Digital Impact on Children :

डिजिटल युग में बचपन : आजादी, दबाव और दिशाहीनता

फरवरी में देश के अलगअलग शहरों में बच्चों से जुड़ी तीन ऐसी सनसनीखेज घटनाएं हुईं जिन्होंने न सिर्फ पेरैंटिंग पर सवालिया निशान जड़ दिया, बल्कि बढ़ती तकनीक, पैसा और बच्चों को मिलने वाली आजादी को कठघरे में खड़ा भी कर दिया है.

तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के साहिबाबाद में टीला मोड़ क्षेत्र की भारत सिटी सोसायटी में तीन नाबालिग बच्चियों- निशिका 16 साल, प्राची 14 साल, पाखी 12 साल ने रात के ढाई बजे बिल्डिंग की 9वीं मंजिल की बालकनी से एकसाथ छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली. तीनों बहनें एक कोरियन गेमिंग ऐप की आदी थीं. वे औनलाइन टास्कबेस्ड कोरियन लवर गेम खेलती थीं. पुलिस जांच में पता चला कि तीनों बहनों को कोरियाई गेम खेलने की लत थी और उन के परिजन तीनों को गेम खेलने से मना करते थे. इस से तीनों बहनें परिजनों से नाराज थीं. वे भावनात्मक तनाव में थीं और इसी के चलते उन्होंने ऐसा खौफनाक कदम उठाया.

ये तीनों बहनें कोरियन स्टार्स के प्रति भावनात्मक रूप से इतना समर्पित थीं कि उन के खिलाफ कुछ भलाबुरा सुनना उन्हें रास नहीं आता था. अपने पसंदीदा स्टार्स के रहनसहन से ले कर लाइफस्टाइल, पहनावा और हेयरस्टाइल भी तीनों ने कौपी किया था. यही नहीं, उन्होंने अपने नाम मारिया, एलिजा व सिंडी रख लिए थे. तीनों अपनी 3 साल की छोटी बहन देव्यांशी उर्फ देवु को भी कोरियन लवर बनाना चाहती थीं. इस बात को ले कर उन्हें मार भी पड़ी और 15 दिन पहले पिता ने उन का मोबाइल फोन छीन कर बेच दिया. इस से तीनों गुस्से और तनाव से भर गईं. आत्महत्या से पहले लिखा गया उन का 8 पेज का सुसाइड नोट कोरियन स्टार्स के प्रति इन नाबालिग लड़कियों की दीवानगी की इंतहा और पारिवारिक परिस्थितियों को बयां करता है. बेटियों ने लिखा, “सौरी पापा, हम गेम नहीं छोड़ सके. कोरियन गेम हमारी जिंदगी, हमारी जान है.”

बच्चियों के पिता चेतन का कहना है- वे 3 साल से गेम खेल रही थीं. आर्थिक तंगी के कारण 2 साल से इन का स्कूल छूटा हुआ था. वे ज्यादातर घर में अपने कमरे में रहती थीं और टीवी या मोबाइल देखती थीं. हमें अंदाजा नहीं था कि वे इस गेम में इतनी ज्यादा डूब चुकी हैं. वे मुझ से कहती थीं कि वे कोरिया जाना चाहती हैं.

चेतन कहते हैं, “मेरी बच्चियों के साथ बहुत बुरा हुआ. कोई भी मांबाप अपने बच्चों को मोबाइल गेम न खेलने दे. गेम में कौन सा टास्क दिया जा रहा है, इस का पता मांबाप को नहीं चलता. अगर मुझे पता होता कि किस तरह के टास्क दिए जा रहे हैं तो हम उन्हें गेम खेलने ही न देते.

चेतन कर्ज में डूबे हुए थे, इसलिए उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई पर ज्यादा जोर नहीं दिया और बारबार फेल होने पर उन का स्कूल छुड़वा दिया. वे प्लान कर रहे थे कि जब आर्थिक स्थिति सुधरेगी, तब दोबारा एडमिशन करवा देंगे.

कोविड के दौरान तीनों लड़कियां कईकई घंटे कोरियन म्यूजिक सुनती थीं. साथ ही, फिल्में, वैब सीरीज और वीडियो देखती रहती थीं. उन के नाजुक दिमाग पर कोरियन कल्चर का इतना असर हुआ कि वो खुद को भारतीय की जगह कोरियन मानने लगी थीं.

Digital Impact on Children (2)
गाजियाबाद की 3 बहनों की एकसाथ आत्महत्या यह सोचने पर मजबूर करती है कि बच्चों को तकनीक की दुनिया में पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ देना सही नहीं है.

यह घटना कई स्तरों पर गहरी चेतावनी देती है. इसे सिर्फ ‘मोबाइल गेम’ या ‘कोरियन कल्चर’ के असर तक सीमित कर के समझना अधूरा होगा. यह एक जटिल पारिवारिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक त्रासदी का उदाहरण है. यह डिजिटल लत का खतरनाक रूप है जिस में बच्चे लगातार कईकई घंटे गेम/कंटैंट में डूबे रहते हैं, जिस के चलते नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, भावनात्मक अस्थिरता पैदा होती है. यही नहीं, वे आभासी दुनिया को वास्तविक जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण मानने लगते हैं. यह बताता है कि डिजिटल प्लेटफौर्म्स बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं, खासकर, जब उन का उपयोग अनियंत्रित और निगरानीरहित हो.

परिवार का अलगाव वाला माहौल

परिवार के सदस्यों के बीच संवाद की कमी, खासकर बच्चों से उन की इच्छा, जिज्ञासा, विचार आदि पर कोईबात न होना, भावनात्मक अलगाव की स्थिति पैदा करती है और उन के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करती है. इस से बच्चों में परिवार से नाराजगी, हताशा, ‘हमें कोई नहीं समझता’ जैसी भावना पैदा होती है. उन के लिए अपनी पहचान का संकट सामने आता है.

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो आज के डिजिटल युग में नाबालिगों में अवसाद, एंग्जायटी और आवेग बहुत तेजी से विकसित हो रहा है और इस की वजह है- हर वक्त सोशल मीडिया से जुड़े रहना, किताबों, अखबारों, पत्रिकाओं को न पढ़ना व समाज और देश में क्या हो रहा है, इस से अनभिज्ञ रहना, न सिर्फ बच्चे बल्कि मातापिता भी.

जिन घरों में अलमारियां किताबों से भरी हैं, परिवार के सदस्यों को पढ़नेलिखने का शौक है, वहां बच्चों में भी पढ़ने, सीखने, समझने और विचारों को व्यक्त करने क्षमता विकसित होती है. ऐसे घरों में तनाव, अवसाद, लड़ाईझगड़े, पलायनवादी विचार, जिद्द, क्षोभ जैसी नकारत्मक चीजें नहीं होतीं.

किशोरावस्था में रोलमौडल्स का प्रभाव सामान्य है, पर ये रोल मौडल्स वास्तविक होने चाहिए, न कि, इंटरनैट की दुनिया के आभासी. जब वास्तविक जीवन निराशाजनक लगे तो आभासी पहचान ज्यादा आकर्षक लगने लगती है. आज के समय में डिजिटल साक्षरता की जरूरत अवश्य है मगर मांबाप द्वारा इस पर नियंत्रण भी जरूरी है.

बच्चों से सिर्फ ‘मत खेलो’ कहना पर्याप्त नहीं है. उन्हें समझना, उन के साथ बैठना, सीमाएं तय करना भी जरूरी है. बच्चों के व्यवहार में बदलाव को गंभीर संकेत मानना चाहिए. डांट/मार के बजाय खुली बातचीत अधिक प्रभावी होती है. स्कूल और सामाजिक जुड़ाव बच्चों के लिए आवश्यक हैं. शिक्षा सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि यह पहचान, आत्मविश्वास और सामाजिक संतुलन भी देती है.

क्लास में गोलीकांड

9 फरवरी को पंजाब के तरनतारन जिले के उस्मा गांव में एक ला कालेज में दिल दहला देने वाली घटना हुई. एक ला स्टूडैंट ने अपने कालेज की छात्रा संदीप कौर के सिर में गोली मार कर उस की हत्या कर दी और उस के बाद उस ने वहीं अपने भी सिर से पिस्तौल सटाई व अपनी भी इहलीला समाप्त कर ली. पूरे कालेज सहित शहरभर में दहशत फैल गई. ऐसी घटनाएं अभी तक अमेरिका, कनाडा जैसे देशों से आती थीं कि स्टूडैंट्स स्कूलकालेज में असलहा ले कर आ गए और अंधाधुंध फायरिंग कर दी. मगर पंजाब में उसी तरह की घटना ने भारतीय बच्चों में बढ़ रहे गुस्से, तनाव, अपने ऊपर खो रहे नियंत्रण, भावुकता और अवसाद का मिलाजुला रूप सामने ला दिया है.

पढ़नेलिखने में अपना समय देने के बजाय बच्चे अपराध के रास्ते पर बढ़ रहे हैं. इस के पीछे वजहें हैं- परिवार द्वारा बच्चों की अनदेखी, उन के साथ संवाद की कमी, उन को भरपूर पौकेट मनी और उस पौकेट मनी का गलत चीजों को खरीदने में इस्तेमाल होना आदि.

इस घटना के पीछे एकतरफा प्यार की दास्तान थी जहां गोली मारने वाले छात्र को छात्रा से प्यार था. मगर छात्रा ने उस से कहा कि उस की शादी तय हो गई है इसलिए अब वह उस से नहीं मिलेगी. इस बात ने छात्र को इतना उद्वेलित कर दिया कि वह असलहा ले कर क्लास में पहुंच गया और सभी स्टूडैंट्स के सामने उस ने संदीप कौर के सिर में गोली मार दी और अगले ही क्षण खुद को भी गोली से उड़ा लिया.

अब पुलिस जांच कर रही है कि छात्र वह पिस्टल कहां से लाया था? पुलिस यह भी चैक कर रही है कि कहीं उस के पिता के पास लाइसैंसी पिस्टल तो नहीं है? अगर ऐसा न हुआ तो फिर यह पिस्टल अवैध है जो और भी बड़े क्राइम की ओर इशारा करती है.

रईसजादे का सड़क पर आतंक

8 फरवरी को कानपुर में नशे में धुत एक रईसजादे शिवम मिश्रा ने अपनी 12 करोड़ रुपए की लेम्बोर्गिनी कार से 6 लोगों को रौंद डाला और थाने में बाकी घायलों से उस के बौडीगार्ड्स ने मारपीट की. पहले उस ने अपनी लग्जरी कार से एक बुलेट को जोरदार टक्कर मारी, जिस पर तीन लोग सवार थे. टक्कर मारने के बाद गाड़ी रोकने के बजाय शिवम मिश्रा ने मौके से भागने की कोशिश की, जिस से अन्य लोग भी उस की चपेट में आ गए. इस के बाद कार अनियंत्रित हो कर सीधे डिवाइडर में जा घुसी.

शिवम मिश्रा कानपुर के एक बड़े तंबाकू कारोबारी के के मिश्रा का बेटा है. पैसे का गरूर उस के सिर चढ़ कर बोलता है. इसी गरूर के चलते यह घटना हुई. इस घटना के बाद बजाय इस के कि वह अपना अपराध कुबूल करता, उस के रईस पिता ने अपने ड्राइवर को इस घटना का जिम्मेदार बता कर बेटे का बचाव करना चाहा. शिवम के पिता और वकील ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि गाड़ी ड्राइवर चला रहा था. मोहन नाम के व्यक्ति ने कोर्ट में एफिडेविट भी दिया कि वह गाड़ी चला रहा था. हालांकि पुलिस जांच, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट ने उस की बात नहीं मानी और 12 फरवरी को शिवम को पुलिस ने गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया.

फरवरी की ये तीनों घटनाएं- गाजियाबाद में तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या, पंजाब में कालेज परिसर में गोलीकांड, और उत्तर प्रदेश के कानपुर में रईसजादे की लापरवाह ड्राइविंग सिर्फ सनसनीखेज खबरें नहीं हैं; ये हमारे समय की बेचैन सामाजिक सच्चाइयों का आईना हैं. इन का दर्द अलगअलग है लेकिन इन के धागे कहीं न कहीं एकदूसरे से जुड़ते हैं. बदलती जीवनशैली, तकनीक का अनियंत्रित प्रभाव, पारिवारिक संवाद का क्षरण और जिम्मेदारी के स्थान पर सुविधा व दिखावे की संस्कृति ने बच्चों को जकड़ लिया है.

ये तीनों घटनाएं बदलते सामाजिकडिजिटल परिवेश का गंभीर संकेत हैं. किताबों और ज्ञानवर्धक पत्रिकाओं से दूर होते बच्चे, बढ़ती डिजिटल लत, असफलता का डर, रिश्तों का तनाव, ये सब मिल कर बच्चों में अवसाद, आवेग और निराशा को तेज कर रहे हैं. गाजियाबाद की सामूहिक आत्महत्या और तरनतारन की हत्याआत्महत्या दोनों में क्षणिक भावनात्मक उथलपुथल बच्चों की जिंदगी के लिए घातक साबित हुई. तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या बताती है कि किस तरह आज के बच्चे पहचान के संकट से गुजरते हुए आभासी दुनिया- मोबाइल गेम, सोशल मीडिया में डूब रहे हैं जो उन्हें वास्तविक जीवन से अधिक आकर्षक लगने लगती है.

Digital Impact on Children (1)
आज कई ऐसे गेम्स और ऐप्स मौजूद हैं जो बच्चों के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं. कुछ गेम्स में हिंसा, प्रतिस्पर्धा और दबाव इतना अधिक होता है कि बच्चे मानसिक रूप से प्रभावित होने लगते हैं.

बच्चे औनलाइन अनेक लोगों से ‘कनैक्टेड’ हैं, पर परिवार से भावनात्मक रूप से दूर हो चुके हैं. मातापिता अकसर नहीं जानते कि बच्चे मोबाइल फोन पर क्या देख रहे हैं और क्या खेल रहे हैं.

डिजिटल दुनिया की गिरफ्त

गाजियाबाद की त्रासदी हमें डिजिटल लत के उस अंधेरे कोने में झांकने को मजबूर करती है जहां आभासी पहचान वास्तविक जीवन पर भारी पड़ने लगती है. किशोर मन स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु और प्रभावग्राही होता है. जब परिवार, स्कूल और समाज मिल कर संतुलित मार्गदर्शन नहीं दे पाते, तब इंटरनैट, गेम्स और एल्गोरिदम ‘रोल मौडल’ बन बैठते हैं. समस्या तकनीक नहीं, उस का अनियंत्रित और निगरानीरहित उपयोग है. ‘मत खेलो’ का आदेश, बिना समझ और संवाद के, अकसर प्रतिरोध को जन्म देता है. डिजिटल साक्षरता, समयसीमा और भावनात्मक सहारा ये तीनों साथसाथ चलें, तभी समाधान संभव है.

गुस्सा, असुरक्षा और हथियार

पंजाब के कालेज की घटना बढ़ते आवेग, अस्वीकृति को सहने की घटती क्षमता और हथियारों तक बच्चों की पहुंच पर गंभीर प्रश्न उठाती है. एकतरफा भावनाएं, सामाजिक दबाव और मानसिक असंतुलन जब साथ आते हैं, तो परिणाम भयावह होते हैं. शिक्षा संस्थान केवल डिग्री देने के केंद्र नहीं, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता, संघर्षप्रबंधन और परामर्श के सुरक्षित स्थल भी होने चाहिए. साथ ही, हथियारों की वैधअवैध उपलब्धता पर सख्त निगरानी राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है.

पैसा, शक्ति और जवाबदेही

कानपुर की घटना उस मानसिकता को उजागर करती है जहां संपन्नता, प्रभाव और ‘बच निकलने’ की उम्मीद कानून व नैतिकता पर भारी पड़ती दिखती है. यह केवल एक व्यक्ति की चूक नहीं, बल्कि सामाजिक व पारिवारिक संदेश का संकट है. हम बच्चों को सुविधा तो दे रहे हैं पर जिम्मेदारी और संवेदनशीलता सिखाने में चूक रहे हैं. जिम्मेदारी और संवेदनशीलता आपसी संवाद से और अच्छी किताबें व पत्रिकाएं पढ़ने से विकसित होती है. इस के साथ, कानून का निष्पक्ष और दृढ़ता से सब पर बराबर लागू होना, ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा सकता है.

तीनों घटनाओं का साझा सबक है- परिवार में संवाद की अपरिहार्यता. डर, डांट और दंड से अधिक असरदार है खुली बातचीत, भरोसा और सहभागिता. बच्चों के व्यवहार में बदलाव, जैसे अत्यधिक एकांत में रहने लगना, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, पढ़ाई से दूरी आदि सब संकेत हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. ‘समय नहीं है’ का तर्क आज सब से महंगा साबित हो रहा है.

स्कूल और कालेज केवल अकादमिक मंच नहीं, सामाजिक संतुलन और आत्मपहचान के आधार भी हैं. लाइब्रेरी में समय बिताना बच्चों के दिमागी संतुलन और सही विकास के लिए बहुत जरूरी है. जब आर्थिक या अन्य कारणों से बच्चे शिक्षा और साथियों से कटते हैं, तो वे वैकल्पिक और कभीकभी जोखिमभरी दुनियाओं में आश्रय खोजने लगते हैं. यह परिवार और समाज दोनों के लिए चेतावनी है.

इन घटनाओं को अलगअलग ‘केस’ मान कर भूल जाना हमारे लिए आसान है लेकिन यह खतरा दिनप्रतिदिन बढ़ रहा है. फरवरी की ये खबरें हमें झकझोरती हैं कि आधुनिकता की दौड़ में कहीं हम मूल्यों, संवाद और संतुलन को पीछे तो नहीं छोड़ रहे हैं. सवाल तकनीक, प्रेम या पैसे का नहीं है, सवाल यह है कि उन के साथ हमारी समझ, मर्यादा और जवाबदेही कितनी है. अगर यह आत्ममंथन अब भी न हुआ तो अगली सनसनी शायद और अधिक भयावह होगी.

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