Family Story: शनिवार शाम से ही वसुधा का दिल बैठने लगता था. हफ्तेभर तक जितनी भागदौड़ होती थी उस की, उस से ज्यादा तो रविवार को बोझ बढ़ जाता था. सब के हिस्से आराम करने के लिए एक रविवार आता था लेकिन वसुधा के हिस्से तो जैसे रविवार लिखा ही नहीं था. आराम तो दूर की बात है, रविवार को तो उस को दोगुना काम हो जाता था.

अभय को रविवार को छुट्टी रहती तो वह शनिवार की रात पलंग पर पसर कर देररात तक अपनी पसंद की फिल्म देखता. टीवी की लाइट और आवाज में वसुधा सो न पाती. जब तक अभय फिल्म देख कर सोता, तब तक वसुधा की नींद उड़ जाती. कितनी बार अभय से रिक्वैस्ट करती कि जल्दी सो जाया करो लेकिन वह एक ही जवाब देता कि ‘हफ्तेभर तो औफिस में सिर खपाता रहता हूं, एक दिन क्या अपने ही घर में अपनी मरजी से फिल्म भी नहीं देख सकता. इतने मनोरंजन पर तो मेरा भी अधिकार है. हफ्तेभर तो नहीं रहता हूं मैं तुम्हें डिस्टर्ब करने के लिए. दोपहर को सो लेना.’

अब वसुधा क्या कहे. हफ्तेभर वह भी तो सुबह 5 बजे से पहले उठ कर बच्चों के टिफिन बनाती है, यूनिफौर्म प्रैस कर, उन्हें तैयार कर बसस्टौप पर छोड़ने भी वही जाती है. अभय का तो एक ही बहाना है कि ‘दिनभर औफिस में काम करना है तो सुबह थोड़ी देर सो लेने दो, तुम तो दोपहर में भी सो सकती हो.’

अब वह कैसे अभय को सम?ाए कि बच्चों के बाद अभय का चायनाश्ता, दोपहर का लंच, बच्चों की फरमाइश का खाना बनाना, बाई से घर का काम करवा कर बड़ी मुश्किल से बीच में वह नहाने का समय निकाल पाती है. घर के काम से फ्री हुई नहीं कि बच्चे स्कूल से आ जाते हैं. फिर वही, उन्हें खिलानापिलाना, ड्रैस चेंज करवाना, उन का होमवर्क करवाना. बस, सारी दोपहर खत्म और फिर शाम हुई नहीं कि फिर वही शाम का नाश्ता, डिनर के लिए जुट जाने के बाद रात 11 बजे तक ही वह बिस्तर पर लेट पाती है.

उस पर ‘रविवार है’ कह कर क्या तो अभय की और क्या तो बच्चों की ढेर सारी फरमाइशें. उस पर भी सब के ताने. बच्चे कहते, ‘मम्मी, तुम कितनी लकी हो कि तुम्हें पढ़ना नहीं पड़ता. बस, आराम से रहो.’ अभय कहते, ‘तुम्हारे तो मजे हैं भई, औफिस का झंझट नहीं, कोई वर्कलोड नहीं. बस, ऐश है.’

अब सुबह से रात तक कितने ऐश में रहती है वह, यह तो उस का दिल ही जानता है. उस पर किसी के नाश्तेखाने का कोई समय ही नहीं है. जितना समय खाना बनाने में नहीं लगता, उस से ज्यादा समय तो सब को खाना खिलाने में लग जाता है. सब का नाश्ते का, खाने का समय अलग. सारा दिन वह खाना ही परोसती रहती है. दोपहर का खाना खत्म हुआ नहीं कि जिस ने सब से पहले खाया होता है उस को फिर भूख लग आती है.

उस पर पढ़ाई का आजकल पैटर्न ऐसा हो गया है कि हर समय बच्चों के टैस्ट ही चलते रहते हैं. ऋचा के टैस्ट खत्म हुए नहीं कि रोहन के शुरू. काम के बीच बच्चों को पढ़ाना भी पड़ता है और अधिकतर रविवार के दिन पर एक बो?ा यह भी बढ़ जाता है क्योंकि अकसर ही सोमवार को बच्चों का टैस्ट या परीक्षा होती. कितनी भी तैयारी कर के रखो, तब भी वह सारा दिन चकरघिन्नी सी घूमती रहती है सब की फरमाइशें पूरी करते हुए.

और इधर हफ्तेभर से सासुमां और ससुरजी भी आए हुए हैं उस के पास रहने को. अब कल का रविवार जाने कैसे बीतेगा. ससुरजी को सुबह 6 बजे ही चाय हाथ में चाहिए और अभय को 9 बजे जब ससुरजी का नाश्ते का समय होता है. इन के बीच बच्चों को मैनेज करना होगा. ‘उफ्फ, पता नहीं मेरा अपना रविवार कब आएगा.’ वसुधा के दिल से एक आह निकली.

दूसरे दिन वसुधा ने 9 बजे सासससुर को नाश्ता दिया तो उन्होंने कहा, ‘‘बच्चों और अभय के साथ ही नाश्ता करेंगे, बहू. उन्हें भी बुला लो.’’

तब वसुधा बोली कि ‘‘आज तो रविवार है. वे लोग तो आज देर से उठेंगे. आप दोनों नाश्ता कर लीजिए.’’

‘‘ऐसे कैसे देर से उठेंगे. 9 तो बज गए. तुम क्या सारा दिन नाश्ता हाथ में ले कर घूमती रहोगी?’’ ससुरजी ने डपट कर सब को आवाज लगाई तो तीनों अगले 15 मिनट में ही डाइनिंग टेबल पर हाजिर हो गए. 10 बजे तक सब का चायनाश्ता हो गया. वसुधा खाने की तैयारी करने लगी.

बच्चे और अभय हर बार की तरह टीवी के सामने बैठ गए तो सासुमां ने टोक दिया, ‘‘समय पर नहा लो.’’

‘‘मां, आज रविवार है. नहा लूंगा आराम से. औफिस थोड़े ही जाना है,’’ अभय ने पैर फैला कर आलस से कहा.

‘‘औफिस नहीं जाना, मतलब, सारा दिन ऐसे ही बैठे रहोगे क्या. पहले नहा लो. नहाने के बाद टीवी नहीं देख सकते, ऐसा कोई नियम तो नहीं है न?’’ सासुमां ने अभय को डांट दिया.

अभय चुपचाप उठ कर नहाने चला गया. उस के बाद मांजी ने ऋचा और रोहन को भी नहाने भेजा.

डेढ़ बजे वसुधा सासससुर को खाना परोसने लगी तो ससुरजी ने कहा, ‘‘सब साथ बैठ कर ही खाना खाएंगे. इस से परिवार में प्यार भी बढ़ता है और गृहिणी भी समय पर काम से फ्री हो जाती है. बुलाओ सब को.’’

ससुरजी की एक आवाज पर सभी तुरंत डाइनिंग टेबल पर आ बैठे. आपस में बातें करते हंसतेबोलते सब का लंच हो गया.

उस दिन ढाई बजे जब सारा काम निबट गया तो सालों बाद वसुधा अखबार ले कर अपना मनपसंद कौलम पढ़ पाई. बीच में जब भी बच्चे या अभय कोई फरमाइश करने के लिए मुंह खोलते, मांजी उन को डांट देतीं कि ‘खुद उठ कर ले लो, तुम्हारे पैरों में क्या मेहंदी लगी है. हर काम वसुधा ही क्यों करे? और रोहन, तुम अब क्या इतने छोटे हो कि खुद पानी ले कर पी नहीं सकते. करना तो यह चाहिए कि तुम खुद मां को पानी ला कर दो.’

अब तो मांजी की डांट के सामने रोहन तो क्या अभय की भी हिम्मत नहीं थी कि वह वसुधा से पानी मांग ले. बरसों बाद वसुधा दोपहर में घंटाभर तान कर सोई. शाम 5 बजे जब उस ने सब की चाय बनाई तब ससुरजी ने सरप्राइज दिया, ‘‘बच्चों को हम देख लेंगे. तुम्हारे लिए फिल्म के टिकट बुक कर दिए हैं. जाओ, तुम दोनों फिल्म देख आओ.’’

‘‘लेकिन रात का खाना भी तो बनाना है, पिताजी. फिल्म देखने में तो देर हो जाएगी,’’ वसुधा बोली.

‘‘9 बजे खत्म हो जाएगी. आज के दिन सब खिचड़ी खा लेंगे. मैं बना लूंगी,’’ मांजी ने कहा तो वह आननफानन तैयार हो कर मूवी देखने चली गई. बरसों बाद एक खुशनुमा शाम बिताई उस ने. इंटरवल में पौपकौर्न और कोल्डड्रिंक भी पिया. मूवी भी खूब एंजौय की.

लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद घर आते हुए फिर रसोईघर दिखने लगा, पता नहीं मांजी ने खिचड़ी बनाई होगी या नहीं. बनाई भी होगी तो सब को परोसना तो पड़ेगा ही न. घर आते ही वह हाथमुंह धो कर किचन में जाने लगी तो मांजी ने कहा, ‘‘वहां कहां जा रही हो. आओ, खाना खा लो.’’

‘‘ओह मांजी, आप को ही बनाना पड़ा. आप बैठिए, मैं परोस देती हूं खिचड़ी,’’ वसुधा बोली.

‘‘लेकिन मैं ने तो खिचड़ी बनाई ही नहीं,’’ मांजी मुसकराते हुए बोलीं.

‘‘तब फिर, क्या बनाया है?’’ वसुधा ने असमंजस से पूछा.

‘‘तुम्हारी मनपसंद मिक्स वेज, शाही पनीर, फ्रूट रायता और तंदूरी रोटी के साथ जीरा राइस और दाल तड़का तैयार है,’’ मांजी ने डाइनिंग टेबल की ओर इशारा किया.

‘‘अरे, इतना सब?’’ वसुधा हैरान थी.

‘‘जोमैटो, स्विगी जिंदाबाद,’’ ससुरजी अपना मोबाइल दिखा कर मुसकराए.

‘‘हफ्तेभर सब का ध्यान रखने वाली को भी तो एक दिन आराम मिलना चाहिए और फिर किसी दिन एक अच्छे सरप्राइज डिनर पर उस का भी तो अधिकार है जो उसे मिलना ही चाहिए,’’ मांजी बोलीं.

‘‘ओह. धन्यवाद मांजी, पिताजी,’’ वसुधा का मन भीग गया. बरसों बाद आखिर उसे उस का रविवार मिल ही गया था.

‘‘अब से हम हर रविवार को मम्मी को भी उस का रविवार दिया करेंगे और अपना काम खुद किया करेंगे,’’ ऋचा व रोहन ने घोषणा की.

‘‘अच्छा बदमाशो, सच में मम्मी को रविवार देना चाहते हो या होटल का खाना खाने के लिए कह रहे हो?’’ अभय ने यह कहा, तो सब हंस पड़े.

 

 

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