मैनपुरी के गांव अढूपुर के रहने वाले 60 साल के किसान संतोष कुमार खेती करते थे. वह और उन की 55 वर्षीय पत्नी राधा देवी सांस रोग से पीड़ित थे. यह दोनों दिहुली में डाक्टर से इलाज करा रहे थे. यह दोनों दवा लेने के लिए गए सादौल मार्ग पर गांव सोडरा के निकट दोनों बेहोश अवस्था में मिले. दोनों को सैफई स्थित पीजीआइ में भर्ती कराया गया. जहां इलाज के दौरान दोनों की मृत्यु हो गई. जांच में पुलिस को किसान की जेब में सल्फास की गोलियां मिलीं. पुलिस की विवेचना में पता चला कि कर्ज से परेशान हो कर आत्महत्या की थी.
मरने वाले किसान संतोष कुमार ने करीब 15 साल पहले भूमि विकास बैंक से भैंस खरीदने के लिए 60 हजार का कर्ज लिया था. जमा न करने के कारण यह बढ़ कर 2.62 लाख रुपए हो गया था. इसे भरने को ले कर उन का दोनों पुत्रों से झगड़ा चल रहा था. संतोष कुमार के पास 7 बीघा जमीन थी. कर्ज अदा न करने पर जमीन के नीलाम होने का खतरा था. इस को ले कर पिता और पुत्रों में विवाद था. लड़के नहीं चाहते थे कि जमीन नीलाम हो और पिता के पास कर्ज के पैसे देने वाली हालत नहीं थी.
आज के बैंक बन गए सूदखोर:
आज के दौर में भी कर्ज की यही कहानी है. अब सूदखोर की जगह बैंकों ने ले ली है. लोन देने के लिए बैंक ग्राहकों को तरहतरह के लालच देते हैं. जैसे ही लोन लिया जाता है बैंक पक्के सूदखोर महाजन हो जाते हैं. लोन के तरहतरह के रूप हो गए हैं. क्रेडिट कार्ड भी इस का हिस्सा हो गया है. बैंक का लोन फार्म देखेंगे तो उस में इतने बिंदू होते हैं जिन को सामान्य लोन लेने वाला आदमी कभी भी पढ कर समझ ही नहीं सकता है. लोन देने के लिए कागजात पूरे कराने वाली नौकर ग्राहक को बस मुंह से समझा देता है. जबकि लौन फार्म पर तमाम शर्ते होती हैं. जिन को ग्राहक ठीक से पढ़ कर समझ ले तो वह कभी लोन ही न लें.
बैंक से कर्ज लेना दोधारी तलवार जैसा होता है. समय पर कर्ज उतर जाए तो अच्छा होता है पर अगर समय पर कर्ज नहीं उतर रहा तो यह अपने आप में खतरनाक है. यह मानसिक तनाव का कारण बन जाता है. कई बार कर्ज लेने वाला अपनी आय की क्षमता से अधिक कर्ज ले लेता है. तो यह हालत फंसने वाली हो जाती है. इस से बचने के लिए लोग दूसरा लोन ले लेते हैं. इस से कर्ज का जाल गहराता जाता है. आजकल पर्सनल लोन लोग अधिक ले लेते हैं. इस में ब्याजदर अधिक होती है. इस को चुकाने में दिक्कत होती है.
क्रेडिट स्कोर ही नहीं पर्सनल इमेज भी खराब कर सकते हैं बैंक:
बैंक लोन पर प्रोसैसिंग फीस, वेरिफिकेशन फीस और कई तरह की छिपी हुई फीस ली जाती है. जो लोन की कुल लागत को बढ़ा देती है. जिस समय होम लोन या कार लोन लेने के लिए लोन फार्म भरते हैं उसी समय बैंक यह अधिकार ले लेता है कि अगर लोन चुकता नहीं किया गया तो बैंक संपत्ति को नीलाम कर के अपना पैसा वसूल कर सकता है. समय पर लोन चुका न पाने के कारण क्रेडिट स्कोर कम हो जाता है, जिस से भविष्य में लोन मिलना मुश्किल हो जाता है. ईएमआई का बोझ और रिकवरी के लिए कौल या नोटिस मानसिक परेशानी का कारण बन जाते हैं.
एक लोन कई गारंटी:
यदि जानबूझ कर लोन नहीं चुकाते हैं तो बैंक कानूनी कार्यवाही कर सकता है, जिस से लोन लेने वाले का जेल की सजा भी हो सकती है. लोन फार्म भरते समय बैंक व्यक्तिगत जानकारी भी लेती है. इस के लिए बैंक के लोन ऐप्स भी होते हैं. यह बैंक जिस तरह से कर्ज न दे पाने वाले का क्रेडिट स्कोर कम कर देता है. उसी तरह से वह लोन लेने वाले के कौन्टैक्ट्स के जरिए ओला, उबर, जोमैटो, हाउस टैक्स और बहुत सारे लोगो को बता सकता है कि लोन लेने वाला डिफाल्टर है उस से बिजनेस करना ठीक नहीं है.
यही नहीं बैंक मैसेज के जरिए यह भी कह सकता है दबाव बना सकता है कि अगर इस लोन अदा न कर पाने वाले के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए गए तो बैंक इस की मदद करने वाले के साथ अपना बैकिंग व्यवहार खत्म कर सकते हैं. आज टैक्नलौजी के जमाने में यह संभव है. सभी कुछ औनलाइन है और हर एक पैसे की गतिविधि बैंक से जुड़ी है. बैंक ऐप्स हो, पेटीएम हो और कोई और भुगतान का जरिया बैंक की नजर में सब होता है. ऐसे में ग्राहक के डिफाल्टर होने की जानकारी और उस से बिजनेस न करने के निर्देश और दबाव बैंक कर सकता है.
जब ग्राहक बैंक से कोई पर्सनल लोन या होम लोन लेता है तो उस के पेपर बैंक अपने पास रख लेता है. यह पेपर तब वापस होते हैं जब बैंक लोन चुकता कर दिया जाता है. जब बैंक लोन के बदले गारंटी लेने वालों से गवाही कराती है तो फिर गाड़ी या घर के पेपर क्यों अपने पास रखती है? जब वह बैंक लोन लेने वाले, गारंटी लेने वालों से लोन की रकम वापस लेने की सहमति ले लेती है तो कार या घर के पेपर क्यों रखने चाहिए? अगर पेपर रखने हैं तो गारंटी लेने वालों को क्यों बुलाया जाता है. यह बैंक दोहरे काम क्यों कर रहा है.
डेट ट्रैप में फंस जाते हैं लोन लेने वाले:
बैंकों ने अपना सारा काम ऐप्स पर कर दिया है. यहां डेट ट्रैप से बचना सब से मुश्किल होता है. बैंक लोन की ईएमआई चुकाने की एक डेट यानि तारीख तय कर देती है. किसी भी कारणवश उस डेट पर पैसा बैंक को नहीं मिला तो बैंक ईएमआई पर ब्याज जोड़ देती है. क्रेडिट कार्ड देते समय बैंक कहता है कि तय डेट तक वह ब्याज नहीं लेगी जैसे ही वह डेट निकलती है बैंक ब्याज लेने लगता है. इस डेट ट्रैप से बचना बेहद कठिन होता है. इस से बचने के तरीके समझने जरूरी होता है.
लोन की ईएमआई इनकम की 50 फीसदी से ज्यादा होना खतरनाक होता है. कई बार एक से अधिक लोन चल रहे होते हैं या फिर कोई एक लेकिन बड़ा लोन चल रहा होता है, जिस के लिए मोटी रकम ईएमआई में जा रही होती है. कई बार लोग डिस्काउंट और अच्छी डील के चक्कर में किस्तों पर कई चीज ले लेते हैं. हर महीने इन सब की ईएमआई भर रहे होते हैं. अगर ईएमआई आय की 50 फीसदी से ज्यादा है तो यह जोखिम भरा काम है. ईएमआई आय के 30 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए. ईएमआई जितनी ज्यदा जाएगी, सेविंग्स उतनी ही घटती जाएगी.
अपनी मासिक आय का कम से कम 25 फीसदी बचत करनी जरूरी होती है. अगर सब खर्च हो जा रहा है तो जोखिम है. जल्द ही ऐसा वक्त आ सकता है कि खर्चे पूरे करने के लिए इनकम कम पड़ जाएगी. ऐसे में कर्ज लेना जरूरी हो जाएगा. क्रेडिट कार्ड का मिनिमम बिल चुकाया जाना इस बात का संकेत है कि कर्ज का जाल कसता जा रहा हैं. क्रेडिट कार्ड की देय न्यूनतम रकम आमतौर पर खर्च पर ब्याज की राशि होती है. यदि एक बार में पूरी बकाया राशि का भुगतान नहीं हुआ तो आगे मुश्किल हो सकती है. अगर क्रेडिट कार्ड बिल का 90 फीसदी भुगतान कर दिया जाता हैं, तो बैंक अगले बिल में पूरी राशि पर ब्याज लेंगे, न कि बकाया केवल 10 फीसदी पर. जैसे प्रेमचंद्र की कहानी पूस की रात में हुआ था.
अगर एक कर्ज को चुकाने के लिए एक नया कर्ज लेना पड़ रहा है तो समझ जाएं कि कर्ज के जाल में पूरी तरह फंस चुके हैं. कई लोग यह सोच कर ऐसा करते हैं कि अगले महीने अपने फाइनैंसेज को मैनेज कर लेंगे. इस में से अधिकतर बार मैनेज होता नहीं है. जिस से पूरा बजट बिगड़ जाता है. एक भी दिन डेट से अधिक होने पर फाइन लग जाता है.
जो लोग लाइफस्टाइल जैसे फोन, नई गाड़ी, बड़ी टीवी, फ्रिज या वाशिंग मशीन ईएमआई पर लेते हैं यह नहीं करना चाहिए. लाइफस्टाइल से जुड़ी जरूरतों को अपनी इनकम या फिर बचत से ही पूरा करना चाहिए. जो लोग इस के लिए भी कर्ज ले रहे हैं तो इस का मतलब है कि इनकम को सही तरीके से मैनेज नहीं कर पा रहे हैं. ईएमआई मिस होने से क्रेडिट स्कोर प्रभावित होता है और लोन डिफाल्ट कर सकने का मैसेज जाता है.
क्रेडिट कार्ड भी एक तरह का लोन ही है. इस में पहले खर्च करने और बाद में चुकाने की सुविधा होती है. इसलिए क्रेडिट कार्ड से लिए गए लोन को भी समय पर चुकाना जरूरी है. हर तरह के लोन में सब से महंगा लोन क्रेडिट कार्ड लोन ही होता है. इस की ब्याज दर सब से अधिक होती है. इसलिए लोन इंट्रैस्ट फ्री पीरियड के अंदर चुकाने की कोशिश करें. एक से ज्यादा क्रेडिट कार्ड लोन ले रखे हैं तो खतरे और भी अधिक है. क्रेडिट कार्ड पर मिलने वाली पूरी लिमिट को खर्चा करने से बचना चाहिए. क्रेडिट लिमिट के 20-30 फीसदी से ज्यादा न खर्च न हो.
लोन न चुका पाने के कारण बैंकों का एनपीए बढ़ता जाता है. 2025 में यह करीब 4 फीसदी था. 25 से 35 साल वर्ग के लोग सब से अधिक डिफाल्टर होते हैं. पर्सनल लोन के मुकाबले होम लोन और एग्रीकल्चर लोन समय पर चुकता किए जाते है. सबसे अधिक डिफाल्टर के्रडिट कार्ड वाले होते है. छोटा बिजनेस करने वाले सबसे अधिक डिफाल्टर होते है नौकरी पेषा यानि वेतन पाने वाले लोन देने में अधिक भरोसेमंद होते है. लोन अदा न करने का सबसे बडा कारण नौकरी का जाना, ज्यादा ईएमआई का होना, मेडिकल इमरजेंसी, बिजनेस में हानि या क्रेडिट कार्ड का सही उपयोग न होना होता है.
क्या होता है क्रेडिट स्कोर यानि सीआईबीआईएल ?
सीआईबीआईएल 300 से 900 के बीच होता है. जितना ज्यादा स्कोर होता है ग्राहक उतना भरोसेमंद होता है. 650 से नीचे स्कोर वाला ग्राहक सब से अधिक रिस्की माना जाता है. 750 से अधिक वाला ग्राहक सब से सुरक्षित होता है. इस को तैयार करते समय बैंक लोन के भुगतान करने वाले के तरीके को देखते हैं. समय पर भुगतान हुआ है या नहीं. बारबार लेट पेमेंट से स्कोर बिगड़ता है. 90 दिन लेट वाले को सब से खतरनाक माना जाता है.
क्रेडिट स्कोर को बनाते समय यह भी देखा जाता है कि लोन की कितनी लिमिट का उपयोग किया था. अगर 80-90 फीसदी क्रेडिट लिमिट का उपयोग किया है तो बैंक यह मानता है कि ग्राहक पैसे के दबाव में है. जब बारबार लोन के लिए एप्लाई करते हैं तो बैंक मानता है कि पैसे की जरूरत अधिक है. जिन की आय स्थिर नहीं होती है उन का स्कोर कम आंका जाता है. बैंक खाते में पैसों के आवागमन, खर्च और आय, नौकरी बदलने की स्थित और बैंक खाते में खर्च और बचत को भी देखा जाता है. इस स्कोर के आधार पर ही लोन दिया जाता है.
बैंक ग्राहकों को सेवा देने का काम कम रहे हैं उस से अधिक ग्राहकों से लूट करते है. चाहे एटीएम से पैसा निकालना हो, चेक बुक लेना हो, पासबुक लेनी हो हर काम के बदले पैसे लिया जाता है. कम बैलेंस होने पर पैसा कट जाता है. एटीएम के उपयोग पर सीमा और कई अन्य छिपे हुई कटौती की जाने लगी है. बैंको द्वारा ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं में परेशानी बड़ी समस्या है.
टैक्नलौजी के आने के बाद यह परेशानियां कम होने की जगह बढ़ती जा रही है. बैंकिंग सेवाओं के लिए लंबी प्रक्रिया और बारबार पेपर जमा करने की जरूरत पड़ रही है. एटीएम बारबार खराब हो रहे हैं जिस से पैसा निकालने के लिए बारबार एटीएम के चक्कर लगाने पड़ते हैं. औनलाइन बैंकिंग में तकनीकी खामियां आ जाती है. बैंक कर्मचारियों का व्यवहार असंतोषजनक होता है. टैक्नलौजी का प्रयोग होने के बाद भी बैको में काम निपटाने में बहुत अधिक समय लगता है. Financial Crisis
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