Bangladesh Crisis : भारत ने जिस पड़ोसी को कभी पाकिस्तानी टैंकों के नीचे से निकाल कर खड़ा किया, वही बंगलादेश आज नफरत की आग में झुलस रहा है और दिल्ली से ढाका तक सत्ता और सियासत मानो उस आग पर पानी नहीं, पैट्रोल डालने की होड़ में लगी हैं. शेख हसीना को पनाह, मुहम्मद यूनुस की कमजोर अंतरिम हुकूमत, जमात ए इसलामी और पाकिस्तान के कट्टरपंथी तूफान के बीच फंसा बंगलादेश जब विकास से विनाश की तरफ लुढ़क रहा है तब भारत आईपीएल की नीलामी, टीवी प्रसारण और ‘देशद्रोह’ के नारों में उलझ हुआ है.
1947 में आजाद होने के बाद से ही पाकिस्तान अपने पूर्वी हिस्से पर जबरन भाषा और तहजीब थोपना चाहता था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान की जनता अपने ऊपर थोपी जा रही इस भाषाई गुलामी के खिलाफ थी. दशकों तक संघर्ष चला. 1971 से पहले के पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की क्रूरता से लाखों लोग मारे गए और लाखों शरणार्थी भारत में आए. भारत ने न केवल इन शरणार्थियों को अपनाया बल्कि बंगलादेश की आजादी के सिपाहियों को ट्रेनिंग दी और हथियार दिए.
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बंगलादेश के मुद्दे को उठाया और बंगलादेश की आजादी के लिए पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया जो 13 दिनों में समाप्त हो गया. इस तरह बंगलादेश को पाकिस्तान से आजादी मिल गई. यही कारण है कि बंगलादेश 2024 तक भारत का सब से हिमायती मुल्क बना रहा.
1971 में बंगलादेश को आजादी दिलाने के बाद भारत ने बंगलादेश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में भी मदद की. भारत ने बंगलादेश को लगभग 8 अरब डौलर का कर्ज दिया. भारत की ओर से भेंट की गई यह मदद बंगलादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और ट्रेड को बढ़ाने में इस्तेमाल की गई. बंगलादेश की 15 प्रतिशत बिजली भारत से जाती है, इस से दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है. भारत ने बंगलादेश में रेल, सड़क और पोर्ट के प्रोजैक्ट्स में भी मदद की जिस से बंगलादेश की इकोनौमी और मजबूत हुई. 2021 से 2023 के बीच भारत ने सालाना 200-300 करोड़ रुपए की मदद दी. हालांकि, बंगलादेश की इकोनौमी में तेजी मैन्युफैक्चरिंग की वजह से आई है लेकिन भारत ने बड़े भाई की तरह हर मुश्किल वक्त में बंगलादेश की मदद की है पर बीते 2 वर्षों में हालात बिलकुल बदल चुके हैं.
2024 में तख्तापलट के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण ली और बंगलादेश में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी, तब से दोनों देशों के बीच रिश्ते खराब हुए हैं. बंगलादेश में कट्टरपंथियों के बेलगाम होने से हिंदुओं की हत्याएं हुईं जिस से हालात और खराब हो गए.
आग में पैट्रोल डालता भारतीय कट्टरपंथ
दोनों देशों के बीच लगातार खराब होते हालात को मोदी सरकार की विदेश नीति का फेलियर कहा जा रहा है. शेख हसीना को भारत में शरण देने से बंगलादेश की नई सरकार के साथ विश्वास की कमी हुई है और इस से बंगलादेश में कट्टरपंथियों को भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने का मौका मिल गया.
भारत में भी दक्षिणपंथी सरकार ने अपने कट्टरपंथियों को खुला छोड़ दिया है जो हालात की गंभीरता को समझने के बजाय आग में पैट्रोल डालने जैसा बरताव कर रहे हैं. भारतीय मीडिया इस आग को और भड़काने में अहम भूमिका निभा रही है.
पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के फ्यूनरल में भारत का प्रतिनिधित्व करने विदेश मंत्री एस जयशंकर 31 दिसंबर, 2025 को बंगलादेश गए. वहां वे बंगलादेशी नेताओं से मिले और पाकिस्तानी स्पीकर अयाज सादिक से भी हाथ मिलाया लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हुआ. इस पर कोई सवाल नहीं किया गया.
गौतम अदानी की कंपनी अदानी पावर 2017 से बंगलादेश को कोल बेस्ड बिजली सप्लाई करती है. यह डील 1.6 गीगावाट की है और दोनों देशों के बीच खराब होते रिश्तों के मध्य भी यह डील जारी है. इस पर भी कोई उंगली नहीं उठा रहा लेकिन आईपीएल 2026 औक्शन में शाहरुख खान की कोओनरशिप वाली टीम कोलकाता नाइट राइडर्स यानी केकेआर ने बंगलादेशी क्रिकेटर मुस्तफीजुर रहमान को 9 करोड़ रुपए में खरीदा. इस से भारत में सियासत गरमा गई. संगीत सोम जैसे भाजपा नेता और देवकीनंदन ठाकुर जैसे बाबाओं ने इसे ‘देशद्रोह’ बताया. यहां गौरतलब बात यह है कि आईपीएल औक्शन तो बीसीसीआई करती है और बंगलादेशी प्लेयर्स को शामिल करने की अनुमति बीसीसीआई ने ही दी थी.
देखा जाए तो इस पूरे मामले में शाहरुख खान की कोई गलती नहीं थी. यह क्रिकेट का कमर्शियल फैसला था लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों से इसे बड़ा मुद्दा बना दिया गया जिस से बंगलादेश के साथ रिश्ते और खराब होते चले गए. नतीजा यह हुआ कि आईपीएल में बंगलादेशी खिलाड़ी मुस्तफीजुर रहमान को केकेआर से हटाने के बाद बंगलादेश ने आईपीएल की टैलीकास्ंिटग पर रोक लगा दी.
इस के अलावा, बंगलादेश ने टी-20 2026 वर्ल्ड कप के लिए बंगलादेशी खिलाडि़यों के भारत जाने पर भी रोक लगा दी. अमित शाह के बेटे जय शाह आईसीसी चेयरमैन हैं. आईपीएल में बंगलादेशी प्लेयर्स को शामिल करने की अनुमति बीसीसीआई ने दी थी जो जय शाह के नेतृत्व में हुई लेकिन जब विवाद बढ़ा तो बीसीसीआई ने फैसला वापस लेने को कह दिया.
असल में शाहरुख खान को टारगेट करना आसान है क्योंकि वे पब्लिक फिगर हैं और मुसलिम बैकग्राउंड से आते हैं जबकि जय शाह, अदानी और जयशंकर सत्ता से जुड़े लोग हैं. पश्चिम बंगाल में चुनाव वर्ष 2026 में होने हैं. वोटबैंक को ध्यान में रख कर ही शाहरुख खान को निशाना बनाया गया जबकि मामला बंगलादेश और पाकिस्तान से सीधा जुड़ चुका था.
इस में दोराय नहीं कि बंगलादेश में हिंदुओं और दूसरे अल्पसंख्यकों पर हमले हुए हैं और इस पर भारत की जनता का गुस्सा जायज है लेकिन क्रिकेट को बंद करना जायज नहीं. औपरेशन सिंदूर के बाद भी पाकिस्तान के साथ क्रिकेट संभव है तो बंगलादेश के साथ क्यों नहीं? अगर क्रिकेट बंद करने से शांति आ सकती तो फिर ट्रेड को भी क्यों न बंद किया जाए? गौतम अदानी पर प्रैशर क्यों नहीं बनाया जाए कि वे बंगलादेश को बिजली देना बंद करें.
बंगलादेश को लगा पाकिस्तानी करंट
पिछले 2 सालों से बंगलादेश में हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं. ढाका जल रहा है. बंगलादेश के दूसरे शहरों का भी यही हाल है. अल्पसंख्यकों में डर का माहौल है. इकोनौमी बरबादी के कगार तक पहुंच चुकी है. शेख हसीना के साम्राज्य को खत्म हुए 2 साल बीत चुके हैं लेकिन हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते जा रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि एशिया में सब से तेज इकोनौमिकल ग्रोथ वाले देश का ऐसा हाल क्यों हुआ? क्या यह सब बंगलादेश को बरबाद करने की साजिश का नतीजा है? क्या बंगलादेश की इस अराजकता के पीछे पाकिस्तान का हाथ है? क्या बंगलादेश को पाकिस्तानी करंट लग चुका है? आइए जानते हैं-
1947 में भारत का विभाजन हुआ. पाकिस्तान के रूप में एक नया देश वजूद में आया. 1971 तक पाकिस्तान एक मुल्क होने के बावजूद 2 अलगअलग हिस्सों में बंटा हुआ था. पूर्वी बंगाल का इलाका ही पूर्वी पाकिस्तान बना था जो आजादी के बाद इसलामाबाद से कंट्रोल होता था. कहने को पाकिस्तान का विभाजन धर्म के नाम पर हुआ था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान का कल्चर और भाषा पश्चिमी पाकिस्तान से बिलकुल अलग थी, फिर भी भाषा और तहजीब को पूर्वी पाकिस्तान पर जबरन थोपा जाने लगा. यहीं से दिक्कतें शुरु हुईं और पूर्वी पाकिस्तान आजाद होने को छटपटाने लगा. 1971 में इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान को आजादी दिलाई और बंगलादेश के रूप में एक नया देश वजूद में आया.
बंगलादेश की आजादी के बाद से ही इसे एक कमजोर और अस्थिर देश माना जाता रहा. बंगलादेश 70 के दशक तक दुनिया के सब से गरीब देशों में शुमार था. उस दौर में बंगलादेश को ‘बौटमलैस बास्केट’ कहा जाता था लेकिन बंगलादेश ने दुनिया के सारे भ्रम तोड़ दिए. आजादी के बाद लगभग हर दशक में बंगलादेश ने तरक्की के कीर्तिमान स्थापित किए और 2024 तक यह दक्षिण एशिया की तेजी से बढ़ती इकोनौमी में से एक बन गया. इतना ही नहीं, कई मामलों में तो यह भारत और पाकिस्तान से भी आगे निकल गया. यही कारण है कि 2022 में विश्व बैंक ने बंगलादेश को ‘विकास की महान गाथाओं में से एक’ बताया था.
प्रतिव्यक्ति आय यानी जीडीपी की बात करें तो 1971 में बंगलादेश की जीडीपी दुनिया में सब से निचले स्तर पर थी लेकिन आजादी के बाद हर दशक में जीडीपी ग्रोथ बढ़ी और 2021 तक यह लगभग 2,700 अमेरिकी डौलर तक पहुंच गई. 2021 तक बंगलादेश ने प्रतिव्यक्ति आय में भारत को भी पीछे छोड़ दिया. 1971 में बंगलादेश की 80 प्रतिशत आबादी गरीबीरेखा से नीचे थी. 1991 में यह 44 प्रतिशत पर थी और 2021 तक घट कर महज 13 प्रतिशत रह गई.
बिजनैस के लिए सेफ इकोनौमिकल जोन के कारण ही दुनियाभर की इंडस्ट्रीज बंगलादेश का रुख करने लगीं. कई कंपनियां पाकिस्तान से अपना बोरियाबिस्तर समेट कर बंगलादेश में शिफ्ट हो गईं. 2022 तक बंगलादेश दुनिया का दूसरा सब से बड़ा कपड़ा निर्यातक देश बन गया. दुनिया की टौप 100 ग्रीन गारमैंट फैक्टरियों में सब से ज्यादा बंगलादेश की हैं. इस दौरान रेमिटैंस और विदेशी निवेश भी बढ़े. विदेशी कंपनियों ने बंगलादेश की बढ़ती ग्रोथ पर भरोसा किया और कई बड़ी विदेशी कंपनियों ने बंगलादेश में अपनी फैक्ट्रियां लगाईं.
बंगलादेश का मानव विकास सूचकांक 1990 में 0.397 था, जो 2023 तक बढ़ कर 0.685 हो गया. इस से यह देश एशिया में सब से तेज प्रगति करने वाले देशों में शामिल हो गया. औसत आयु जो 1971-72 में 50 वर्ष से कम थी, 2023-24 में 75 वर्ष के करीब हो गई.
शिक्षा के मामले में भी बंगलादेश ने अपने पड़ोसी देशों को पीछे छोड़ दिया. यहां प्राइमरी स्तर पर एडमिशन रेश्यो 100 पहुंच गया और महिला शिक्षा में भी खासा प्रगति हुई. स्कूलिंग वर्ष दोगुने से ज्यादा हो गए. मातृ मृत्युदर में 70 प्रतिशत की कमी आई और बिजली 100 प्रतिशत घरों तक पहुंच गई.
बंगलादेश में लगातार प्राकृतिक आपदाएं आईं. जलवायु परिवर्तन की मार सब से ज्यादा बंगलादेश ने ही ?ोली. इस के बावजूद 2024 तक बंगलादेश न केवल जीवित रहा बल्कि विकास की दौड़ में अपने पड़ोसी देशों से भी आगे निकल गया. 1975 से लिस्टेड लीस्ट डैवलप्ड कंट्री से बंगलादेश 2026 में ग्रेजुएट होने वाला था क्योंकि यह 2024 तक जीएनआई, ह्यूमन डैवलपमैंट इंडैक्स और इकोनौमिकल स्टैबिलिटी के मानकों को पूरा कर चुका था.
बंगलादेश अपने से ज्यादा समृद्ध पश्चिम बंगाल से तो हर पैमाने पर कहीं आगे चला गया जबकि 1947 में वह बंगाल का फिसड्डी इलाका था. सारे उद्योग, रेलें, भद्रलोग कोलकाता राजधानी के चारों ओर थे. आज पश्चिम बंगाल की प्रतिव्यक्ति आय 2,200 डौलर है और पूर्वी बंगाल (बंगलादेश) की 2025 डौलर लेकिन 2024 आतेआते सबकुछ उलट गया.
बंगलादेश की राजनीतिक बरबादी की शुरुआत कैसे हुई?
बंगलादेश में 2009 से 2024 तक शेख हसीना की आवामी लीग की सरकार थी. इस दौरान देश में आर्थिक विकास तेजी से हुआ. जीडीपी ग्रोथ लगातार बढ़ी. शेख हसीना ने बेरोजगारी और गरीबी को भी कंट्रोल में रखा लेकिन कई मामलों में शेख हसीना ने किसी डिक्टेटर की तरह काम किया. विपक्षी दलों को निबटाया जाने लगा. उन पर तरहतरह के आरोप लगा कर परेशान किया जाने लगा. चुनावों में धांधली के आरोप लगे और मानवाधिकार उल्लंघन के मामले बढ़े. इन सभी कारणों से युवाओं में शेख हसीना सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ना शुरू हुआ और धीरेधीरे अराजकता का माहौल खड़ा हो गया. इस से कट्टरपंथियों को मौका मिला और उन्होंने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए माहौल तैयार कर दिया.
2024 में सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को फायदा पहुंचाने के लिए कानून बनाया गया. इस के खिलाफ बंगलादेश की यूनिवर्सिटीज से छात्रों ने विरोध शुरू किया. शुरुआत में शांतिपूर्ण आंदोलन हुए लेकिन जुलाई 2024 में ये विरोध बेकाबू हो गए. पुलिस और शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के समर्थकों ने छात्रों पर हमला किया जिस से सैकड़ों मौतें हुईं. इस के बाद यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया और अगस्त 2024 में शेख हसीना को इस्तीफा दे कर भारत भागना पड़ा.
शेख हसीना के पतन के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. मुहम्मद यूनुस बंगलादेश के कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बन गए. उन्होंने जमाते इसलामी जैसी कट्टर संस्थाओं के आगे घुटने टेक दिए. नतीजा यह हुआ कि 2025 में स्थिति और बिगड़ गई. इसलामी कट्टरपंथी ताकतों के उभार का नतीजा यह हुआ कि बंगलादेश के हालात बेकाबू हो गए. मुहम्मद यूनुस हालात को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले और लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती चली गईं.
19 दिसंबर, 2025 को एक कट्टरपंथी छात्र नेता और प्रो-डैमोक्रेसी आंदोलन के कार्यकर्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद बंगलादेश की स्थिति इतनी खराब हुई कि पूरा बंगलादेश हिंसा की आग में दहक उठा.
जगहजगह पर दंगे हुए. कई जगहों पर आगजनी की गई. सांस्कृतिक धरोहरों पर हमले किए गए और इस दौरान बंगलादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ भी हिंसा जारी रही. एक हिंदू नौजवान की हत्या कर दी गई. बंगलादेश की मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि मौजूदा हालात का फायदा उठा कर बाहरी ताकतें बंगलादेश को बरबाद करने को तुली हैं.
हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे
एक कहावत है, हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे. पाकिस्तान यही कर रहा है. सच यह है कि बंगलादेश को आज के हालात तक पहुंचाने में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है. 2022 तक पाकिस्तान की इकोनौमी
और बंगलादेश की इकोनौमी में जमीनआसमान का अंतर आ गया था. पाकिस्तान कर्ज में डूबने के कगार पर था और बंगलादेश हर मामले में पाकिस्तान से आगे निकल रहा था.
2022 तक आर्थिक और सामाजिक ग्रोथ में बंगलादेश की तुलना में पाकिस्तान काफी पीछे छूट चुका था. 2022 के आसपास बंगलादेश की प्रतिव्यक्ति जीडीपी लगभग 2,695 डौलर थी जबकि पाकिस्तान की महज 1,479 डौलर. इस से साफ है कि बंगलादेश ने 2010 के बाद पाकिस्तान को पीछे छोड़ दिया था, जहां बंगलादेश की वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर औसतन 7 प्रतिशत रही वहीं पाकिस्तान की 5 प्रतिशत. इस दौरान गारमैंट्स एक्सपोर्ट पर आधारित इकोनौमी की वजह से बंगलादेश कुल जीडीपी में भी पाकिस्तान से आगे निकल गया.
2022 तक बंगलादेश में 3 डौलर प्रतिदिन की गरीबीरेखा पर लगभग 6 प्रतिशत आबादी गुजारा कर रही थी जबकि पाकिस्तान में 3 डौलर प्रतिदिन पर लगभग 17 प्रतिशत आबादी निर्भर थी. राष्ट्रीय स्तर पर बंगलादेश की गरीबी दर 20 प्रतिशत के आसपास थी जबकि पाकिस्तान की 24 प्रतिशत.
पाकिस्तान बनने के बाद से यहां लगातार राजनीतिक उठापटक और इसलामिक आतंकवाद हावी रहा जिस की वजह से कट्टरता में तो ग्रोथ हुई लेकिन इकोनौमी मरती चली गई. हर नई सरकार ने इकोनौमी को सुधारने के नाम पर विदेशों से मोटा कर्ज लिया. भारत का डर दिखा कर हर सरकार ने सेना का खर्च बढ़ाया और आम जनता के टैक्स के पैसों को विदेशों से हथियार खरीदने में लगाया. इस का नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान परमाणु संपन्न तो हो गया लेकिन बंगलादेश की तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया.
पाकिस्तान में लगातार हिंसा की वजह से ही यहां विदेशी या देशी निवेश के लिए जमीन तैयार नहीं हो पाई. जियाउल हक ने कट्टरता का जो बीज बोया उस से आगे चल कर आतंक की फसल तैयार हुई.
पूरी दुनिया की नजर में पाकिस्तान आतंकियों का अड्डा बन कर उभरा. ओसामा बिन लादेन जैसे लोगों को पनाह देने का मामला हो या तालिबानी और कश्मीरी टैररिज्म से जुड़े संगठनों को पोसने का मामला हो, हर बार पाकिस्तान आतंक की नर्सरी के रूप में सामने आया और पाकिस्तान ने अपनी इस छवि को दुरुस्त करने के लिए कोई ऐसा प्रयास नहीं किया जिस से पाकिस्तान पर निवेशकों का भरोसा कायम हो सके.
पाकिस्तान में कट्टरता हावी होने का नतीजा यह हुआ कि मजहबी हिंसा और आतंकवाद से 2019-2000 के बीच 63,898 लोग मारे गए. आतंकवाद और इस से जुड़े संगठनों को बंगलादेश ने ज्यादा तवज्जुह ही नहीं दी. यही कारण है कि किसी भी आतंकी घटना के तार बंगलादेश से जुड़े नजर नहीं आए. हालांकि बंगलादेश में जमात ए इसलामी और तब्लीगी जमात जैसे कट्टरपंथी संगठन हमेशा से रहे लेकिन 2022 तक बंगलादेश ने इन कट्टरपंथियों को हावी नहीं होने दिया.
दूसरी ओर, आतंकवाद और कट्टरपंथ के हावी होने के कारण पाकिस्तान में निवेश घटा. टूरिज्म में लगातार गिरावट आई. धार्मिक कट्टरता के कारण शिक्षा भी दूषित हुई. आधी आबादी के लिए स्कूल और कालेज के दरवाजे बंद होने लगे. लड़कियों का कालेज तक पहुंचना सिर्फ एलीट तबके तक सिमट गया. कट्टरता के कारण मदरसे ताकतवर हुए जिस से जिहादी विचारधाराओं को ताकत मिली और इस तरह कट्टरता लगातार हावी होती चली गई.
पाकिस्तान 2022 तक बंगलादेश के मुकाबले आर्थिक रूप से 50 प्रतिशत और सामाजिक रूप से 30 प्रतिशत तक पीछे था और इस का सिर्फ एक ही कारण था इसलामिक कट्टरता.
पाकिस्तान के उलट बंगलादेश ने सैकुलरिज्म को ज्यादा महत्त्व दिया. इस से बंगलादेश को सामाजिक तौर पर ज्यादा स्टैबिलिटी मिली. इस का फायदा इकोनौमी को हुआ और बंगलादेश ने तरक्की के मामले में इतिहास रच दिया.
2022 तक दोनों देशों की स्थिति में अंतर साफ था. एक तरफ परमाणु संपन्न देश पाकिस्तान था जो दुनिया की नजर में फिसड्डी और भिखारी देशों की कतार में खड़ा था तो दूसरी ओर बंगलादेश था जो अपने बूते तरक्की के नए कीर्तिमान बना रहा था. पाकिस्तान के लिए यह स्थिति शर्मनाक थी. बेटा बाप से आगे निकल जाए, इस में शर्म कैसी? लेकिन पाकिस्तान के लिए यह डूब मरने की स्थिति थी. अपनी लकीर बड़ी न कर पाओ तो दूसरे की लकीर छोटी कर दो. पाकिस्तान के पास, बस, एकमात्र रास्ता यही बचा था.
बंगलादेश की बरबादी के पीछे पाकिस्तान
बंगलादेश की बरबादी में पाकिस्तान की भूमिका के बारे में कई चौंकाने वाली रिपोर्ट्स आ चुकी हैं. बंगलादेश के कुछ ईमानदार मीडिया हाउसेस ने इस बात को उजागर किया है. मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई बंगलादेश में अशांति फैलाने में शामिल है. मुहम्मद यूनुस खुद एक कट्टरपंथी हैं और पाकिस्तान के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं.
पाकिस्तान 1971 की हार का बदला लेने की कोशिश में बंगलादेश को अस्थिर करने की रणनीति अपनाए हुए है. इस मकसद को पूरा करने के लिए पाकिस्तान जमात ए इसलामी जैसे कट्टरपंथी समूहों की मदद कर रहा है. जमात ए इसलामी जैसे गिरोह बंगलादेश में चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं और भारतविरोधी भावनाओं को भड़काने में लगे हैं. कुल मिला कर बात यह है कि बंगलादेश को पाकिस्तान का इसलामिक करंट लग चुका है जिस से उबरना बंगलादेश के लिए मुश्किल है.
बंगलादेश में हालिया हिंसा के लिए जमात ए इसलामी पूरी तरह जिम्मेदार है. जमात ए इसलामी की स्थापना 1941 में ब्रिटिश काल में हुई थी और इस गिरोह का मकसद शरिया आधारित इसलामी राज्य की स्थापना करना है.
1971 के बंगलादेश मुक्ति आंदोलन के दौरान जमात ए इसलामी ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था और बंगाली हिंदुओं व मुसलमानों पर अत्याचार किए थे. यह बंगलादेश के लिए एक गद्दार गिरोह था, इसलिए शेख हसीना ने इस गिरोह को कंट्रोल में रखा लेकिन शेख हसीना सरकार के पतन के बाद मुहम्मद यूनुस की सरकार ने इस संगठन पर लगे प्रतिबंध हटा दिए. जमात ए इसलामी को आईएसआई से फंडिंग और रणनीतिक मदद मिल रही है. इस से यह गिरोह पूरी तरह उद्दंड हो गया है.
पाकिस्तान का सपोर्ट मिलने के बाद तो यह संगठन बंगलादेश में नंगा नाच करने लगा है. माइनौरिटीज पर हमले तेज हो गए, मौबलिंचिंग हिंसा बढ़ गई. ब्लास्फेमी के नाम पर किसी की भी लिंचिंग कर दी जा रही है.
2025 में 2,200 से अधिक हिंदू विरोधी घटनाएं दर्ज की गईं हैं जिन में मंदिरों पर हमले और घरों को जलाना भी शामिल हैं. जमात ए इसलामी के लोग अब खुलेतौर पर अल्पसंख्यकों को इसलाम अपनाने या देश छोड़ने की धमकी दे रहे हैं, जिस से भय का माहौल फैल रहा है.
बरबादी की सब से बड़ी वजह धार्मिक कट्टरता
पाकिस्तानी तर्ज वाली धार्मिक कट्टरता किस तरह किसी राष्ट्र को तबाही के कगार पर ला कर खड़ा कर सकती है, पाकिस्तान और अब बंगलादेश इस बात के उदाहरण हैं. अफगानिस्तान, ईरान और सीरिया की आम जनता भी कट्टरता का खमियाजा भुगत रही है. इस मामले में सभी धर्म एकजैसे ही हैं. मुसीबत यह है कि भारत में भी भगवा कट्टरता लगातार बढ़ रही है. मीडिया और सरकार पूरी मेहनत से बहुसंख्यकों के भीतर धार्मिक कट्टरता ठूंसने में लगे हैं. प्रतिक्रियात्मक रूप से अल्पसंख्यकों के अंदर भी धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ी है. यही कारण है कि लोगों को स्कूल, कालेज और अस्पतालों से ज्यादा मंदिरों और मसजिदों की जरूरत पड़ रही है.
धर्म दरअसल आम जनता को ठगने का सब से आसान जरिया है. आम आदमी धर्म के नाम पर ठगा जा रहा है लेकिन उसे इस का एहसास भी नहीं हो रहा है. धार्मिक कट्टरता के कारण पाकिस्तान पहले से बरबाद था, बंगलादेश बरबाद हो रहा है और भारत भी इसी रास्ते पर है. कोई भी धर्म आम जनता के हितों के लिए बना ही नहीं है. आम आदमी सिर्फ भक्त होता है. भक्तों की भावनाओं को भुनाने वाले गिरोह ही धर्म का फायदा उठाते हैं.
पाकिस्तानी मौलवियों ने बिगाड़े बंगलादेश के हालात
जुलाई 2024 को बंगलादेश में हुई क्रांति के बाद शेख हसीना जान बचा कर भारत भाग आईं और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. यूनुस ने हालात को सुधारने और लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा कायम करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. मुहम्मद यूनुस ने बंगलादेश में इसलामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले संगठनों को पूरा मौका दिया. जमात ए इसलामी जैसे संघठनों को खुला छोड़ दिया और पाकिस्तान से कट्टर मौलवियों को आयात किया जिन्होंने बंगलादेश में बचीखुची डैमोके्रसी और सैकुलरिज्म को भी तहसनहस कर दिया.
1 फरवरी, 2025 को पाकिस्तान के एक बड़े मौलवी इबतिशाम इलाही जहीर बंगलादेश के दौरे पर आए. इस दौरे में उन्होंने बंगलादेश के जमात ए इसलामी के बड़े उलेमाओं से मुलाकात की. 25 अक्तूबर, 2025 को इबतिशाम जहीर फिर से बंगलादेश पहुंचे. पाकिस्तान का यह मौलाना मरकजे जमात अहले हदीस का जनरल सैक्रेटरी है और आतंकी संगठन लश्करे तोयबा के संस्थापक हाफिज सईद का नजदीकी है. अपनी दूसरी बंगलादेश यात्रा में इबतिशाम जहीर ने मसजिदों, मदरसों और धार्मिक संगठनों के साथ बैठकें कीं.
नवंबर 2025 में बंगलादेश में आयोजित एक बड़े इसलामी सम्मेलन में पाकिस्तान से 35 मौलवी शामिल हुए. उस कार्यक्रम में पाकिस्तानी नेता मौलाना फजलुर रहमान भी शामिल था जो भड़काऊ स्पीच के कारण जाना जाता है. इस सम्मेलन में अहमदिया समुदाय को गैरमुसलिम घोषित करने और ईशनिंदा (ब्लास्फेमी) कानून को और सख्त करने की मांग की गई. साथ ही, बंगलादेश में पाकिस्तान जैसे सख्त ब्लास्फेमी कानून लागू कराने के लिए दबाव बनाया गया.
इन पाकिस्तानी मौलवियों ने ‘मुसलिम एकता’ की बात की और काबुल से बंगलादेश तक ‘एक कलमा की जीत’ का नारा दिया. पाकिस्तानी मौलवियों ने बंगलादेश के जमात ए इसलामी के साथ मिल कर यह बयानबाजी की. जमात ए इसलामी की छात्र शाखा इसलामी छात्र शिविर ने ही 2024 के छात्र आंदोलन को हाईजैक कर हिंसा भड़काई, जिस में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की बड़ी भूमिका थी. लश्कर ए तोयबा जैसे आतंकी संगठनों के साथ जमात ए इसलामी की छात्र शाखा का संबंध अब कोई छिपी बात नहीं है.
पाकिस्तानी मौलवियों के अलावा 2025 में पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार और जनरल साहिर शमशाद मिर्जा की बंगलादेश यात्राएं हुईं. बंगलादेशी नेता पाकिस्तानी सैनिक अधिकारियों से भी रावलपिंडी में मिल कर आ चुके हैं.
पाकिस्तानी घुसपैठ के बाद ही बंगलादेश में हिंदू, अहमदिया, ईसाइयों पर हमले बढ़े. दिसंबर 2025 में एक हिंदू व्यक्ति की ब्लास्फेमी के आरोप में लिंचिंग कर दी गई. दिसंबर 2025 में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद पूरा बंगलादेश हिंसा की आग में जल उठा.
इस बात में रत्तीभर भी शक की गुंजाइश नहीं बचती कि बंगलादेश के हालात को बिगाड़ने में पाकिस्तान का हाथ है. वर्ष 2024 की क्रांति भी स्वाभाविक नहीं थी बल्कि वह पाकिस्तान की प्लानिंग का हिस्सा थी.
कठिनाई यह है कि यह सब समझते हुए भी भारत के राजनेता वोटों की खातिर देश में हर समय बंगलादेशी घुसपैठियों की बात करते रहते हैं. ऐसा लगता है कि अगर बंगलादेशी घुसपैठिए न होते तो हम सिंगापुर बन गए होते. एक आम बंगलादेशी आखिर कैसे इन भारतीय नेताओं पर भरोसा
कर सकता है जो अपनी चुनावी सभाओं में बंगलादेशीबंगलादेशी चिल्लाते हैं और बाद में ढाका से उम्मीद करते हैं कि वह दोस्ती का हाथ बढ़ाए.
पाकिस्तान इस बात का पूरा फायदा उठा रहा है. Bangladesh Crisis :





