Psychological Trap : फोफो किसी बीमारी का नहीं बल्कि एक ऐसे दिमागी डर का नाम है जो सेहत पर बुरा असर डालता है. जांच का नतीजा पॉजिटिव आए या नेगेटिव आए, वह बीमारी का डर दूर करने वाला ही होता है. नेगेटिव हो तो बेफिक्री मिलती है और पॉजिटिव हो तो वक्त पर इलाज से बीमारी ठीक होने में मदद मिलती है तो फिर डर कैसा?

सोते हुए को तो एक बार जगाया जा सकता है लेकिन जो सोने का ड्रामा कर रहा हो उसे कैसे जगाया जाए, यह कहावत उन लोगों पर सटीक बैठती है जो लोग पैथोलॉजिकल जांचों से कतराते हैं. जबकि वे भी बेहतर जानते हैं कि ठीक होने का रास्ता जांचों से हो कर ही जाता है जब तक यह पता नहीं चलेगा कि शरीर में कौन सा विकार या रोग पनप रहा है तब तक ठीक होने की उम्मीद एक वहम और मूर्खता ही साबित होती है जिस के नतीजे कतई माफिक नहीं निकलते.

इस मानसिकता या हालत को जिस में आदमी जांचों से घबराता और कतराता है मेडिकल साइंस और मनोविज्ञान में फोफो यानी ‘फीयर आफ फाइंडिंग आउट’ कहा जाता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ सर्वे के मुताबिक दुनिया भर के कोई 30 फीसदी लोग इस की गिरफ्त में हैं. भारत में मुमकिन है यह तादाद ज्यादा हो क्योंकि यहां के लोग वैज्ञानिक मानसिकता के कम भाग्यवादी मानसिकता के ज्यादा हैं और भाग्यवादी आमतौर पर नतीजों से भयभीत ही रहते हैं. दूसरे पैथालाजी टेस्ट्स को ले कर देश में जागरूकता भी कम है, तीसरी बड़ी दिक्कत इस दुष्प्रचार से सहमत हो जाना है कि यह एलोपेथी डाक्टरों की लूट पाट का जरिया है.

अगर आप भी फोफो से ग्रस्त हैं तो यह आप के लिए नुकसानदेह हो सकता है, कैसे, यह जानने से पहले यह समझना अहम है कि यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक तरह का दिमागी डर है जिसे वक्त रहते दूर कर लेना जरुरी है नहीं तो कई बार लेने के देने पड़ जाते हैं.

फोफो और उसके नुकसान

अस्पताल और डाक्टरों से डर लगना कतई हैरानी की बात नहीं बल्कि स्वभाविक है लेकिन जरूरत पड़ने पर पेथालौजिकल टेस्ट्स से घबराना जरुर दिक्कत की बात है. फोफो की गिरफ्त में आया आदमी इस बात से डरता है कि ऐसा न हो कि जांच नतीजे में कोई बीमारी निकल आए. यह एक घातक मानसिकता है जिस के तहत यह तो मंजूर है कि कोई भी बीमारी शरीर में पनपती रहे और बाद में भले ही उम्मीद से ज्यादा तकलीफदेह और जानलेवा हो जाए लेकिन उसका हमें पता नहीं चले इसलिए टेस्ट करवाएं ही क्यों.

यानी बात शेर के सामने आंख बंद कर लेने की है जिस से डर कहने को ही दूर हो जाता है पर जान पर बन आती है, जब रोग की पहचान ही नहीं होगी तो इलाज कैसे होगा और ठीक कैसे होंगे यह सोचा जाए तो एक हद तक डर काबू होता है.

दरअसल में इस डर की जड़ में वजहें ये हैं कि अगर कोई बीमारी निकल आई तो जिंदगी अस्त व्यस्त हो जाएगी बीमारी के चलते सामान्य ढंग से जीना मुश्किल हो जाएगा और इलाज में पैसे लगेंगे सो अलग. कुछ बीमारियां बहुत आम हैं जिन के उदाहरण हर किसी के आसपास मिल जाते हैं मसलन ब्लड प्रेशर, डाईबिटीज, थायराइड और हार्ट से जुडी दिक्कतें जैसे बढ़ा हुआ कोलस्ट्रोल और ब्लाकेज. कैंसर भी इसी कड़ी में आती है लेकिन उस के मरीज अपेक्षाकृत कम होते हैं.

ब्लड प्रेशर की जांच में कोई तकलीफ नहीं होती इसलिए इस की जांच लोग आसानी से करवा लेते हैं. दिक्कत डायबिटीज जैसी बीमारियों में ज्यादा होती है जिन में जांच के लिए सुई से चार छह बूंदे निकाले बिना काम नहीं चलता. डाइबिटीज यानी सुगर कोई जानलेवा बीमारी नहीं है लेकिन इतना तय है कि इस में आप को कई चीजों का परहेज करना ही करना पड़ता है जैसे शकर, चावल, आलू, मैदा वगैरह. बीमारी ज्यादा बढ़ने पर परहेज की लिस्ट बढ़ती जाती है जिन में तली मसालेदार चीजें भी शामिल हैं.

फोफो से ग्रस्त लोग जानेअनजाने में इसे बढ़ाते रहते हैं और बाद में पछताते नजर आते हैं कि वक्त पर ही सुगर की जांच करवा लेते तो यह नौबत न आती. मेनिट भोपाल के आईटी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉक्टर राजेश पटेरिया अपना अनुभव सुनाते बताते हैं कि उन्होंने कहीं डायबिटीज न निकल आए इस डर से लम्बे समय तक जांच ही नहीं करवाई और खुद को नौन डायबिटीज मानते मनमुताबिक खाते पीते रहे जिस से शुगर 400 के पार हो गई.

जब पानी सर से गुजरने लगा तो उन्होंने रामराम करवाते सुगर टेस्ट कराया और नतीजा देख घबरा गए कि अब क्या होगा, ठीक होंगे कि नहीं, कहीं किडनी फेल न हो जाए, पैर या उस का कोई हिस्सा कटवाना न पड़े या फिर आखों की रौशनी कम न हो जाए वगैरह. लेकिन 5 साल हो गए ऐसा कुछ नहीं हुआ हां इतना जरुर हुआ कि उन्हें नियमित मैडिसिन खानी पड़ती है. परहेज करने पड़ते हैं रोजाना कसरत करना पड़ती है बिना मौसम की परवाह किए 30 से 45 मिनट तक टहलना पड़ता है.

राजेश अब बताते हैं कि डायबिटीज, शुगर मैनेज करने वाली बीमारी है अगर मैं पहले ही जांच  करवा लेता तो यह नौबत ना आती. अब हालत यह है कि महीने में कम से कम दो बार सुगर टेस्ट करानी पड़ती है लेकिन अब जांच कराने में डर नहीं लगता. यही बात हर उस बीमारी पर लागू होती है जिस के लिए पैथालौजी जाना ही पड़ता है.

यही वजह है कि न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में शुगर की यह बीमारी बहुत तेजी से पसर रही है. आईडीएफ यानी इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की मानें तो इस बीमारी की चपेट में आए लगभग 45 फीसदी भारतीय को नहीं पता था कि वे डायबिटीज की गिरफ्त में आ चुके हैं. इस की बड़ी वजह फोफो है जो जांचे आम हैं और बीमारी की पहचान और निदान के लिए शुरुआती हैं सीबीसी यानी कम्प्लीट ब्लड काउंट उन में से एक है.

करवाएं सीबीसी

अकसर डाक्टर जिस जांच के लिए सबसे पहले कहते हैं वह सीबीसी है. यह जांच मामूली होते हुए भी गैरमामूली इस लिहाज से है कि इस से शरीर के अंदर पनप रही लगभग डेढ़ दर्जन छोटी बड़ी अहम बीमारियों के मौजूद होने और मौजूद न होने के भी संकेत मिलते हैं जिन में प्रमुख रूप से इन्फेक्शन, सूजन, ब्लीडिंग और एनीमिया से ले कर कैंसर तक शामिल हैं.

सीबीसी में खून में मौजूद तीन पैरामीटर्स पर तफसील से जांच होती है. पहली है आरबीसी यानी लाल रक्त कण. दूसरी है डब्ल्यूबीसी यानी श्वेत रक्त कण. और तीसरी है प्लेटलेट्स. खून में हीमोग्लोबिन होता है यह हर कोई जानता है लेकिन पुरुषों में यह 13 से ले कर 17 ग्राम / डीएल यानी ग्राम प्रति डेसीलीटर ( एक लीटर का दसवां हिस्सा ) और महिलाओं में 12 से 15 ग्राम प्रति डीएल होना चाहिए यह कम ही लोग जानते हैं. जब शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी होती है तो कमजोरी, सांस फूलना और चक्कर आना जैसे लक्षण महसूस होते हैं. यही हीमोग्लोबिन अगर ज्यादा हो जाए तो डिहाइड्रेशन और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां होने का इशारा मिलता है. सभी टेस्ट्स रिपोर्ट में नार्मल वैल्यू दी रहती है यदि हीमोग्लोबिन कम या ज्यादा हो तो उसे बोल्ड लेटर्स यानी मोटे अक्षरों में लिखा जाता है जिस से यह आसानी से समझ आ सके.

और जब समझ आ जाए तो इलाज बेहद आसान हो जाता है. सीबीसी में इस तरह की 18 – 20 जांचें होती हैं जिन की नार्मल रेंज वॉल्यूम या वैल्यू टेस्ट रिपोर्ट में लिखी रहती है और किसी भी घटक का कम या ज्यादा होना जैसा कि ऊपर बताया गया है मोटे अक्षरों में लिखा रहता है.

यह सोचना गलत है कि जब इतनी सारी जांचें होती हैं तो खून भी ज्यादा निकाला जाता है हकीकत में सीबीसी के लिए किसी भी हालत में 3 एमएल मिली लीटर से ज्यादा खून नहीं निकाला जाता जो शरीर में दौड़ रहे कुल खून ( लगभग 5 लीटर ) का 0.05 फीसदी के लगभग ही होता है. इस की भरपाई शरीर चंद घंटों में ही कर लेता है. इस से कोई कमजोरी नहीं आती.

ऐसे बचें फोफो से

फोफो से बचना कतई मुश्किल काम नहीं है अगर आप यह हिसाब किताब लगा लें कि दरअसल में नुकसानदेह क्या है. जांच से अस्थाई तौर पर बच कर एक स्थाई बीमारी की गिरफ्त में आना या वक्त रहते इलाज करवा लेना. जाहिर है नुकसानदेह है बीमारी को पालते रहना. इसलिए यह फार्मूला याद रखें कि जितनी देर उतना ही ज्यादा नुकसान तय है, सेहत का भी और पैसों का भी. अपना डर कम करने आप पहले यूं ही बेवजह पैथलौजी का एक चक्कर लगाएं, इस से डर कम होगा. फिर बाद की भयावहता की कल्पना करें कि इलाज न लिया तो क्या हालत होगी और आज नहीं तो कल ट्रीटमैंट तो लेना ही पड़ेगा जो ज्यादा तकलीफदेह साबित होगा.

सहूलियत के लिए किसी नजदीकी रिश्तेदार या दोस्त को साथ ले जाएं क्योंकि कोई भी डर अकेले में ज्यादा डराता है. भोपाल के अशोका गार्डन इलाके में पैथोलॉजी लैब में काम कर रहे कर्मचारी हेमंत पटेल की मानें तो उन का रोज ऐसे मरीजों से सामना होता है जो जांच से डरते हैं उन्हें सब से ज्यादा डर इंजेक्शन या सुई के जरिये खून निकलवाने में लगता है (इसे ट्रिपैनोफोबिया कहा जाता है). एक दफा बच्चों को समझाना बहलाना फुसलाना आसान होता है लेकिन बड़ों को नहीं. ऐसे पेशेंट्स को हम सलाह देते हैं कि वे अपना ध्यान कहीं और लगा लें, चेहरा घुमा लें या फिर मोबाइल फोन पर मनपसंद रील्स देखने लग जाएं. सुई की चुभन मच्छर के डंक बराबर ही होती है यह सोच लिया जाए तो डर कम होता है.

इन छोटेमोटे उपायों से भी बात न बने तो किसी मनोचिकित्सक से मिलें जो आप को सीबीटी देगा लेकिन इस की जरूरत कम ही मामलों में पड़ती है जिन्हें अपवाद कहा जा सकता है. फोफो जांच से नहीं बल्कि जांच के नतीजों का डर होता है जो बीमारी के नतीजों के मुकाबले कुछ भी नहीं होता. Psychological Trap :

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...