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पत्र लिखने पर विवश
मैं लगभग 4 दशकों से ‘सरिता’ की नियमित पाठिका हूं. इस पत्रिका की कहानियां हमेशा मार्गदर्शक का काम करती हैं. जनवरी (प्रथम) 2026 अंक में छपी कहानी ‘एक ग्रे स्वेटर’ ने मुझे पत्र लिखने पर विवश कर दिया. कहानी की लेखिका ने जैसे आज के परिवेश का गहराई से अध्ययन किया हो, उन्होंने आज की ज्वलंत समस्या डिप्रैशन पर फोकस करते हुए समस्या का समाधान जिस जज्बाती तरीके से किया है, निश्चय ही वह बहुत सटीक है. इस के लिए वे बधाई की पात्र हैं. धन्यवाद सरिता संपादन मंडल, लेख और कहानियों के माध्यम से आप इसी प्रकार लोगों को जागरूक करते रहिए. – डा. प्रगति श्रीवास्तव
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बच्चों के मुख से
मेरी 5 वर्षीय बेटी बहुत बोलती है. एक दिन सुबह जब वह सो कर उठी तो उस की आंखें चिपक सी गई थीं कीचड़ के कारण. मैं ने जब उस का मुंह धोया तो देखा कि आंखें लाल हो गई हैं. मेरे मुंह से निकला कि लगता है आंख आ गई है.
कुछ घंटे वह शांत रही. जब दोपहर को लंच के बाद हम आराम कर रहे थे तो बड़े भोलेपन से उस ने पूछा, ‘‘मम्मी, आप कह रही थीं कि मेरी आंख आ गई है, जरा शीशा दिखाओ तो कि आंख कहां आ रही है. अब तो मेरी 3 आंखें हो जाएंगी.’’ यह सुन कर हम बिना हंसे नहीं रह सके. – शैल कुमारी
पत्रिका, पाखंड और सनातन
मैं ने आप की ‘सरिता’ का अंक जनवरी (प्रथम) 2026 पढ़ा. पत्रिका का यह अंक मैं ने 40 वर्ष बाद पढ़ा है. इस से पूर्व वर्ष 1980 से 1985 तक के वर्षों में सरिता के अंकों का बेसब्री से इंतजार रहता था परंतु फिर राज्य सेवाओं में चले जाने से ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थापन के कारण यह पत्रिका सुलभ नहीं होती थी, फिर आदत छूट गई. वर्षों बाद इस पत्रिका को पढ़ कर और यह जान कर कि यह पत्रिका पूरी तरह से सनातन विरुद्ध हो चुकी है, बहुत अफसोस हुआ.
मद्रास हाईकोर्ट के जज का निर्णय हो या संपादकीय के तहत ‘सरित प्रवाह’ हो, सब में सनातन को नीचा दिखाने का प्रयास किया गया है. कुल मिला कर वर्षों बाद जिस उत्साह से मैं ने सरिता पढ़ना शुरू किया, एकदो चैप्टर पढ़ कर ही उत्साह ठंडा पड़ गया. रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों, जिन्होंने भारत के इतिहास में कुरूपता ला कर गलत इतिहास लिखा उन्हें सरिता में संदर्भित किया जा रहा है. यह कहते हुए कि आप की पत्रिका निम्न स्तर पर उतर चुकी है, मुझे कोई अफसोस नहीं है. – दयानंद शर्मा
‘सरिता’ ने हमेशा ही पाखंडों का विरोध किया है. यह बिलकुल सत्य है कि आजकल सनातन का नाम ले कर हमारे देश में धर्म, जाति और भेदभाव की जम कर दुकानदारी की जा रही है. ऐसे में ‘सरिता’ सामाजिक चेतना का अपना कर्तव्य ही निभा रही है. अगर इस कारण आप नाराज हैं तो हम आप की नाराजगी को अपनी सफलता मानेंगे. – संपादक
आप भी भेजें
सरिता में प्रकाशित रचनाओं तथा अन्य सामयिक विषयों पर अपने विचार भेजिए. कृपया पत्रों पर अपना पता अवश्य लिखें. पत्र इस पते पर भेजिए : आप के पत्र, सरिता, ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55.
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