Neurological Disease : मिर्गी को ले कर तमाम भ्रम हैं जो न सिर्फ अनपढ़ों में हैं बल्कि पढ़ेलिखे तबके में भी हैं. कई जगह यह भ्रम अंधविश्वास और पाखंड के भी रास्ते चल देते हैं. मिर्गी असल में है क्या और इसे ले कर क्या भ्रम हैं, आइए जानते हैं.

मिर्गी के बहुत से कारण हो सकते हैं. मुख्यतया विसिग्नैलिंग कैमिकल, जिन्हें न्यूरोट्रांसमीग्स कहा जाता है, का असंतुलन पैदा हो जाता है. यह ट्यूमर्स, स्ट्रोक, ब्रेन डैमेज, लंबी बीमारी, गहरी चोट या इन के आपसी मेलजेल के कारण हो सकता है.

यह दवाइयों, कुछ मामलों में सर्जरी और खानपान में बदलाव से ठीक हो सकता है. इसे मानसिक रोग नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि यह मस्तिष्क में आई सर्टिंग के कारण पैदा होने वाला रोग है. एंटी एपीलेटिक ड्रग्स से या बिजली के हलके झटकों से दूर हो सकता है.

कुछ मामलों में यह रोग जीवनभर चलता है पर कुछ मामलों में जल्दी ठीक हो जाता है पर आज भी हमारे कट्टरपंथी, अंधविश्वासी समाज में बहुत सी भ्रांतियां इस रोग के बारे में हैं जो अनपढ़ों में तो हैं ही, पढ़ेलिखों में भी हैं क्योंकि हमारे पढ़ेलिखे तार्किक कम हैं जबकि सुनीसुनाई या व्हाट्सऐप ज्ञान पर ज्यादा निर्भर हैं.

मिर्गी रोग अभी भी अनेक अंधविश्वासों से घिरा है जिस के कारण इस को छिपाने का प्रयास किया जाता है, उपचार नहीं कराया जाता, इन मरीजों का तिरस्कार किया जाता है, अवहेलना की जाती है, जिस के कारण इन के जीवन का हर पहलू प्रभावित होता है. इन के मन में हीनभावना हो सकती है. इन को पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेजा जाता, कार्य करने नहीं दिए जाते. देश का कानून भी इन के साथ न्याय नहीं करता.

अंधविश्वास, मिथ व सत्यता

वंशानुगत रोग है : मिर्गी अनेक प्रकार की होती है. कुछ प्रकार का रोग ही जीन में बदलाव के कारण होता है. अधिकांश में ये वंशानुगत नहीं होता. सो, मरीज के परिवार के साथ भेदभाव करना बेमानी है.

लाइलाज रोग है : रोग का सफलतापूर्वक उपचार संभव है. उपचार करवाने से 70 प्रतिशत से ज्यादा रोगी रोगमुक्त हो जाते हैं. बाकी में भी नियंत्रण होता है, जिस से ये सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं. इस रोग का उपचार शीघ्र से शीघ्र शुरू कराना जरूरी है.

शादी के बाद ठीक हो जाता है : अनेक परिवारों में मान्यता है कि शादी होने से रोग ठीक हो जाता है. रोग छिपा कर शादी कर देते हैं, बाद में रोग का पता लगने पर गृहकलह होती है. रोग का उपचार शादी कतई नहीं है. रोग छिपा कर शादी न करें. अधिकांश मरीज विवाह के बाद सामान्य वैवाहिक जीवन व्यतीत करते हैं, दायित्वों का पालन करते हैं. स्वस्थ व सामान्य संतानें होती हैं. गर्भावस्था में दवाएं बंद न करें.

तलाक मिल सकता है : अनेक व्यक्ति तलाक के लिए मिर्गी रोग का सहारा लेते हैं. अब कानून के अनुसार यह रोग तलाक का आधार नहीं है.

महिला शिशु को अपना दूध नहीं पिला सकती : यदि रोगग्रस्त महिला शिशु को जन्म देती है तो उस के द्वारा शिशु को अपना दूध पिलाने में कोई हर्ज नहीं है.

अटैक के दौरान मरने का खतरा होता है : अटैक होने पर डरते हैं कि मौत हो सकती है. सामान्यतया ऐसा नहीं होता. लगातार लंबे समय तक अटैक के दौरान बेहोशी की हालत में मरीज को पानी, जूस, ग्लूकोज, दवाई देने से यह श्वास की नली में पहुंच कर श्वास रुकने से मौत का खतरा हो सकता है.

रोगी पागल, मंद बुद्धि है : यह मनोरोग न हो कर मस्तिष्क का एक रोग है. यह पागलपन कतई नहीं है. ज्यादातर मरीज मंदबुद्धि नहीं होते, अनेक जीनियस, महान व्यक्ति रोगग्रस्त थे.

सामाजिक बहिष्कार के कारण रोग छिपाते हैं : रोग छिपाने से मरीज हीनभावना से ग्रस्त हो सकते हैं. इन का उपचार नियमित नहीं हो पाता, जिस से इन का वर्तमान, भविष्य अंधकारमय हो सकता है. रोग को छिपाने की आवश्यकता नहीं है. जरूरत है समाज में व्याप्त मिथ्या धारणाओं को दूर करने की.

मरीज को आग, पानी के निकट नहीं जाना चाहिए : अटैक कभी भी अचानक हो सकता है, पर अटैक के मध्य मरीज पूर्णतया सामान्य होते हैं. ये कोई भी कार्य निपुणता से कर सकते हैं. किचन में जाने, पानी में जाने से साधारणतया कोई खतरा नहीं होता. बेहतर होगा कि आग, पानी के पास होने पर आसपास कोई अन्य व्यक्ति हो जो अटैक होने पर सहायता कर सके.

रोग भूत, प्रेत, शैतान, दुष्ट आत्मा के शरीर में प्रवेश करने, प्रकोप से होता है : यह मस्तिष्क का रोग है, इन से इन का कोई संबंध नहीं है. ओझतांत्रिक के चक्कर में न आएं. ज्यादातर में अटैक कुछ मिनटों के लिए होते हैं. जब ओझतांत्रिक द्वारा अजीबोगरीब हरकत करने, धुआं, लोबान, मंत्र बड़बड़ाने के दौरान होश आ जाता है, तो ये श्रेय ले लेते हैं. झड़फूंक करने वाले मरीज को तरहतरह की यातनाएं इस विश्वास के साथ देते हैं कि शरीर के अंदर प्रविष्ट दुरात्मा मरीज का पीछा छोड़ देगी.

अटैक, देवी, हनुमान, भैरव शरीर में प्रवेश करने के कारण होता है : अनेक क्षेत्रों में अटैक होने पर इन के शरीर में देवी, देवताओं या किसी अलौलिक शक्ति का प्रवेश माना जाता है. इन की पूजाअर्चना की जाती है. इन से समस्याओं के हल पूछे जाते हैं. यह जनता को बेवकूफ बनाना है.

पुराने जन्म के पापों के कारण : यह मस्तिष्क का रोग है, पुराने जन्म से कोई संबंध नहीं होता.

रोग ग्रसित बच्चों को स्कूल नहीं भेजा जाता, पढ़ने से अटैक हो सकता है: अनेक परिवार इन को पागल, मंदबुद्धि समझ कर पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेजते, न ही बाद में अन्य कार्यों का प्रशिक्षण दिलवाते हैं जिस से अनेक रोगग्रस्त अनपढ़ रहते हैं. किसी अन्य कार्य में निपुण नहीं हो पाते. उन्हें दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है. ऐसे बच्चों को स्कूल अवश्य भेजें. कुछ तो कुशाग्र बुद्धि होते हैं. स्कूल में भी इन को प्रवेश मिलना चाहिए, वहां भी भेदभाव नहीं होना चाहिए. अटैक पड़ने से कुछ नहीं होता.

यहग अन्य से भिन्न है, तिरस्कार अनादर होता है : मिर्गीग्रस्त को भी सामान्य जीवन व्यतीत करने का अधिकार है. इन के साथ किसी प्रकार का भेदभाव, तिरस्कार, अनादर उचित नहीं है. ऐसे बच्चों का अन्य बच्चों के सदृश्य ही लालनपालन होना चाहिए. कार्य से रोकने, टोकाटाकी करने से इन के मन में हीनभावना होती है, अवसादग्रस्त हो सकते हैं, रोगमुक्त होना दूभर हो जाता है.

संक्रामक रोग है : मिर्गी संक्रामक कतई नहीं होता. यह रोग किसी ज्ञात, अज्ञात कारण से मस्तिष्क में तेजी से विद्युत तरंगें उत्पन्न होने के कारण होता है. सो, इन मरीजों के साथ बैठने, खेलने, रहनेखाने, सोने से रोग फैलने का कतई खतरा नहीं होता.

जूते, चप्पल, गंदे मोजे सुंघाने से होश आ जाता : अटैक अकसर सीमित समय के होते हैं. अटैक के कुछ देर बाद मरीज को अपनेआप होश आ जाता है. बदबूदार जूते, चप्पल, गंदे मोजे सुंघाने का कोई औचित्य नहीं है.

नौकरीपेशे में भेदभाव : इन के साथ नौकरी में भेदभाव होता है. कोई भी इन को नौकरी नहीं देना चाहता. यह उचित नहीं है.

मानसिक रोग, मनोविकार है : यह मानसिक रोग नहीं बल्कि मस्तिष्क का रोग है.

मरीज अव्यावहारिक होते हैं : दूसरे इन से दोस्ती करने, कार्य करवाने से कतराते, डरते हैं, जोकि उचित नहीं है.

सभी मरीज जो अचानक बेहोशी होने के कारण गिर पड़ते हैं, गश आता है वे मिर्गी के मरीज हैं : अचानक गश आना, बेहोशी अनेक कारणों से हो सकती है. सभी मिर्गी मरीज नहीं होते.

रोग का निदान ईईजी एमआरआई से होता है : सिर्फ इन जांचों से रोग की पुष्टि नहीं होती. प्रत्यक्षदर्शी के वर्णन करने से रोग का निदान आसानी से होता है.

वाहन चालन : इन मरीजों को पहले ड्राइविंग लाइसैंस नहीं दिया जाता था, पर अब रोग नियंत्रण के पश्चात अपना वाहन चलाने का लाइसैंस चिकित्सक के प्रमाणपत्र देने पर मिल सकता है.

इंश्योरैंस : इन का जीवन बीमा नहीं होता था. पर अब इंश्योरैंस नियंत्रण अथौरिटी ने जेनेटिक प्रौब्लम वाली श्रेणी में इसे डाल कर इसे इंश्योरैंस कवर में ला दिया है पर इस का प्रीमियम ज्यादा होता है और क्लेम रिजैक्ट करने के बहुत बहाने बनाए जाते हैं.

कानून : देश में अभी कानून भी इन के साथ भेदभाव करता है, इस में भी बदलाव की आवश्यकता है. पिछले सालों में काफी सुधार हुआ है और कई संशोधन इस कानून में हुए हैं. ज्यादा जानकारी किसी वकील से लें.

इपीलेप्सी रोग के प्रति व्याप्त समाज के अंधविश्वासों, मिथ्या धारणाओं को बदलने की नितांत आवश्यकता है. इन के साथ भेदभाव, तिरस्कार, अवहेलना कतई उचित नहीं है. इन को हर तरीके से सामान्य जीवनयापन का अधिकार होना चाहिए. कुछ प्रतिबंध, जैसे खतरनाक कार्य करना, खतरनाक खेल, जिन में खतरे की ज्यादा संभावना वाली स्थिति होती है, से बचना चाहिए. अंधविश्वास के कारण रोग का उपचार न करवाने से रोग लाइलाज हो सकता है. देश में शहरों के संभ्रांत वर्ग में कुछ बदलाव हो रहे हैं, पर देहातों और शहरों के निम्न?मध्य वर्गों और अंधविश्वासी शिक्षितों की सोच पूर्ववत ही है, जिस के कारण इन मरीजों का जीवन नारकीय हो जाता है. Neurological Disease :

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...