Editorial : भारत की विदेश नीति अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या विदेश मंत्री एस. जयशंकर साउथ ब्लाक के दफ्तर में तय नहीं करते, गलियों में भगवा दुपट्टा डाले व हाथ में सस्ता स्कार्फ लिए तिलकधारी बेरोजगार छोकरे तय करते हैं. बंगलादेश जो 1971 से 2024 तक भारत का दोस्त रहा अब ‘बंगलादेश घुसपैठियों वापस जाओ’ के नारों के कारण आज इतना खफा है कि वह अपनी क्रिकेट टीम तक को भारत में वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच खेलने के लिए भेजने से इनकार कर रहा है चाहे इस की वजह से उसे वर्ल्ड कप टी20 टूर्नामैंट से बाहर निकाल दिया जाए.
जब शाहरुख खान की आईपीएल टीम केकेआर ने बंगलादेश के खिलाड़ी मुस्तफीजुर रहमान को टीम में शामिल किया तो विदेश नीति की परवा किए बिना भगवा गैंग शाहरुख खान के फैसले पर टूट पड़ा. चूंकि बंगलादेश का नाम ले कर भारतीय जनता पार्टी असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय के चुनावों को लड़ती है, भारत सरकार ने इस भगवार्ई विद्रोह को खूब समर्थन दिया और बेचारा खिलाड़ी दो तरफ के कट्टरों का शिकार बन गया.
बात यहीं खत्म नहीं हुई. क्रिकेट भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश के लडक़ों का अकेला खेल बचा है जिस में वे घंटों लगाते हैं, खेलने में नहीं, देखने में, जुआ लगाने में. इसलिए जब वर्ल्ड कप में बंगलादेश की टीम को वेस्टइंडीज के साथ मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मैच खेलना था तो उन्होंने इनकार कर दिया.
यह भारत की विदेश नीति पर तमाचा है. अब तक जो देश इस एहसान से दबा हुआ था कि उसे 1971 में कांग्रेस की इंदिरा गांधी ने पश्चिमी पाकिस्तान की जालिम फौजों की मार और औरतों के किए जा रहे बलात्कारों से उसे बचाया था, आज उस की क्रिकेट टीम भारत में पैर रखने को भी तैयार नहीं है. बंगलादेश को दोस्त से दुश्मन बनाने में कोरा हाथ उन हिंदू कट्टरवादियों का है जो एक सांस में 4 बार घुसपैठियों को भारत पर छिपा हमलावर बताते हैं.
अफसोस यह है कि सरकार के पास इन कट्टरों को समर्थन देने के अलावा कोई नारा नहीं है क्योंकि मंदिर बिजनैस अगर रातदिन फलफूल रहा है तो इसीलिए कि हिंदूमुसलिम, हिंदूमुसलिम कह कर बंगलादेश को यही कटटर ही तो बदनाम कर रहे हैं, वह भी भाजपाई सरकार के इशारों पर ही. ममता बनर्जी के राज से लडऩे का भाजपा का सब से बड़ा हथियार बंगलादेश का नाम है.
अब जब बंगलादेश में पाकिस्तान के जमाते इसलामी जैसे कट्टरों का राज है तो वे इस वर्ल्ड कप टी20 को क्यों न डिप्लोमैसी का हथियार बनाएं. भारत आज अपने ही दोस्तों को खो बैठा है. सार्क, साउथ एशियाई देशों का संगठन, मर चुका है. दोस्त अब दोस्त नहीं रहे. Editorial





