Reality of Life : मुसकराने के लिए पैसे नहीं लगते, फिर भी लोग मुसकराते नहीं हैं, जबकि विदेशों में लोग भले ही एकदूसरे को नहीं जानते हैं, फिर भी वे मुसकरा कर एकदूसरे का अभिवादन करते हैं. हमारे यहां ऐसा कल्चर नहीं है, इसलिए मुसकराइए और दूसरों के होंठों पर भी मुसकराहट लाइए.

मैं रूस में 10 दिन बिताने के बाद वापस आया. लौटने के बाद दिल्ली से हैदराबाद की फ्लाइट में 3 घंटे का समय था. मैं ने अपनी आदत के अनुसार एयरपोर्ट पर टहलना शुरू कर दिया. जब हम एयरपोर्ट जैसी जगहों पर होते हैं तो हमारा ध्यान खुद ही अन्यत्र यात्रियों पर चला जाता है. मैं ने देखा, अधिकांश यात्री अपने मोबाइल या लैपटौप पर व्यस्त थे. मुझे देख कर उन्होंने सिर्फ क्षणभर अपनी नजर ऊपर करते हुए निहारा और फिर अपनेआप में व्यस्त हो गए.

आप शायद यह सोच रहे होंगे कि इस में गलत या असामान्य क्या है? जी हां, आप बिलकुल सही हैं. परंतु, मैं तो अभीअभी ही रूस से लौटा था, दोनों स्थानों के जनमानस व्यवहारों का तुलनात्मक विश्लेषण करना स्वाभाविक था.

रूस में मैं जिस भी व्यक्ति से मिला, उन सब का पहला अभिवादन उन की खुशनुमा मुसकराहट थी. मैं एक स्मृतिचिह्न खरीदने के लिए एक बड़ी दुकान में गया और लगभग एक घंटे तक सभी सामान देखने के बाद मुझे सभी सामान बहुत महंगे लगे, इसलिए मैं ने कुछ भी सामान नहीं खरीदा.

कुछ भी सामान न खरीद कर बाहर निकलने में स्वाभाविक रूप से मैं उस दुकानदार महिला से आंखें नहीं मिला पा रहा था लेकिन मेरे ऐसे व्यवहार के बाद भी वह महिला अपने काउंटर से निकल कर मुझे गेट तक छोड़ने आई और बहुत ही मुसकरा कर मुझ से ‘डू सुविदानिया’ कहा जिस का अर्थ था फिर मिलेंगे. कितना अच्छा लगा, कुछ न खरीद पाने के दुख का एहसास या कुछ न खरीदने की ग्लानि दोनों ही गायब हो गए.
मैं जिस भी किसी सार्वजानिक स्थान पर कुरसी या बैंच पर बैठा, हरेक बार साथ में बैठे हुए व्यक्ति ने मुसकरा कर मेरा अभिवादन किया. हमारी कोई पूर्व जानपहचान तो थी नहीं, फिर भी उन का यह व्यवहार अपनापन जताने जैसा अत्यंत सुखदायी था.

मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि यदि आप लिफ्ट का उपयोग कर रहे हैं और पहले से कोई व्यक्ति लिफ्ट में मौजूद है तो आप को देख कर जरूर मुसकराएगा, जिस का मतलब है कि वह व्यक्ति आप को लिफ्ट में अपने साथ सफर करने का स्वागत कर रहा है. ऐसे ही व्यवहार की वह आप से भी अपेक्षा करेगा.

छोटीछोटी बातें हैं लेकिन आप को बहुत सुकून देती हैं. मैं ने एहसास किया कि अरे, अब तो मैं हिंदुस्तान आ गया. सभी मेरे देश के हैं परंतु कोई मुड़ कर भी नहीं देख रहा है कि कौन साथ की सीट पर बैठ रहा है. और तो और, एयरक्राफ्ट में मेरे सहयात्री का मैं ने मुसकरा कर अभिवादन भी किया, फिर भी उन की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक न थी.

मैं मानता हूं कि ये सब विकसित और संपन्न देश हैं, जहां शायद सभी सुखसुविधाएं, संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं लेकिन इस का मतलब यह तो बिलकुल भी नहीं कि हम मुसकरा भी नहीं सकते. वास्तविकता में हमारे देश के लोग ज्यादा संतुष्ट हैं क्योंकि सादगी हमें विरासत में मिली है.

इस परिप्रेक्ष्य में मुझेअभिनेता राज कपूर पर फिल्माए गए गायक मुकेश के एक गाने की एक पंक्ति याद आ गई-

‘किसी की मुसकराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.’

आइए, आज से एक नया अभियान शुरू करें, जिस से भी मिलें चाहे वह परिचित हो या अपरिचित, मुसकराएं जरूर. जिस व्यक्ति से किसी कारणवश बातचीत बंद कर दी थी उस को भी देख कर मुसकराएं. फर्क देखिए हमारे खुद के व्यक्तित्व में और हमारे माहौल में भी.

आइए मुसकराएं, सकारात्मकता फैलाएं और अपने हिंदुस्तान को एक खुशनुमा जहां बनाएं. आगे बढि़ए और खुश रहिए. Reality of Life

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