Parenting Perspective : वयस्क बेरोजगार बच्चे मातापिता के लिए एक परेशानी बने रहते हैं. यह वित्तीय तनाव, रिश्तों में खटास और भावनात्मक बोझ का कारण बन जाता है क्योंकि मातापिता अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करते हुए खुद को फंसा हुआ महसूस करते हैं.
27 वर्षीय साहिल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और अभी वह बेरोजगार है. उस का कहना है कि वह अपने पेरैंट्स के साथ रहता है, जो उसे शर्मनाक लगता है. वैसे, उस के पेरैंट्स कुछ बोलते नहीं हैं, पर उन के हावभाव से लगता है कि जैसे वह उन पर एक बोझ है. साहिल ट्यूशन पढ़ा कर इतना तो कमा लेता है कि जिस से वह अपना मोबाइल बिल और बाइक में पैट्रोल भरा सके.
साहिल चाहता है कि वह अपने पेरैंट्स की आर्थिक रूप से मदद कर सके और भविष्य में उन का सहारा बन सके. इस के लिए वह एक अच्छी जौब की तलाश में है लेकिन केवल इंजीनियरिंग की डिग्री से उसे कोई अच्छी जौब मिल नहीं रही है.
साहिल के एक दोस्त ने उसे सुझया कि क्यों न वह एमबीए (मास्टर औफ बिजनैस एडमिनिस्ट्रेशन) का कोर्स कर ले, फिर खुद उसे बड़ीबड़ी कंपनियों से जौब के औफर आने लगेंगे लेकिन साहिल के पास इतने पैसे नहीं हैं कि जिस से वह आगे की पढ़ाई कर सके. यह भी पता है उसे कि उस के पेरैंट्स अब उस पर एक रुपया भी खर्च नहीं करेंगे.
भारत में इंजीनियरों की समस्या गंभीर है. यहां हर साल लाखों छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री लेते हैं. उन में से एक बड़ा प्रतिशत नौकरी या इंटर्नशिप से वंचित रह जाता है. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2024 बैच के 83 फीसदी से अधिक इंजीनियरिंग स्नातकों को नौकरी या इंटर्नशिप नहीं मिली.
एक और केस है जहां 33 साल का मयूर अभी तक बेरोजगार बैठा है. उस ने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की है. वह कहता है कि उस ने काफी साल सरकारी नौकरी की तैयारी में गंवा दिए लेकिन उस का कहीं पर भी सलेक्शन नहीं हुआ और उम्र निकल गई. अब उस के पास एक ही रास्ता बचा है कि वह कोई बिजनैस कर ले लेकिन बिजनैस के लिए भी उसे पैसे चाहिए और उस के पेरैंट्स उस पर पैसे निवेश करने को तैयार नहीं हैं.
उस के पिता ताना मारते हैं कि ‘तुम्हारे साथ के सारे बच्चे सफल हो गए और तुम वहीं के वहीं पड़े हो. तुम्हें पढ़ाने में मैं ने लाखों रुपए खर्च कर दिए. सोचा था, भविष्य में कुछ अच्छा करेगा लेकिन तुम तो उलटे हम पर ही बोझ बन गए हो. शर्म भी नहीं आती तुम्हें मुफ्त की रोटियां तोड़ते हुए. अरे, क्यों शर्म आएगी, शर्म बेच जो खाई है. बिना मेहनत के सारी सुखसुविधाएं मिल ही रही हैं तो जरूरत ही क्या है कहीं नौकरी करने की. अब हम से कोई उम्मीद मत रखना, समझे.’
अपने पिता की बात पर मयूर आहत हो उठता. मन करता उस का, कहीं जा कर अपनी जान दे दे, लेकिन जान देना भी तो आसान नहीं. वह सोचता है अगर उस के पास एक जौब होती तो उस के पेरैंट्स उसे आलसी और बोझ न समझते. इधर पेरैंट्स सोच रहे हैं जल्द से जल्द यह इस घर से निकल जाए तो शांति मिले.
एक 66 वर्षीय रिटायर्ड शख्स अपने 29 साल के बेरोजगार बेटे को महीने के 12 हजार रुपए दे रहे हैं, ताकि वह अपने जीवनयापन के खर्चे पूरे कर सके. इन का बेरोजगार बेटा अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी की तलाश में है. अभी तक कोई नौकरी मिली नहीं है. पहले यह प्राइवेट सैक्टर में जौब करता था लेकिन कंपनी में छंटनी के दौरान उस की जौब चली गई. जौब न रहने के कारण उस की लिवइन पार्टनर उसे छोड़ कर चली गई. बेरोजगारी से जूझ रहा यह इंसान वापस अपने पिता के घर लौट आया और आर्थिक रूप से उन पर ही निर्भर है.
66 वर्षीय इन शख्स का कहना है कि कहां वे सोच रहे थे कि नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद पत्नी के साथ आराम से अपनी जिंदगी गुजारेंगे लेकिन उन का सोचा हुआ कुछ भी न हुआ. पत्नी बीमारी से जूझ रही है जिस के इलाज में पैसा पानी की तरह बह रहा है और ऊपर से बेटे की आर्थिक जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है.
बेरोजगारी के चलते पेरैंट्स पर निर्भर
कई ऐसे मातापिता हैं जो अपने वयस्क बच्चों को किसी न किसी प्रकार की वित्तीय सहायता कर रहे हैं. कई मातापिताओं का कहना है कि उन के बच्चों की वित्तीय निर्भरता उन के स्वयं के वित्तीय दृष्टिकोण को धूमिल बना रही है. कई अभिभावकों का यह भी कहना है कि बेरोजगारी, स्वास्थ्य या नशे की समस्या के कारण उन के वयस्क बच्चे उन पर निर्भर हैं.
भारत में सरकारी आंकड़ों में रोजगारी दर में कुछ सुधार के संकेत तो मिले हैं लेकिन कितने ही बेरोजगार युवा अभी भी अपने मातापिता पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं. दुनिया काफी समय से खाली घोंसलों के सिंड्रोम को देख रही है.

आज का प्रयास कल संतान की सफलता बनेगा.
पहले बच्चे वयस्क होने के बाद अपने मातापिता का घर छोड़ देते थे. अब, वैश्विक स्तर पर इस का उलटा हो रहा है. जो बच्चे उच्च शिक्षा, नौकरी के अवसरों या अपनी शर्तों पर जीवन जीने के लिए घर छोड़ कर गए थे वे अपने मातापिता के पास वापस लौट रहे हैं क्योंकि वे मजबूर हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका की जनगणना के अनुसार करीब एकतिहाई युवा, जो 18-49 वर्ष के हैं, अपने पेरैंट्स के साथ रह रहे हैं.
जनसांख्यिकीविदों ने इस के लिए एक नया शब्द गढ़ा है, बूमरैंग बच्चे. बूमरैंग, क्योंकि वयस्कता की आजादी का पूरा आनंद लेने के लिए स्वतंत्र रूप से जीने की इच्छा अब पुनर्विचार के दौर से गुजर रही है. क्योंकि, आजादी का लाइसैंस कंधों पर आसानी से कहां मिलता है.
बेरोजगारी के चलते जिंदगी के तनाव और दबाव तो हैं ही, साथ ही, घर चलाने का टैंशन, घर का भाड़ा चुकाने आदि जैसे आर्थिक दबावों का भी टैंशन रहता है. इसलिए कई युवा अब आजादी की अपनी उड़ान को कुछ समय के लिए पेरैंट्स के पास फिर गिरवी रखना पसंद कर रहे हैं, जब तक कि वे खुद को स्थापित न कर लें या अपने मातापिता के संरक्षण से बाहर आने के लिए पर्याप्त बचत न कर लें. इस में वही समस्याएं आ रही हैं जो हमारे यहां संयुक्त परिवारों में ह?ैं. अमेरिका से यह लौटना पत्नियों के मांबाप के पास भी काफी बड़ी संख्या में हो रहा है. मांबाप का अपने बच्चों पर किया गया खर्च इस परिस्थिति में शून्य नजर आता है.
बेरोजगारी के कारण
भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या रोजगार के अवसरों को सीमित कर रही है. इस के अलावा औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्रों की धीमी गति से कम लोगों को रोजगार मिल पाता है. ज्ञान और कौशल के बीच अंतर के कारण कई शिक्षित युवा नौकरी पाने में असमर्थ हैं. इस के अलावा औटोमेशन और तकनीकी उन्नति ने कई क्षेत्रों में मानव श्रम की आवश्यकता को कम कर दिया है.
ओपन आई के सीईओ सैम औल्टमैन और वालमार्ट के सीईओ डग मैकमिलन ने हाल ही में खुल कर कहा कि एआई से काम करने के तरीके बदलेंगे और बहुत सारी नौकरियां प्रभावित होंगी. उन का यह भी कहना है कि एआई 2030 तक लगभग 30 से 40 फीसदी टास्क को औटोमेट कर सकता है. इस तरह से इन पेशों से जुड़ी नौकरियों का प्रभावित होना तय है.
वयस्क बेरोजगार बच्चों का अपने पेरैंट्स के घर रहना परिवार में तनाव का एक बड़ा कारण हो सकता है क्योंकि आप के और बच्चे के बीच सोच व व्यवहार का बड़ा अंतर होता है. सो, वयस्क बेरोजगार बच्चों का आज अपने मातापिता के साथ रहना किसी चुनौती से कम नहीं है.
अकसर यह देखा गया है कि जहां मातापिता उम्र हो जाने के बाद भी पैसे कमाने में ज्यादा मेहनत करते हैं वहां उन के बड़े बच्चे भी रिलैक्स हो जाते हैं अपनी जिंदगी में, यानी कि कम काम करते हैं. हालांकि पैसे कमाने के लिए जो मेहनत बुजुर्ग मातापिता कर रहे हैं, वह वयस्क बच्चे कर सकते हैं लेकिन करते नहीं या करना नहीं चाहते.
ऐसा तब होता है जब पेरैंट्स बच्चों के लिए बहुत ज्यादा मेहनत कर के पैसे कमाते हैं. यहां बच्चा अपने पेरैंट्स पर धीरेधीरे आश्रित होना सीख जाता है जिस से फिर बाद में उसे घर के सुरक्षित माहौल से बाहर निकलने और खुद अपना रास्ता बनाने में कठिनाई होती है. इस ढर्रे पर चलते रहने से वयस्क बच्चा हमेशा के लिए किशोर बना रहता है और पेरैंट्स उस की जिम्मेदारी का बोझ ढोते रहते हैं.
ऐसे वयस्क बेरोजगार बच्चे मातापिता के लिए एक परेशानी बने रहते हैं. यह वित्तीय तनाव, रिश्तों में खटास और भावनात्मक बोझ का कारण बन जाता है क्योंकि मातापिता अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करते हुए खुद को फंसा हुआ महसूस करते हैं.

पेरैंट्स के पैसों पर पलने की आदत
औक्सफोर्ड जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई करने के बावजूद 41 साल का फैज सिद्दीकी पिछले कई सालों से बेरोजगार चल रहा है और अब उस ने अपने मांबाप पर ही मुकदमा ठोक दिया है और डिमांड की है कि उस के मातापिता उसे ताउम्र आर्थिक रूप से मदद करते रहें, क्योंकि वह बेरोजगार है. अदालतें किस कानून में उस की मदद करेंगी, यह अभी अस्पष्ट है क्योंकि हर देश के कुछ ऐसे अनजाने से कानून होते हैं जिन का उपयोग ऐसे युवा कर लेते हैं.
फैज की मां 69 साल की हैं और उस के पिता 71 साल के हैं. वे अपने बेटे को हर हफ्ते 400 पाउंड यानी लगभग 40 हजार रुपए देते हैं. यानी, एक महीने में लगभग डेढ़ लाख रुपए की राशि वे अपने वृद्ध मातापिता से लेता है. इस के अलावा उस के बिलों का भुगतान भी उस के पेरैंट्स ही करते हैं. अब उन के बीच तनाव और झगड़े के चलते उस के पेरैंट्स उसे मदद करने से मना कर रहे हैं तो उस ने अपने मातापिता पर मुकदमा कर दिया है.
फैज का कहना है कि वह इस आर्थिक सपोर्ट का हकदार है और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो यह उस के मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा. 29 साल की सुप्रिया, बदला हुआ नाम, इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के घर में बैठी हुई है और अविवाहित है. उस ने एकदो जगह प्राइवेट जौब किए पर उसे मजा नहीं आया. सुप्रिया के पिता सरकारी नौकरी में हैं और 2 साल बाद रिटायर्ड हो जाएंगे. वे इस बात से चिंतित हैं कि बेटी बहुत ज्यादा खर्चीली है. आएदिन शौपिंग करती रहती है, बाहर से सामान और्डर करती रहती है.

इसलिए कई बार वे कोशिश करने के बावजूद आगे नहीं बढ़ पाते.
बेटी का क्रैडिट कार्ड का काफी कर्ज है, जिसे उन्हें ही चुकाना है. वे चाहते हैं कि रिटायरमैंट के पहले किसी तरह बेटी की शादी हो जाए. लेकिन सुप्रिया शादी के नाम से ही भड़क जाती है, कहती है कि इतनी अच्छी आराम की जिंदगी चल रही है तो क्या जरूरत है उसे शादी के झंझटों में फंसने की.
सुप्रिया के मातापिता की चिंता सिर्फ बेटी की शादी या उस के बेहिसाब खर्चे को ले कर ही नहीं है बल्कि उस का दोस्तों के साथ देररात तक बाहर रहने, सिगरेट पीने, देर से सोने और उठने से भी है. कुछ बोलने या समझने पर वह उलटे अपने मातापिता पर ही चढ़ बैठती है और उन से लड़नेझगड़ने लगती है. घर में क्लेश न हो, इसलिए वे चुप रह जाते हैं. ऐसा कब तक चलेगा, यह सोच कर वे तनाव में जी रहे हैं.
निठल्लापन बनती समस्या
31 साल के प्रीतेश को उस के मातापिता ने लाखों रुपए खर्च कर बाहर पढ़ने के लिए भेजा था लेकिन वह अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ कर वापस आ गया. वहां उसे घर जैसा खाना और आराम नहीं मिल रहा था. बाद में किसी तरह से उसे ग्रेजुएशन करवाया गया ताकि भविष्य में उसे ढंग की कोई नौकरी मिल सके लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि उसे तो आराम और बिना मेहनत की जिंदगी गुजारना पसंद है.
निठल्ला, नकारा प्रीतेश घर में अपने बड़े शादीशुदा भाईबहनों से लड़ता रहता है. आवारा दोस्तों के साथ घूमताफिरता है, शराब पीता है और कुछ बोलने पर घर में तोड़फोड़ करने लगता है. उसे आईफोन और बाइक चाहिए लेकिन बंधीबंधाई तनख्वाह में कहां उसे महंगा फोन और बाइक खरीद दें. प्रीतेश के मातापिता को कोई राह नहीं दिख रही है कि वे क्या करें.
ऐसा भी नहीं है कि युवा बच्चे घर पर रह कर, घर के कामों में या बाहर से सामान खरीद कर लाने या फिर किसी तरह की कोई आर्थिक मदद पेरैंट्स की करते होंगे. अगर ऐसा होता तो फिर वे अकेले रह सकते थे.
बोझ बनते बच्चे
युवा बेरोजगार बच्चों के महंगे खर्चे उठाने में मातापिता असमर्थ होते हैं. इस के चलते आएदिन उन के बीच झगड़े और क्लेश होते हैं. ऐसे में कहीं न कहीं युवा बेरोजगार बच्चे मातापिता को बोझ लगने लगते हैं.
एक अभिभावक का कहना है कि उन का 28 साल का बेरोजगार बेटा उन के साथ ही रहता है और वह आर्थिक रूप से उन पर निर्भर है. उसे कुछ बोल भी नहीं सकते, क्योंकि अपने स्तर पर वह मेहनत कर रहा है लेकिन जौब नहीं मिल रही, जिस से वह भी तनाव में है.
कई वयस्क बच्चों को अपने मातापिता के साथ रहना अच्छा लग सकता है लेकिन कई वयस्क बच्चों को मजबूरी में अपने मातापिता के साथ रहना पड़ता है लेकिन पेरैंट्स यह सोचते हैं कि उन का बच्चा सुखसुविधा के चलते घर नहीं छोड़ना चाहता है.
कई मातापिता वयस्क बेरोजगार बच्चों पर पैसा लगाना बरबादी समझते हैं लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि बच्चों में निवेश कर के वे अपने भविष्य में निवेश कर रहे हैं. युवा बच्चों में निवेश करना आर्थिक रूप से भी सार्थक हो सकता है.
19 साल की यामिनी एक ग्रामीण इलाके में अपने मातापिता और 2 छोटे भाईबहन के साथ रहती है. यामिनी के पिता डाक विभाग में बहुत छोटे पद पर काम करते हैं और उसी कमाई से उन का परिवार चलता है. यामिनी ने पिछले साल ही एक सरकारी स्कूल से अच्छे नंबरों से 12वीं की परीक्षा पास की है. अब आगे की पढ़ाई वह कालेज जा कर करना चाहती है. दूसरी लड़कियों की तरह उस का भी सपना कुछ बड़ा बनने का है लेकिन उस के मातापिता कहते हैं कि उन के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे उसे शहर भेज कर कालेज की पढ़ाई करवा सकें और अब वे उस की शादी के बारे में सोच रहे हैं.
यह ऐसा तर्क है जो ज्यादातर मातापिता बेटियों के लिए बोलते हैं कि ‘बस बहुत हो चुकी पढ़ाईलिखाई, अब कुछ घर के कामकाज भी सीख लो, दूसरे घर जाना है तुम्हें.’
फ्यूचर इन्वैस्टमैंट जैसे बच्चे
यह भी सच है कि कुछ मातापिता अपने युवा बच्चों को बोझ नहीं बल्कि फ्यूचर इन्वैस्टमैंट के तौर पर देखते हैं. वे उन्हें अपने कर्तव्य का हिस्सा मानते हैं, खासकर जब वे युवा बच्चों को सहारा दे रहे होते हैं. वे बेरोजगारी को एक अस्थायी दौर मानते हैं. वे यह समझते हैं कि अभी उन के बच्चे एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं और एक दिन सब ठीक हो जाएगा. सो, वे नौकरी की तलाश करने में उन की मदद करते हैं, साथ में उन्हें भावनात्मक सहारा भी देते हैं ताकि वे टूट कर बिखर न जाएं.
कैरियर का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं और समाज में ‘लोग क्या कहेंगे’ का भय आज के युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है. ऐसे में अगर पेरैंट्स उसे सहारा नहीं देंगे तो वे और बिखर जाएंगे.
प्यू रिसर्च के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जनवरी 2024 तक 18 से 24 वर्ष की आयु 57 फीसदी अमेरिकी बच्चे अपने मातापिता के साथ रह रहे थे, जो 1960 के दशक में दर्ज की गई न्यूनतम 26 फीसदी की तुलना में दोगुने से भी अधिक है. ऐसे कई कारण हैं जिन की वजह से युवा बच्चे अपने पेरैंट्स का घर छोड़ नहीं पाते या कुछ समय के लिए वापस लौट पाते हैं, हालांकि मुख्य कारण आर्थिक ही होता है.
द न्यूयौर्क टाइम्स के हवाले से दैनिक भास्कर में छपी एक खबर के मुताबिक, मनोवैज्ञानिक लौरेंस स्टीनबर्ग कहते हैं कि ‘30 साल की उम्र तक सैटल न होने वाले बच्चों के पेरैंट्स को लगता है कि उन के बच्चे आलसी और उन पर बोझ हैं.’ आज के मानकों के हिसाब से वे सही भी हैं. आजकल के पेरैंट्स जितना सोच पा रहे हैं, संभवतया बच्चे उस से कहीं ज्यादा सोचते हैं. मनोवैज्ञानिक ने यह
भी कहा कि युवा होते बच्चों से ज्यादा उलझने से बचना चाहिए.
मातापिता को यह बात समझनी चाहिए कि युवा बच्चे अपने पेरैंट्स पर बोझ नहीं बल्कि फ्यूचर इन्वैस्टमैंट हैं, जो वे प्यार, समर्थन और भविष्य में देखभाल के रूप में लौटाते हैं. उन का लालनपालन, शिक्षा और कौशल विकास में किया गया निवेश व्यक्ति और समाज दोनों के लिए आर्थिक व सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण है.
युवा बच्चों पर किया गया हर खर्च शिक्षादीक्षा के रूप में लौंग टर्म इन्वैस्टमैंट है क्योंकि पिता की मेहनत से कमाए पैसों का सही उपयोग कर के वे भविष्य में कुछ अच्छा करते हैं और आर्थिक रूप से अपने पेरैंट्स का सपोर्ट भी करते हैं.
वैसे, कुछ युवा बच्चे अपने मातापिता के त्याग, मेहनत और संघर्ष को नहीं समझते और उन पर आर्थिक दबाव डालते हैं, उन की ऊर्जा और संसाधनों को खर्च करवाते हैं और लौटा कर कुछ दे नहीं रहे हैं. ऐसे युवा बच्चे मातापिता को बोझ लग सकते हैं.
भविष्य का निवेश क्यों हैं युवा बच्चे?
बच्चों का उचित विकास उन्हें कुशल नागरिक बनाता है, जो भविष्य में समाज और परिवार में योगदान करते हैं. बच्चों पर किया गया हर खर्च, भविष्य में मातापिता के सपनों और मूल्यों में वृद्धि करवाते हैं, जो किसी भी इन्वैस्टमैंट से कहीं बड़ा रिटर्न है. यानी, युवा बच्चों पर किया गया निवेश केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संपूर्ण भविष्य निर्माण होता है.

पेरैंट्स को अपने बच्चों को केवल बोझ या निवेश मानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आज के समय में उन्हें परिवार की पार्टनरशिप के रूप में देखना चाहिए. मातापिता उन का बचपन संवारते हैं और युवा हो कर वही अपनी मेहनत, सफलता और जिम्मेदारी से परिवार को आगे बढ़ाते हैं. सो, युवा बच्चे बोझ नहीं, बल्कि भविष्य का निवेश हैं, बशर्ते उन्हें सही दिशा और सपोर्ट मिले.
आर्थिक दृष्टिकोण
आज बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, होस्टल, कैरियर ग्रूमिंग पर लाखों का खर्च आता है. इसे अगर ‘खर्च’ समझ जाए तो यह बोझ ही लगेगा लेकिन अगर इसे इन्वैस्टमैंट समझ जाए तो यह भविष्य में बच्चों की सफलता से कई गुना लौटा सकता है.
भावनात्मक दृष्टिकोण
जब बच्चे अपनी मेहनत से सफल होते हैं तब मातापिता को खुशी, गर्व और संतोष का अनुभव होता है और यह खुशी और संतोष किसी भी निवेश पर ब्याज से बड़ा होता है. आज के समय में ज्यादातर युवा पढ़ाई और जौब के चलते विदेश चले जाते हैं और वहीं बस जाते हैं ऐसे में मातापिता को बच्चों को इन्वैस्टमैंट नहीं बल्कि खुद में आत्मनिर्भर बनने का अवसर मानना चाहिए.
भारतीय समाज में युवा बच्चों को परिवार का सुरक्षा कवच और बुढ़ापे का सहारा माना जाता है लेकिन बदलते समय के साथ ‘न्यूक्लियर फैमिली’ और ‘सैल्फ डिपैंडैंसी’ की सोच के कारण यह धारणा बदल रही है. कई मातापिता अब युवा बच्चों को ‘इमोशनल जौय’ मानते हैं, न कि बुढ़ापे की गारंटी.
मिडिल क्लास के बच्चों पर कब और कितना अनुमानित खर्च होता है?
आजकल बहुत से युगल जोड़े बच्चे पैदा नहीं करना चाह रहे क्योंकि उन्हें लगता है कि वे आर्थिक बोझ नहीं उठा पाएंगे. मोटेतौर पर बच्चों को पालने व बड़ा करने पर खर्च निम्न प्रकार के हो सकते हैं. हर जीवनशैली और पारिवारिक आय पर ये खर्च कमज्यादा हो सकते हैं. यह अनुमान मिडिल क्लास को ले कर लगाया गया है.
जन्म से पहले : गर्भावस्था के दौरान मां को कईर् बार डाक्टर के पास या अस्पताल जाना होता है. सब से बड़ा खर्च होता है प्रैग्नैंसी के दौरान दफ्तर से छुट्टी का और सहयोगियों से पिछड़ जाना.
डाक्टरों की फीस : 10 विजिट : 15,000 से 25,000 रुपए.
अल्ट्रासाउंड 2 बार : 5,000 रुपए.
एस्क्ट्रा दवाएं : 5,000 रुपए.
बेबीरूम बनवाना : 1 से 5 लाख रुपए तक जीवनशैली के अनुसार.
कार्यालय से अवकाश : कम से कम 2 माह का वेतन : 50 हजार से 3 लाख रुपए.
शावर पर खर्च : 50 हजार से 2 लाख रुपए.
जन्म के समय : अस्पताल में डिलीवरी : 1 से 4 लाख रुपए.
बेबी के कपड़े, डायपर-बेड, दवाएं 1 से 2 लाख रुपए.
वैक्सीनेशन : 20 हजार रुपए.
बेबी पार्टी : 1 लाख से 3 लाख रुपए.
एक्स्ट्रा हैल्प : 5 हजार से 20 हजार रुपए प्रतिमाह.
बेबी फूड : 50 हजार रुपए.
एक साल से प्री स्कूल तक
बेबी फूड : 20 हजार से 50 हजार रुपए.
मैटरनिटी लीव : 4 लाख से 10 लाख रुपए.
प्री स्कूल से रैगुलर स्कूल तक : (3 साल)
स्कूल फीस : 75 हजार से 3 लाख रुपए.
स्कूल बस/रिकशा : 50 हजार से 1 लाख रुपए.
कपड़े 25 हजार से 2 लाख रुपए.
घूमने जाने पर एक्स्ट्रा किराया : 15 हजार से 2 लाख रुपए.
रैगुलर स्कूल एडमिशन : प्राइमरी तक (5 साल)
फौर्म फीस (10 स्कूलों में) : 10 हजार रुपए.
एडमिशन फीस : 50 हजार से 3 लाख रुपए.
स्कूल फीस : 50 हजार से 3 लाख रुपए.
ड्रैस/किताबें/स्टेशनरी : 20 हजार से 30 हजार रुपए. पौकेटमनी : 50 हजार रुपए.
मिडिल से सैकंडरी तक : (7 साल यानी 84 माह)
स्कूल फीस (इंग्लिश मीडियम) : 3 लाख से 25 लाख रुपए.
स्कूल बस : 1.5 लाख से 5 लाख रुपए.
किताबें : 1 लाख रुपए.
स्टेशनरी/प्रोजैक्ट : 2 लाख रुपए.
स्कूल ट्रिप : 2 लाख रुपए.
पौकेटमनी : 1 लाख से 5 लाख रुपए.
सैकंडरी के बाद जो खर्च होता है उस का आकलन करना कठिन है क्योंकि वह लाखों में हर घर की हैसियत के अनुसार होता है.
पेरैंट्स की गलतियों के कारण बच्चों पर किया गया इन्वैस्टमैंट जाता है बेकार
इस लेख में कहा गया है कि युवाओं पर किया गया खर्च इन्वैस्टमैंट है लेकिन यह भी देखने में आ रहा है कि पेरैंट्स की खुद की गलतियों के कारण यह बेकार जा रहा है. कुछ संकेत देखिए जिन में इन्वैस्टमैंट ही गलत होता है.
जब स्कूली कक्षाओं में पिछड़ने वाले बच्चों के पेरैंट्स उन पर ट्यूशनों में इसलिए खर्च करना शुरू कर देते हैं कि इस से टीचर लालच में आ कर ज्यादा अंक दे देगा. ऐसे बच्चे जिम्मेदारी और नैतिकता दोनों का पाठ भूल जाते हैं.
जब पेरैंट्स पूजापाठी ज्यादा बने रहते हैं और बच्चों के सबकौंशियस अवचेतन मन में बैठा देते हैं कि भविष्य तो पिछले जन्मों के कर्मों का फल है या पूजापाठ का. ऐसे बच्चों पर किया गया खर्च बेकार ही जाता है.
जब पेरैंट्स उन्हें सिखाने, समझने या प्रकृति का आनंद लेने वाली यात्राओं की जगह तीर्थयात्राओं में धकेल देते हैं जहां से युवा होते बच्चे यह सीख कर आते हैं कि सफलता कर्मठता से नहीं बल्कि पूजापाठ से आती है.
जब पेरैंट्स एजुकेशन लोन ले कर युवाओं को वह पढ़ाई करवाने को भेज देते हैं जिस के वे योग्य नहीं हैं तो वे उन के भविष्य को काला कर देते हैं और इन्वैस्टमैंट को डुबो देते हैं.
जब बच्चों को मातापिता का आपसी विवाद, लड़ाईझगड़ा, तलाक देखना पड़े या मातापिता का अपने भाईबहनों से विवाद की बात डाइनिंग टेबल और ड्राइंगरूम में सुननी पड़े तो इन्वैस्टमैंट के बावजूद युवा विवादों में घिर जाते हैं.
जब पेरैंट्स उन बच्चों, जिन पर भारी इन्वैस्टमैंट किया गया है, के जीवनसाथी या जीवनशैली पर अपनी इच्छा, अपनी संकुचित रीतिरिवाजों वाली सोच थोपने लगते हैं तो परिणाम शून्य हो जाता है.
जब पेरैंट्स बच्चों को हमेशा बच्चा मानते हैं और उन्हें खुद अपने काम करने नहीं देते या उन के द्वारा किए गए काम में दोष निकालते हैं तो इन्वैस्टमैंट का कोई मतलब नहीं रह जाता.
जब पेरैंट्स केवल रैट रेस में बच्चों को अच्छे कपड़े दिलाते और लवप्यार में उन पर पैसा लुटाने में हिचकते नहीं हैं.
जब पेरैंट्स खुद टीवी और मोबाइल पर 24 घंटे लगे रहते हैं और बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे पढ़ें.
जब पेरैंट्स इन्वैस्टमैंट तो करते हैं पर भाइयों या भाईबहनों में स्पष्ट भेदभाव करने लगते हैं तो इन्वैस्टमैंट का लाभ नहीं मिलता. Parenting Perspective





