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बच्चों को डांटें नहीं, प्यार से समझाएं
जनवरी (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘मातापिता की अनदेखी और नशे में डूबते बच्चे’ बेहद सटीक व सारगर्भित लगा. वर्तमान समय में नशे का कारोबार दिन दूनी रात चौगुनी गति से समाज में फैल रहा है. नशे की गिरफ्त में ज्यादातर युवावर्ग आ रहा है, जो उन्हें अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है. इस का मुख्य कारण अभिभावकों का बच्चों के प्रति जागरूक न होना है. मातापिता को बच्चे की हर संदिग्ध गतिविधि पर सूक्ष्म रूप से नजर रखनी चाहिए. यदि संभव हो तो जरूरत की चीजें खुद खरीद कर दें. हाथ में नकद धनराशि देने से बचें. बच्चों को डांट कर नहीं, बल्कि प्यारदुलार से नशे के दुष्प्रभाव के बारे में बताएं.
हमेशा की तरह सभी स्थायी स्तंभ, जैसे आप के पत्र, सरित प्रवाह, श्रीमतीजी, पाठकों की समस्याएं, इन्हें आजमाइए और चंचल छाया दिल को छू गए.
उच्च गुणवत्ता से परिपूर्ण अंक प्रकाशित करने के लिए संपादकीय टीम का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद व आभार. – विमल वर्मा
सराहनीय अंक
जनवरी (प्रथम) अंक में प्रकाशित सभी कहानियां एक से बढ़ कर एक थीं जबकि एकदो लेख को छोड़ कर अन्य लेख साधारण लगे. स्थायी स्तंभ इन्हें आजमाइए, आप के पत्र, श्रीमतीजी, पाठकों की समस्याएं, चंचल छाया आदि ने भी मेरा भरपूर मनोरंजन किया. सच में सरिता पत्रिका में जो कुछ भी छपता है वह सराहनीय होता है. – हर ज्ञान सिंह सुथार हमसफर
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अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर लेख जरूरी
सरिता से मुझे एक शिकायत है. पहले हर अंक के संपादकीय में लगभग सभी महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर बहुत सटीक टिप्पणियां व सुझाव भी हुआ करते थे तथा अंदर के पृष्ठों में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर लेख होते थे पर अब ये सब उतना नहीं होता. अंदर के पृष्ठों में एकाध लेखक ही कभीकभी इन घटनाओं पर छपते हैं पर उन के लेखन में परिपक्वता का अभाव लगता है.
आज के समय में तो लगभग हर हफ्ते कोई न कोई ऐसी ज्वलंत अंतराष्ट्रीय घटना जैसे ट्रंप का वेनेजुएला युद्ध, जलता हुआ ईरान, ग्रीनलैंड संकट और भारत पर टैरिफ आदि ऐसे प्रकरण आजा रहे हैं जिन का पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ना तय लगता है पर इन्हें पाक्षिक रुप से छपने वाली आप की पत्रिका पूरी रेस के साथ कवर नहीं कर पा रही है. चूंकि लगभग 53 वर्षों से आप की पत्रिका का पुराना पाठक होने के नाते मैं आप से अपेक्षा कर सकता हूं कि मेरे जैसे पाठकों की इस अभिरुचि की तरफ आप ध्यान देंगे. – सुनील कुमार चौबे
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बच्चों के मुख से
मेरा 6 वर्षीय बेटा साहिल बहुत हाजिरजवाब है. एक दिन हम सब अपने भाई के लिए लड़की देखने जा रहे थे. सभी बड़े लोगों ने तय किया कि हम लड़की देख कर टहलने का बहाना बना कर घर से बाहर निकलेंगे और तय करेंगे कि रिश्ता पसंद है या नापसंद.
यह बात मेरा बेटा भी सुन रहा था. जब हम सभी लड़की देख चुके थे तब मेरे फूफाजी बोले, ‘‘हम लोग थोड़ा बाहर टहल कर आते हैं.’’ इस पर मेरा बेटा बोल पड़ा, ‘‘ये सब बाहर टहलने नहीं, हां या न तय करने जा रहे हैं.’’
इस पर हम सभी हंसे बिना न रह सके. – अंजू सहगल
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एक दिन मैं ने अपने 3 वर्षीय नाती से पूछा कि वह क्या खाएगा? उस ने कहा कि पनीर का परांठा खाना है. पनीर घर में नहीं था तो मैं ने आलू और बींस की सब्जी मैश कर के परांठा बना दिया.
उस ने वह खाया तो उसे अच्छा लगा. घर जा कर अपनी मां से बोला, ‘‘नानी ने आज ग्रीन पनीर का क्या मस्त परांठा बनाया था. आप भी वैसा ही बना कर दो.’’
बेटी ने फोन पर परांठे का राज पूछा और पता लगने पर कि ग्रीन पनीर क्या था, सब खूब हंसे. – शकुंतला गुप्ता
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मेरी बच्ची तब छोटी थी. वह एक बार कहने लगी, ‘‘पापा, मुझे चौकलेट ले दो, मैं खाऊंगी.’’
मैं ने उसे समझाया कि बेटा, चौकलेट खाने से दांत खराब हो जाते हैं, नहीं खानी चाहिए. वह बोली, ‘‘पापा, मेरे सारे साथी तो चौकलेट खूब खाते हैं.’’ मैं ने कहा कि पागल हैं अगर ऐसा करते हैं.
इस पर वह बोली, ‘‘पापा, मुझे भी चौेकलेट ले दो, कोई बात नहीं, थोड़ी देर के लिए मैं भी पागल बन जाती हूं.’’
उस की यह बात सुन कर हम लोग खूब हंसे और मुझे उसे चौकलेट ले कर देनी ही पड़ी. – दीपक भनोट
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मेरी सहेली के 4 और 7 वर्षीय 2 बेटे हैं. बड़ा वाला बहुत ही सीधा व शांत है जबकि छोटा काफी चंचल है. बड़े वाले की आदत है, हर चीज के लिए पहले न कर देगा लेकिन जब छोटा ले लेगा तब वह भी उसी के लिए रोने लगेगा.
एक दिन किसी चीज के लिए बड़ा रोने लगा, तब मेरी सहेली गुस्से से उसे डांटते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी यह आदत बहुत ही गंदी है. पहले न कर देते हो, फिर जब छोटा ले लेता है तो रोते हो.’’
इतने में छोटा बोल पड़ा, ‘‘हां मम्मी, ऐसे ही ये अभी कहते हैं कि मैं शादी नहीं करूंगा, और जब मैं कर लूंगा तब ये कहेंगे कि मैं तो यही दुलहन लूंगा.’’
उस की भोलेपन से कही इस बात पर मेरी सहेली गुस्सा भूल कर हंस पड़ी. – प्रेमदुलारी
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