Editorial : किन्हीं 2 देशों में व्यापार हो और जितना संभव हो खुला व्यापार हो तो उतना ही दोनों देशों के लिए अच्छा होता है. लेकिन जब एक देश दूसरे की बांह मरोड़ कर व्यापार करने पर उतारू हो तो यह वह जबरदस्ती होगी जो तोपों से लदे व्यापारिक जहाजों ने 17वीं से 19वीं सदी तक भारत, चीन, जापान के साथ की थी.
इंगलैंड, अमेरिका, फ्रांस, हौलैंड, पुर्तगाल, स्पेन के व्यापारियों के जहाजों ने चीन और जापान से 17वीं सदी के बीच के दशकों में जबरन सख्त शर्तों के साथ व्यापार करने की इजाजत ली थी और फिर इस का फायदा जम कर उठाया. यूरोप के देश एशियाई देशों से जबरन सस्ता माल खरीदते और उन्हें गैरजरूरी सामान जबरन बेचते थे.
भारत और चीन को जबरन अफीम बेची गई, चाय का आदी बनाया गया और कौड़ियों के भाव यहां से मसाले, रेशम, रुई, चमड़ा, गेहूं ले जाया गया. भारत को तो अपनी आजादी खोनी पड़ी, चीन को सम्मान.
आज अमेरिका यही भारत से कर रहा है और आज भी हम वैसे ही व्यवहार कर रहे हैं जैसे 1707 के बाद मुगल साम्राज्य के बाद कर रहे थे. आज अमेरिका हम पर अपनी शर्तें थोप रहा है और उन शर्तों पर हमारे नेता जश्न मना रहे हैं. वे अपनी असहायता व दयनीयता को उपलब्धि बता कर अखबारों में वाहवाही के बड़ेबड़े विज्ञापन प्रकाशित करा रहे हैं. जो जीहुजूरी इस देश ने हर आक्रांत के समय, उस समय के थोड़ेबहुत पढ़ेलिखे लोगों की भी, देखी थी, आज फिर देख रहा है.
अमेरिका से भारत का व्यापार समझता एकतरफा है, यह बिलकुल स्पष्ट है. लेकिन व्यापार मंत्री पीयूष गोयल, विदेश मंत्री जे जयशंकर, पैट्रोल मंत्री हरदीप सिंह पुरी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे व्यवहार कर रहे हैं कि जैसे कि वे अमेरिका की सोने की खानों पर कब्जा कर के लौटे हैं. अमेरिका ने धमकियों के बाद भारत से यह डील मनवाई है, यह स्पष्ट है.
अमेरिका के हाथ में आज भारत के खिलाफ बहुत से हथियार हैं. इन में सब से बड़ा छिपा हथियार भारतीय ही हैं जो अमेरिका में बसे हैं और जिन में से बहुत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के चाटुकार सदस्य हैं. कुछ तो चाटुकारिता में इतने पटु हैं कि वे अपने रंग को भूल कर वहां दक्षिणी अमेरिका या अफ्रीका से आए लोगों को गोरों की तरह नीची जाति का समझने लगे हैं.
अमेरिका भारत के निर्यात का बड़ा बाजार है और जब से अमेरिका ने आयात पर टैरिफ 3 फीसदी से 50 फीसदी किया, भारत के सैकड़ों उद्योग बंद हो गए और लाखों कामगार बेकार हो गए. भारतीय निर्यातकों ने जबरन दाम घटाए और नुकसान में सामान बेचा यह सोच कर कि कुछ समय बाद भारत सरकार तो हथियार डाल ही देगी.
भारत अमेरिका को वह लाल आंख नहीं दिखा सका जो उस ने चीन को दिखाई थी लेकिन चीन ने अमेरिका की एक भी बात नहीं मानी.
आज ऐसा नहीं है कि भारत अमेरिका से व्यापार करने के बिना जिंदा नहीं रह सकता लेकिन भारत के ‘भेदिए’ ही उसे अमेरिकी शरण में धकेल रहे हैं.
भारत-अमेरिका डील मीर जाफर और जयचंदों की याद दिलाती है. कहा गया है कि जो इतिहास नहीं पढ़ते उन्हें इतिहास सबक सिखाता है. हम तो हर 5-10 साल में इतिहास ही बदल देते हैं ताकि हमारे अपने लोगों को पता न चले कि भारत-अमेरिकी डील एक ऐतिहासिक भूल है. Editorial





