चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में मनाया गया किसान दिवस
हिसार (हरियाणा) : 23 दिसंबर को देश में अनेक जगहों पर किसान दिवस का आयोजन किया गया. किसान दिवस कृषि विज्ञान केंद्र हिसार में भी मनाया गया.
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती पर आयोजित किसान दिवस पर किसानों को संबोधित करते हुए केंद्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि कृषि को?लाभकारी बनाने के लिए किसानों को फसल पैदा करने के साथ उस की मार्केटिंग भी खुद करनी होगी. उन्होंने कहा कि बिचौलिए खेती के उत्पादों को कम दामों पर खरीद कर ज्यादा दामों पर बेचते?हैं, जिस से ज्यादातर मुनाफा बिचौलिए के खाते में चला जाता?है. यदि किसान खेती के साथसाथ अपने उत्पादों की मार्केटिंग को अपना लें और अपना सामान खुद बेचें तो उन का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा. देश में कृषि पैदावार में बढ़ोतरी हुई?है, जिस का श्रेय कृषि वैज्ञानिकों को जाता है. बीरेंद्र सिंह ने कृषि वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि वे उन्नत कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित करने के साथ आर्थिक पहलू का भी अध्ययन जरूर करें ताकि कृषि किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सके. हरियाणा के किसानों को राज्य की राष्ट्रीय राजधानी के नजदीक होने का फायदा उठाना चाहिए और उन्हें खेती से जुड़े फल, सब्जी, दूध व दूध से बनी चीजें खुद जा कर बेचनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि सम्मेलन में आमंत्रित किए गए प्रदेश के प्रगतिशील किसानों को सम्मानित करना अच्छी बात है, पर उन किसानों को जो कृषि में पिछड़े हैं, विशेष रूप से आमंत्रित किया जाए ताकि वे भी इन किसानों से प्रेरित हो कर खुद भी प्रगतिशील किसान बनने की कोशिश करें. इस से प्रदेश व देश की कुल कृषि पैदावार में बढ़ोतरी होगी.
समारोह की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. केपी सिंह ने कहा कि देश के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों ने न केवल देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि आज हम कृषि उत्पादों का निर्यात भी कर रहे?हैं. हरियाणा हर क्षेत्र में अग्रणी है. अन्न उत्पादन के बाद भारतीय सेना में भी 11 फीसदी सैनिक हरियाणा से ही?हैं. उन्होंने चौधरी चरण सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय उन की नीतियों का अनुसरण करते हुए कृषि व किसानों की उन्नत के लिए कार्य कर रहा है. उन्होंने कहा कि देश में 55 फीसदी रोजगार खेती से?हैं. खेती कम हुई तो देश में बेरोजगारी की समस्या पैदा हो सकती है. इसलिए खेती को न केवल बनाए रखना होगा, बल्कि उसे आधुनिक तकनीकों के साथ और उन्नत बनाना होगा. उन्होंने लोगों से कहा कि वे खेती से विमुख न हों. जिस तरह कृषि उत्पादन की मांग बढ़ रही?है ऐसे में कृषि का उज्जवल भविष्य है.इस अवसर पर मुख्य संसदीय सचिव डा. कमल गुप्ता ने कहा कि पिछले वर्ष सफेद मक्खी के प्रकोप से कपास की फसल का भारी नुकसान हुआ?है. नतीजतन प्रदेश सरकार को फसल नुकसान की भरपाई करने के लिए किसानों को 967 करोड़ रुपए का मुआवजा देना पड़ा है. वैज्ञानिकों को इस प्रकार के घातक कीटों व रोगों की रोकथाम का?स्थायी हल निकालना चाहिए.
इस से पहले अनुसंधान निदेशक डा. एसएस सिवाच ने प्रदेशभर से इस कार्यक्रम में शामिल हुए किसानों और कृषक महिलाओं को विश्वविद्यालय की अनुसंधान उपलब्धियों की जानकारी दी. कार्यक्रम को विस्तार शिक्षा निदेशक डा. प्रवीण पूनिया ने भी संबोधित किया, जबकि विश्वविद्यालय के यूनिट रेडियो स्टेशन के परामर्शदाता डा. रामफल चहल ने मंच का संचालन किया.
इस अवसर पर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रगतिशील किसानों चौधरी बीरेंद्र सिंह ने प्रशस्तिपत्र, शाल व प्रमाणपत्र दे कर सम्मानित किया. सम्मानित किए गए इन किसानों में हरभजन सिंह (अंबाला), राम प्रसाद (बावल, रेवाड़ी), सत्य प्रकाश (भिवानी), राजू (फतेहाबाद), त्रषिराज त्यागी (फरीदाबाद), जगपाल सिंह (झज्जर), जय भगवान (जिंद), केपी सिरोह (कैथल), सुलतान सिंह (करनाल), विरेंद्र सिंह (कुरुक्षेत्र), महेंद्र पाल सिंह (मंडकोला, मेवात), राजबीर (महेंद्रगढ़), जितेंद्र मुल्लतानी (पिंजौर, पंचकुला), पालविंद्र सिंह (पानीपत), विरेंद्र मलिक (रोहतक) और राजकुमार (सदलपुर, हिसार) आदि शामिल थे.
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मधुमक्खियां बढ़ा रहीं पैदावार
पुणे : सुन कर हैरान होना लाजिम है कि भला शहद देने वाली मधुमक्खियां कैसे खेती कर रही हैं. लेकिन यह सच है. पुणे, अहमदनगर और उस के आसपास के जिलों में जा कर देखें कि वहां किस तरह से मधुमक्खियां इस काम को अंजाम दे रही हैं. अपने खेतों में और बागानों में मधुमक्खियों के डब्बे रख कर किसान घर आ कर बैठ जाते हैं. इस से उन की पैदावार बढ़ने लगी है. सब से ज्यादा असर प्याज और अनाज जैसी फसलों पर हुआ है. खेती की इस विधि में न ज्यादा फर्टीलाइजर देने की जरूरत है और न ही कुछ और. बस खेत व बागान में इन का बसेरा करने भर से पैदावार बढ़ने लगी है. यह सब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सर्वोत्तम कृषि विज्ञान केंद्र बासमती के वैज्ञानिकों ने कर दिखाया है. दरअसल, परागीकरण वाली फसलों पर यह विधि जादू का काम करती है. अनार के बागान में एक समय पर लगने वाले नर व मादा फूलों के परागों को उसी समय परस्पर फैलाने से यह कामयाब होने लगी है.
शहद से ज्यादा फायदा फसलों की पैदावार बढ़ने से हो रहा है.
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योजना
पंचायत भवनों में बैंक खुलेंगे
पटना : बिहार के सभी पंचायत भवनों में बैंकों की शाखाएं खोलने की मुहिम शुरू की गई है. राज्य सरकार ने सभी बैंकों को यह प्रस्ताव भेजा है. राज्य के ग्रामीण इलाकों में बैंकों की कमी है और सही जगह नहीं मिलने की वजह से कई?बैंक पंचायतों में अपनी शाखाएं नहीं खोल पा रहे हैं. सरकार ने बैंकों को यह सुझाव दिया है कि पंचायत भवनों में वे बैंक की शाखाएं खोल सकते हैं. राज्य में फिलहाल 236 पंचायत सरकारी भवन बन कर तैयार हैं. भारतीय रिजर्व बैंक का नियम कहता है कि 11000 लोगों की आबादी पर बैंक की 1 शाखा होनी चाहिए, लेकिन बिहार में 17000 लोगों की आबादी पर 1 बैंक की शाखा है. आरबीआई ने 13 मार्च 2017 तक 5000 से?ज्यादा आबादी वाले राज्य के 1640 गांवों में बैंकों की शाखाएं खोलने का लक्ष्य तय किया था, पर अभी तक केवल 78 शाखाएं ही खुल सकी हैं. बिहार के वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दकी कहते हैं कि गांवों में बैंकों की शाखाओं की कमी होने की वजह से गांव वालों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. राज्य सरकार शाखाएं खोलने के लिए बैंकों को हर तरह की सुविधा देने को तैयार है. इसी के तहत पंचायत भवनों में बैंकों की शाखाएं खोलने का आफर दिया गया है.
उम्मीद
दाल के दाम और ज्यादा घटने के आसार
नई दिल्ली : बीते साल 2016 में दाल का हंगामा जम कर मचा. लोग 200 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से दाल खरीदने पर भी मजबूर हुए. मगर साल खत्म होने तक दालों की हालत काफी सुधर गई. बंपर पैदावार ने दाल की हालत बेहतर कर दी है. अब किसान अरहर की अच्छी पैदावार के बाद उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 1384 रुपए प्रति क्विंटल या 27 फीसदी कम दामों पर बेचने पर मजबूर हो गए हैं. गौरतलब है कि सरकार ने वित्त साल 2015-16 के खरीफ सत्र के लिए अरहर का एमएसपी 5050 रुपए प्रति क्विंटल तय किया था. मगर 3666 रुपए प्रति क्विंटल की दर से फिलहाल अरहर थोक बाजार में बिक रही है. इस से पहले किसानों को मूंग की बिक्री में भी झटका लग चुका है. अरहर दाल के थोक भाव में अगले महीने और कमी आने की उम्मीद की जा रही?है. यकीनन इस से आम खरीदारों को सस्ती दाल मिल सकेगी, लेकिन किसानों को कम लाभ मिलने से दाल की खेती के प्रति निराशा होगी. बेशक सरकार ने वित्त साल 2015-16 के खरीफ सत्र के लिए अरहर की एमएसपी 5050 रुपए प्रति क्विंटल तय की थी, मगर कर्नाटक के गडक जिले में अरहर का थोक दाम घट कर 3666 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है. कर्नाटक सूबे के गुलबर्गा जिले में अरहर का थोक दाम 4572 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है. गौरतलब है कि सरकार ने जून 2016 में अरहर दाल का एमएसपी 4625 रुपए से बढ़ा कर 5050 रुपए प्रति क्विंटल किया था. उसी दौरान मूंग का एमएसपी 4850 रुपए से बढ़ा कर 5225 रुपए प्रति क्विंटल किया गया था. किसान सितंबर 2016 में मूंग की नई फसल आने के वक्त से ही उसे एमएसपी से कम दामों पर बेचने पर मजबूर हैं.
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात सूबों से अरहर की नई फसल जनवरी 2017 के दौरान आ जाएगी. इस नई फसल से थोक बाजार में अरहर के दामों में और ज्यादा कमी आ सकती है. पिछले साल सितंबर में सरकार ने देश में 20 लाख टन दाल का बफर स्टाक बनाने का फैसला किया था. खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक सरकार अब तक महज 6.95 लाख?टन दाल ही खरीद पाई है. सरकार की तरफ से दाल की खरीद बेहद सुस्त होने की वजह से किसान बाजार में कम दामों पर दाल बेचने पर मजबूर हैं. अब सुब्रमणियन समित ने दाल की एमएसपी 6000 रुपए प्रति क्विंटल करने की पुरजोर सिफारिश की है.
कमाल
अरविंद मलिक ने उगाया 4 किलोग्राम का गन्ना
मेरठ : गांव बधाईकलां, मुजफ्फरनगर के किसान अरविंद मलिक गन्ने की खास पैदावार के लिए जाने जाते?हैं. देशविदेश से भी लोग उन की गन्ना फसल को देखने के लिए आते हैं. अभी हाल में मुजफ्फरनगर में सब से अधिक वजनदार गन्ना पैदा करने के लिए उन्हें पहला पुरस्कार दिया गया. 4 किलोग्राम प्रति गन्ना वजन की फसल पैदा करने के लिए जिला अधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, जिला गन्ना अधिकारी मुजफ्फरनगर व निदेशक गन्ना शोध संस्थान मुजफ्फरनगर की उपस्थिति में उन्हें पहले पुरस्कार से नवाजा गया. यह पुरस्कार उन की नामौजूदगी में उन के छोटे भाई संजय मलिक ने प्राप्त किया. इस के अलावा राष्ट्रीय खाद्य योजना मिशन के तहत गन्ना प्रजनन संस्थान, करनाल के निदेशक डा. नीरज कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक व फार्म इंचार्ज डा. रवींद्र सिंह और डा. मीणा ने उन के खेतों का दौरा किया और उन के द्वारा किए गए की सराहना की.
मुहिम
भेड़बकरियों को लगेगा टीका
पटना : बिहार की तमाम भेड़ों और बकरियों को पीपीआर यानी गोट प्लेग का टीका लगाया जाएगा. राज्य के पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री अवधेश कुमार कुशवाहा ने दानापुर अनुमंडल के वेटनरी अस्पताल में पशु स्वास्थ्य पखवारे की शुरुआत करते हुए कहा कि राज्य में कुल 80 लाख, 52 हजार भेड़बकरियां हैं और उन सभी को मुफ्त में टीके लगवाए जाएंगे. इस के लिए गांवगांव में पशुपालकों को जागरूक किया जाएगा कि वे अपनी बकरियों और भेड़ों को टीका लगवाएं. उन के टीकाकरण का पूरा रिकार्ड भी रखा जाएगा. इस योजना को कामयाब बनाने के लिए जिला लेबल पर निगरानी की जाएगी.
गौरतलब है कि गोट प्लेग से भेड़ों और बकरियों की मौतें होती रही हैं, जिस से गरीब पशुपालकों को काफी नुकसान होता है. गोट प्लेग होने पर बकरियों और भेड़ों को तेज बुखार हो जाता है. नतीजतन वे सुस्त पड़ जाती हैं और उन्हें काफी छींकें आने लगती हैं. उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगती है और उन की आंखों, नाक और मुंह से गाढ़ा स्राव होने लगता है. गोट प्लेग भेड़ों और बकरियों की संक्रामक व छुआछूत वाली बीमारी है. यह मेरबिल वायरस के जरीए तेजी से फैलती है. यह जानलेवा बीमारी है. यह 4 महीने से ले कर 1 साल तक की भेड़ों और बकरियों पर बहुत तेजी से हमला करती है.
इजाफा
रंग ला रही है खेती की मुहिम खाद्यान्न उत्पादन की होगी रिकार्ड पैदावार
नई दिल्ली : 2 सालों तक लगातार सूखे के बाद बेहतर मानूसन रहने के कारण साल 2016-17 के दौरान कृषि उत्पादन में फिर तेजी लौटने और उत्पादन रिकार्ड स्तर यानी 27 करोड़ टन हो जाने की उम्मीद है. लेकिन नोटबंदी और बिक्री से कम मूल्य प्राप्ति की मार से किसानों को नजात मिलती नहीं दिख रही है. किसान अभी भी बेहाल हैं. चालू वित्तीय वर्ष में कृषि क्षेत्र वृद्धिदर बढ़ कर करीब 5 फीसदी होने का अनुमान है, जो पिछले साल 1.2 फीसदी ही थी. देश के अधिकांश हिस्सों में बेहतर मानसून के कारण 13.5 करोड़ टन के रिकार्ड खरीफ खाद्यान्न उत्पादन और चालू रबी सत्र में भारी उत्पादन होने की संभावना है. कृषि सचिव शोभना पटनायक ने कहा कि मौजूदा साल के दौरान कृषि क्षेत्र ने बेहतरीन प्रदर्शन किया?है. हम ने सूखे के सालों का सामना करने के बाद बेहतर मानसून देखा है. सामान्य तौर पर खरीफ उत्पादन काफी अच्छा रहा है और रबी की बोआई भी बेहतर है. हमें इस साल भारी उत्पादन होने की पूरी उम्मीद है.
हालांकि कृषि विशेषज्ञों ने कुछ नोटों को चलन से बाहर करने के रबी फसल के उत्पादन पर पड़ने वाले असर और संभावित रूप से सर्दियां कम रहने से गेहूं के उत्पादन पर होने वाले असर के बारे में चिंता जताई है.
उन्होंने कहा, हमारी 27 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने की योजना है, जबकि हमारा पिछला सब से अधिक उत्पादन फसल साल 2013-14 जुलाईजून में 26 करोड़ 50.4 लाख टन का हुआ था.
उन्होंने कहा कि तापमान में बढ़वार के कारण अगर पूरे देश भर में गेहूं की उत्पादकता में 3 फीसदी की कमी आती है, तो भी कृषि व सहायक क्षेत्रों की वृद्धि दर 5.3 फीसदी रहेगी.
कुछ बड़े नोटों का चलन प्रतिबंधित करने के खराब असर के बारे में पूछने पर शोभना पटनायक ने कहा कि इस का ज्यादा असर नहीं हुआ है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में उधारी की प्रणाली मजबूत रही है और साल दर साल किसानों में जूझने की क्षमता बढ़ी है.
उन्होंने कहा कि हमारे किसानों ने पिछले 2 सालों से सूखे का सामना किया है, लेकिन उस के बावजूद वे फिर से सामने आए हैं. मुझे नहीं लगता कि इस के कारण कोई प्रभाव हुआ है.
इस के उलट किसान संगठनों के साथसाथ पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने कुछ नोटों को चलन से बाहर करने के बुरे असर के बारे में चिंता जताई है. उन का कहना है कि इस के कारण किसान अपनी रबी फसल के लिए गुणवत्ता वाले बीजों और उर्वरकों को खरीद नहीं पाए और मांग नदारद होने से वे अपनी फसलों को बेचने में समस्या का सामना कर रहे हैं.
चालू वर्ष के खरीफ सत्र में भारी उत्पादन होने और रबी सत्र में अच्छी फसल होने की उम्मीदों के विपरीत घरेलू और वैश्विक जिंसों की कीमतें कमजोर रहने के साथ बिक्री से होने वाली कम मूल्य प्राप्ति के कारण किसानों की स्थिति दयनीय बनी हुई है.
सरकारी अनुमान के मुताबिक गेहूं उत्पादन 8.6 करोड़ टन से बढ़ कर 9 करोड़, 35 लाख टन हो गया. लेकिन एफसीआई की खरीद में भारी कमी आई और साल के अंत तक गेहूं और इस के उत्पादों की कीमतें बढ़ने लगीं. सरकार ने घरेलू आपूर्ति को बढ़ाने के लिए गेहूं पर आयात शुल्क को खत्म कर दिया.
साल के दौरान सरकार ने देश भर में सफलतापूर्वक ऐतिहासिक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून एनएफएसए को लागू किया.
किसानों की आय को बढ़ाने के लिए नई फसल बीमा योजना की शुरूआत की गई और देश की 585 मंडियों को इलेक्ट्रानिक व्यापार मंच से जोड़ने वाले ‘ई नाम’ जैसे तमाम कारगर कार्यक्रमों की घोषणा की गई.
इस साल के बजट में सरकार ने कृषि कर्ज की सीमा को 50,000 करोड़ रुपए बढ़ाते हुए चालू वित्तवर्ष के लिए 9 लाख करोड़ कर दिया और कृषि क्षेत्र में तमाम पहलकदमियों के वित्तपोषण करने के लिए सभी कर लायक सेवाओं पर 0.5 फीसदी का कृषि कल्याण उपकर सेस लगाया.
मशहूर कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने इस नई योजना का स्वागत किया. लेकिन इसे सही तरह से लागू करने पर जोर दिया. स्वामीनाथन का कहना है कि सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी के तहत उत्पादन लागत से 50 फीसदी अधिक का भुगतान करना चाहिए.
वजूद
किसान मेले का मतलब किसानों से है
मुजफ्फरपुर : ‘कृषि यांत्रिकरण मेले में जब किसान ही मौजूद नहीं हों तो इस मेले का कोई मतलब नहीं रह जाता है. अगर मुझे यह पहले से पता होता तो शायद उद्घाटन समारोह में नहीं आती.’ ये बातें दिसंबर महीने में मुशहरी स्थित प्रसार प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित जिला स्तरीय कृषि यांत्रिकरण मेले के उद्घाटन के दौरान बोचहां विधायक बेबी कुमारी ने कहीं. कृषि विभाग सिर्फ समाचारपत्रों के माध्यम से किसानों को सूचना देता है, पर जो किसान समाचार पत्र नहीं पढ़ते हैं, उन्हें इस आयोजन की जानकारी नहीं हो पाती है और वे सरकारी लाभ से वंचित हो जाते हैं. विभाग को हर किसान तक सूचना पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए. ऐसे आयोजनों से किसानों का भला नहीं हो सकता. किसान नेता वीरेंद्र राय ने भी ऐसे आयोजन पर नाराजगी जताई. इस तरह की यह पहली घटना नहीं है इस प्रकार के वाकिए पहले भी होते रहे?हैं. किसान मेले में कई बार किसान कम अधिकारी ज्यादा होते हैं.
एक बार ‘फार्म एन फूड’ की?टीम के साथ भी ऐसा ही वाकिया हुआ. बड़े स्तर पर कृषि मेला लगना था, जिस की जानकारी इंटरनेट पर कृषि विभाग की साइट पर दी गई थी. लेकिन जब टीम दिल्ली से 140 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर में मेले की जगह पर पहुंची, तो वहां कोई मेला नहीं लगा था. दिए गए फोन नंबर पर बात की गई तो संबंधित अधिकारी ने बताया कि कृषि मेला टल गया?है जिस की जानकारी विभाग द्वारा नेट पर अपडेट भी नहीं की गई थी.
पहल
मरे हुए पशुओं से बन रही समाधि खाद
रतलाम : खेती में रासायनिक के बाद जैविक खाद के इस्तेमाल के उदाहरण सैकड़ों आते हैं. अब समाधि खाद का कांसेप्ट भी आ गया है. रतलाम के बांगरोद में मरे हुए जानवरों को खाद में बदल कर खेती में इस्तेमाल किया जा रहा है और यही खाद मुंबई तक एक्सपोर्ट भी की जा रही है. गांव में 5 सालों में 655 मवेशियों की समाधि बना कर उन्हें खाद में बदला जा चुका है. इस नई सोच के साथ खेती में ज्यादा उत्पादन और लाभ की उम्मीद जगी है. गांव की श्रीराम गोशाला से 17 फरवरी 2011 से यह सिलसिला शुरू हुआ. गोशाला में पहले मवेशी की मौत होती, तो शव गांव के बाहर छोड़ दिया जाता था. गांव के लोगों को यह दुर्गति अच्छी नहीं लगी. इसी समय गायत्री परिवार मंदसौर की एक टीम गांव में आई. उस ने मवेशियों की समाधि बनाने का सुझाव दिया. गोशाला से जुड़े लोगों को जनअभियान परिषद के माध्यम से समाधि खाद बनाने का आइडिया मिला. 2011 में पहली समाधि बनाई. इसे एक साल बाद खोला. नमूने लैब में टेस्ट कराए तो बेहतर नतीजे मिले. इस के बाद जब भी मवेशी की मौत होती, उसे गड्ढे में दफना दिया जाता. इसी तरह शुरू हुआ समाधि खाद बनाने का सिलसिला. बांगरोद में 51 किसानों की एक समिति है.
समाधि खाद से तैयार गेहूं 5000 रुपए प्रति क्विंटल और तैयार आटा 6000 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से बेचा गया. समाधि खाद से तैयार भूसा मवेशियों को खिलाया गया तो उन के दूध से तैयार घी 1000 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिका. गोशाला से हर साल 1700 बैग खाद 500 एकड़ खेती में इस्तेमाल के लिए बेची गई. बांगरोद में जब भी किसी मवेशी की मौत होती हैं, उसे 4 फुट गहरे गड्ढे में दफना दिया जाता है. गड्ढे में गोबर, नमक, बेसन, गुड़ आदि डाला जाता है और बंद कर दिया जाता है.
मुहिम
सरकार खरीदेगी दाल
नई दिल्ली : कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने गुरुवार को कहा कि अगर दालों के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे जाते हैं, तो सरकार किसानों से एमएसपी पर दालों की खरीद करेगी. केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार ने किसानों को समर्थन मूल्य पर दलहनों की बिक्री को सुनिश्चित करने के प्रावधान किए हैं. प्रावधान के तहत जहां कहीं भी दलहन का मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम होता है, वहां भारत सरकार किसानों को समर्थन मूल्य सुनिश्चित करेगी. इस के अलावा उन्होंने कहा कि सरकार ने 20 लाख टन दलहनों का बफर स्टाक बनाने का भी फैसला किया है, ताकि जब बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो लोगों को सस्ते दर पर दलहन उपलब्ध कराया जा सके.
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है, ताकि आम लोगों को दलहन के पोषण तत्त्वों के बारे में जागरूक किया जा सके.
सिंह ने कहा कि सरकार ने दलहन की खेती और उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए इस के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है. उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष, 2016 में कई सारे कदम उठाए गए हैं, ताकि देश में दलहन फसलों के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाया जा सके.
सरकार ने साल 2016-17 के लिए 200 लाख टन दलहन उत्पादन का लक्ष्य तय किया है, जबकि साल 2017-18 के लिए यह लक्ष्य 210 लाख टन और साल 2020-21 के लिए 240 लाख टन है. राधा मोहन सिंह ने कहा कि भारतीय दलहन शोध संस्थान, कानपुर के साथ 10 कृषि विश्वविद्यालयों के क्षेत्रीय केंद्रों पर 20.39 करोड़ रुपए की लागत से अतिरिक्त ‘ब्रीडर सीड’ उत्पादन कार्यक्रम शुरू किया गया है.
तरीका
ईको फ्रेंडली पद्धति से रोकें दलहनी फसलों का नुकसान
नई दिल्ली : दलहनी फसलों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अब भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान पर्यावरणीय अनुकूलन पद्धति से दवाओं का निर्माण करने की ओर अग्रसर है. वैज्ञानिकों की मानें तो इस से 30 फीसदी तक नुकसान को बचाया जा सकता है. ईको फ्रेंडली पद्धति से फसलों को बदलते मौसम व बीमारियों और कीड़ों के प्रभाव से बचाया जाएगा. किसानों को इस का सीधा असर और फायदा होगा. कम नुकसान और ज्यादा पैदावार से उन की आमदनी बढ़ेगी. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान की राष्ट्रीय कार्यशाला में इन बातों को वैज्ञानिकों ने सामने रखा. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान में संस्थान व?भारतीय पादप विकृति विज्ञान सोयाइटी की ओर से आयोजित 2 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में शिरकत करते हुए वैज्ञानिकों ने ‘पादप रोग प्रबंधन के लिए पर्यावरण अनुकूल पद्धति, वर्तमान प्रवृति और संभावनाएं’ विषय पर अपने विचार रखे. एनडीयूएटी, फैजाबाद के कुलपति प्रो. अख्तर हसीब ने मौजूद वैज्ञानिकों से कहा कि पादप रोग प्रबंधन के लिए पर्यावरण अनुकूल पद्धति पर एकजुट हो कर शोध करें. संस्थान के निदेशक डा. एनपी सिंह ने कहा कि पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी को और ज्यादा प्रभावी बनाने की जरूरत है.
खास जानकारी : भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने मौसम और कीड़ों से बचाव के बारे में जानकारी दी. वैज्ञानिकों की मानें तो मसूर की फसल को झुलसा रोग और चने की फसल को सूखा रोग से सब से ज्यादा नुकसान होता?है. इस समय उड़द और मूंग में पीला चित्तीदार रोग, राजमा व लोबिया की फसल में कर्ल रोग लग रहा है. इन की रोकथाम के लिए वैज्ञानिकों ने अब ऐसे वायरस खोजें हैं, जिन के माध्यम से रोग उत्पन्न करने वाले कीड़ों को मारा जा सकेगा. इन में मुख्य रूप से पहला वायरस एनपीवी है, जो फलीभेदक कीड़े को खत्म करने में कारगर है. वैज्ञानिकों का कहना?है इस के स्प्रे करने भर से ही कीड़े की मौत हो जाती?है. इसी तरह बीटी वायरस, जो जमीन में पाया जाने वाला बैक्टीरिया है, वह भी कीड़ें को मारता है. निदेशक, आईआईपीआर की मानें तो किसान हर साल पूरी फसल में 20 से 30 फीसदी तक का नुकसान सहते?हैं. उन्हें कम से कम नुकसान हो और ज्यादा से?ज्यादा उन की आमदनी बढ़े, इस के लिए संस्थान के वैज्ञानिक लगातार नई खोज करने में जुटे हुए हैं.
योजना
3.66 करोड़ का फसलबीमा
नई दिल्ली : साल 2016 में खरीफ मौसम के दौरान 3.66 करोड़ किसानों ने फसल बीमा कराया. गौरतलब है कि पिछले साल फसलबीमा कराने वाले किसानों की तादाद महज 2.94 करोड़ थी. केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के मुताबिक भारत में फसलबीमा योजना को अपनाने वाले किसानों की तादाद में काफी तेजी से इजाफा दर्ज किया जा रहा है. राजधानी दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान राधामोहन सिंह ने कहा कि एनडीए सरकार के 30 महीने के कार्यकाल में कृषि के मामले में तमाम अहम काम किए गए?हैं. फसलबीमा योजना इन में सब से ज्यादा खास है. कृषि मंत्री ने कहा कि फसलबीमा योजना ने किसानों को फसल सुरक्षा की गारंटी दी?है. पहले कुदरती आपदाओं के कारण फसल बरबाद होने पर किसान लाचार हो जाते थे, मगर अब उन के नुकसान की भरपाई हो रही है. कृषि मंत्री राधामोहन सिंह की बातें सतही तौर पर किसानों की बहुत भलाई करती नजर आती?हैं, मगर हकीकत की कसौटी पर फसलबीमा योजना से किसान किस हद तक फायदा ले पाएंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
अनुदान
किसानों को गोदाम बनाने में मदद
पटना : बिहार में इच्छुक किसानों को अनाज गोदाम बनाने में होने वाले खर्च का 25 फीसदी अनुदान दिया जाएगा. राज्य में अनाज भंडारण के लिए गोदामों की कमी को दूर करने के लिए किसानों को गोदाम बनाने की लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. उद्योग मंत्री जय कुमार सिंह ने बताया कि धान और गेहूं के भंडारण के लिए गोदामों की ज्यादा जरूरत है. इस के लिए विभाग की ओर से अधिकतम 5 करोड़ रुपए का अनुदान मिलेगा. 5 करोड़ रुपए का अनुदान 20 करोड़ या उस से अधिक लागत वाले गोदामों को बनाने के लिए दिया जाएगा.
सलाह
अनाज भंडारण की जानकारी
मुंगेर : सदर प्रखंड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में केंद्रीय भंडारण निगम की ओर से कृषकों के लिए आयोजित 2 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के तहत किसानों को सुरक्षित अन्न भंडारण की बारीकियों के बारे में बताया गया. वैज्ञानिकों ने किसानों को सुरक्षित भंडारण के बारे में बताते हुए कहा कि लंबे समय तक अन्न के भंडारण से पहले कई प्रकार की सावधानियां बरतनी होती हैं. इस में सब से पहले देखना होता?है कि अनाज में नमी की मात्रा सही है या नहीं. यदि नमी की मात्रा ज्यादा हो तो अनाज को सुखाना बेहद जरूरी होता?है.
इस के बाद जिस कमरे में अनाज को रखना होता?है, उस की अच्छी तरह साफसफाई करनी चाहिए. इस के बाद कमरे में डीडीवीपी या अन्य कीटनाशक का छिड़काव करना चाहिए. इस के बाद अनाज की पुरानी बोरी से निकाल कर नई बोरी में डालना चाहिए, क्योंकि पुरानी बोरी में रखे अनाज में कीड़े लगे हो सकते हैं. यहां इस बात का खयाल रखें कि नई उपज को नई बोरी में ही रखें. यदि बोरी पुरानी हो तो उसे धो कर इस्तेमाल करें. इस के बाद गोदाम के फर्श की नमी को पूरी तरह से सुखा लें, क्योंकि नमी के कारण अनाज में कीड़े लगने का खतरा ज्यादा होता है. कमरे की नमी को खत्म करने के लिए डनेज का इस्तेमाल करें. इस के लिए पोलीथीन या बांस की चटाई का इस्तेमाल करें. जहां तक मुमकिन हो धूप वाले दिनों में गोदामों की खिड़कियों को खोल कर रखें. अनाज में लगातार हवा लगने से कीड़े लगने की संभावना कम हो जाती?है. इस के साथ ही अनाज को चूहों से बचाएं, क्योंकि यह देखा जाता?है कि अनाज के उत्पादन से ले कर उस के उपभोग तक में तकरीबन 25 फीसदी अनाज बेकार हो जाता है.
उम्मीद
थाली में और बढ़ेगी दाल
कानपुर : अब भोजन की थाली में दाल की कमी नहीं रहेगी, क्योंकि यूरिया की कालाबाजारी रुकने व मौसम के साथ देने से इस बार देश में दलहनी फसलों की रिकार्ड उत्पादन की स्थिति बनी है. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान की मानें तो देश में दालों की उपलब्धता का औसत प्रतिव्यक्ति रोजाना 38 ग्राम से बढ़ कर 42 ग्राम तक पहुंच सकता है.
दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए नवीन शोध व खेती की तकनीकी पर काम कर रहे भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान ने आकलन कर नतीजे निकाले हैं कि इस बार चना, अरहर व दूसरी दालों के उत्पादन में रिकार्ड बढ़ोतरी होने जा रही है. ऐसा मौसम के साथ देने के कारण तो हो ही रहा है, साथ ही किसानों द्वारा दलहनी खेती में नई तकनीक अपनाने और फसलों को भरपूर खाद मिलना भी इस की वजह है. आंकड़े बताते हैं कि कुल दालों में 40 से 50 फीसदी चने की दाल होती है. अरहर का उत्पादन व प्रयोग भी ज्यादा है. इस बार दोनों के ही उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि की उम्मीद है. ऐसे में देश दालों की जरूरत के लक्ष्य के बहुत नजदीक पहुंचने वाला है.
डा. एनपी सिंह, निदेशक भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान ने कहा कि हम दालों की जरूरत के लक्ष्य के काफी करीब पहुंच गए हैं. अब दालों का आयात कम करना होगा. मौसम की मार सह कर भी उत्पादन देने वाली प्रजातियां निकाली जा रही हैं.
किसानों को छूट पर मिलने वाली यूरिया की कालाबाजारी रोकना कारगर साबित हो रहा है. सरकार ने यूरिया नीम कोटेड की, जिस से यूरिया में हो रही दलाली रुकी है. पहले तकरीबन 40 फीसदी किसानों के पास पहुंचने से पहले ही यूरिया गायब हो जाती थी, लेकिन इस बार किसानों को काम लायक यूरिया मिल रही है.
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मुहिम
राजस्थान में होगी पिस्ते की खेती
जयपुर : कृषि विभाग ने राजस्थान में पिस्ते की खेती की संभावनाओं के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं और इस के लिए विभाग ने हार्टीकल्चर के 4 एक्सपर्ट की एक कमेटी भी बना दी है. अब जल्द ही यह कमेटी टर्की जाएगी और वहां होने वाली पिस्ते की खेती के बारे में जानकारी जुटाएगी.
इस बारे में कृषि विभाग ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मंजूरी के लिए फाइल भेज दी है और बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने सैद्धांतिक रूप से अपनी मंजूरी भी दे दी है. कृषि विभाग इस से पहले बीकानेर में पिस्ते की खेती के अनुकूल वातावरण और मिट्टी की रिपोर्ट मंगा चुका है. विभाग पहले बीकानेर में प्रायोगिक तौर पर पिस्ते की खेती करेगा.
उल्लेखनीय है कि भारत में अभी पिस्ते की खेती कहीं पर भी नहीं हो रही है. दुनिया में करीब 7 देशों में ही पिस्ते की खेती होती है. ऐसे में अगर राजस्थान का कृषि विभाग अपने प्रयासों में कामयाब हो जाता है तो यह प्रदेश के साथसाथ देश के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी.
इजाफा
अब प्रति व्यक्ति 500 ग्राम दूध
पटना : केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा है कि साल 2020 तक देश में प्रति व्यक्ति 500 ग्राम दूध की उपलब्धता हो जाएगी. फिलहाल प्रति व्यक्ति के लिए 337 ग्राम दूध मौजूद है. इस के लिए एकसाथ कई योजनाओं की शुरुआत की गई?हैं. देसी नस्ल के दुधारू पशुओं को बचाने की योजना को जोरशोर से चालू किया गया है. नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड के सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए राधामोहन सिंह ने कहा कि पिछले 15 सालों से दूध उत्पादन के मामले में भारत पहले नंबर पर?है और इस का पूरा श्रेय छोटेछोटे दूध उत्पादकों को जाता है. देश भर में राष्ट्रीय गोकुल मिशन के जरीए दूध उत्पादन बढ़ाने के कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. साल 2014 से 2017 तक इस योजना पर 500 करोड़ रुपए खर्च किए जाने?हैं. नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड की योजनाएं साल 2019 तक पूरी होंगी. इन योजनाओं पर 2242 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे. दुनिया भर में दूध उत्पादन की बढ़ोत्तरी दर 2 फीसदी है, वहीं भारत में यह दर 4 फीसदी?है. साल 2015-16 में तो यह दर 6 फीसदी रिकार्ड की गई थी.
मदद
फफूंदी मिटाएगा कृषि विभाग
मेरठ : फसलों पर कहर बरपाने वाली फफूंदी को नष्ट करने के लिए कृषि विभाग ने कमर कस ली है. इस में किसानों का भी सहयोग लिया जाएगा. इस में फफूंदी जनित रोगों से बीजों की बोआई के समय ही निबटने की योजना बनाई गई है. इस के लिए रसायनों व कीनाशकों पर कृषि विभाग किसानों को अनुदान भी देगा. खेतों में तैयार हो रही फसलों पर फफूंदी जनित रोगों का हमला होने के बाद इन से निबट पाना बड़ा मुश्किल होता है. कंडुआ, करनाल बंट और झुलसा जैसे फफूंदी जनित रोगों से निबटने के लिए रसायनों का सहारा लिया जाता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो जाती है.
इस से फसलों के साथसाथ किसानों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है. अधिक खर्च होने के कारण अधिकांश किसान रसायनों का छिड़काव नहीं करते, जिस से ये रोग फसलों को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं.
फसलों को इन रोगों से बचाने के लिए शासन ने कृषि विभाग को युद्धस्तर पर अभियान छेड़ने के निर्देश दिए हैं. हापुड़ के जिला कृषि रक्षा अधिकारी डा. सतीश मलिक ने बताया कि फफूंदी जनित रोगों से निबटने के लिए बीजशोधन सब से कारगर तरीका?है. कृषि अधिकारियों ने बताया कि गेहूं में करनाल बंट और कंडुआ रोग से हर साल बहुत फसल बरबाद होती है, इसलिए पोलियो उन्मूलन की तर्ज पर इन रोगों के खिलाफ किसानों के साथ मिल कर अभियान छेड़ा जा रहा है. बीजशोधन कर के इन रोगों पर पूरी तरह नियंत्रण पाया जा सकता है. इस के लिए ट्राइकोडर्मा, बैसियान बेवेरिया, सूडोनोमास नामक बायोपेस्टीसाइड का इस्तेमाल करना चाहिए. इस के लिए किसानों को 50 फीसदी का अनुदान दिया जा रहा है. बीजशोधन के लिए इस्तेमाल होने वाले थीरम और कार्बांडाजिम रसायनों पर भी अनुदान दिया जा रहा है. इस प्रयास के सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं.
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तबाही
नोटबंदी से किसानों का बंटाधार
नागपुर : नोटबंदी के फैसले ने विदर्भ के संतरा किसानों का बंटाधार कर दिया. नोटबंदी से पहले जो संतरे 30000 रुपए प्रति टन बिक रहे थे, अब नकदी की कमी के चलते उन की कीमतें कम मिल रही हैं. अच्छी फसल और कमाई की उम्मीद कर रहे किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया. नोटबंदी के बाद संतरे की फसल की कीमत 30000 रुपए प्रति टन से गिर कर सीधे 10000 रुपए प्रति टन हो गई. संतरा उत्पादक किसानों की हालत मरता क्या न करता वाली हो गई. वे ज्यादा दिनों तक रुक नहीं सकते थे, क्योंकि पेड़ से तोड़े जाने के बाद 5 से 7 दिनों के अंदर संतरे का इस्तेमाल हो जाना चाहिए, वरना वे खराब होने लगते हैं. इसलिए कम कीमत में बेचाने पड़ रहे हैं. अमरावती जिले के संतरा उत्पादक ताज खान 150 एकड़ जमीन पर संतरे की खेती करते हैं. वे कहते हैं कि नोटबंदी के कहर से संतरा बाजार धीरेधीरे उबरने लगा है. 10 दिन पहले की तुलना में संतरे की कीमतें औसतन 25000 रुपए प्रति टन तक पहुंची हैं. ताज खान कहते हैं कि नोटबंदी से पहले संतरे का लेनदेन पूरी तरह से नकद में हुआ करता था, पर अब चेक से भुगतान होने लगा है, क्योंकि किसी के पास पैसा ही नहीं है.
बेबसी
हार कर नहर में कर डाली खेती
गोंडा : उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों की तरह गोंडा जिले की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं?है. जिले में मौजूद नहरों के हाल एकदम बेहाल हैं. कई सालों से नहरों में पानी नहीं मिलने से नाराज किसानों ने हार कर नहरों में ही खेती करना चालू कर दिया है. गोंडा के तरबगंज व कटरा इलाकों में ऐसी तमाम नहरें हैं, जिन में रबी की आलू, मटर, सरसों व गेहूं जैसी फसलें उगाई जा रही हैं. किसानों का कहना है कि अपने खेतों की सिंचाई के लिए उन्होंने अपनी महंगी जमीनें मुहैया कराईं. नहरें तो बनीं, मगर कई साल गुजरने के बावजूद नहरों में पानी नहीं छोड़ा गया. किसानों का कहना?है कि वे तो खाली पड़ी नहरों की जमीनों का सही इस्तेमाल कर रहे हैं. सरयू नहर परियोजना का जिले में बुरा हाल है. यों तो यह योजना पिछले 38 सालों से पूर्वांचल के 10 जिलों में चल रही?है, पर अभी तक इस की नहरें ठप पड़ी हैं. 50 से ज्यादा नहरें तो ऐसी हैं, जिन की खुदाई के बाद से उन में बिलकुल पानी नहीं छोड़ा गया. कटरा की सवांगपुर, छिटनापुर व सोनहारा की नहरें इसी किस्म की नहरें हैं. सरयू नहर परियोजना में दर्जनों नहरें हकीकत में सूखी हैं, पर कागजों में बाकायदा चल रही हैं.
कामयाबी
कृषि मंत्री ने गिनाए कारगर काम
नई दिल्ली : पिछले दिनों नई दिल्ली में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कृषि मंत्री ने केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले कामों का बढ़चढ़ कर बखान किया. उन्होंने बताया कि कृषि मंत्रालय ने जमीन की उर्वरा कूवत की जांच के लिए सायल हेल्थ कार्ड योजना पर जोर दिया है. इस योजना के तहत 12.82 करोड़ कार्ड बनाए जाते?हैं. इन में से अब तक 4.31 करोड़ कार्ड तैयार हो चुके?हैं और 4.25 करोड़ कार्ड किसानों को बांटे जा चुके हैं. 2016 में 2.33 करोड़ मिट्टी के नमूने जमा किए गए हैं, जिन की जांच की जा रही है. कृषि मंत्री ने कहा कि भारत में इस बीते साल में दूध के उत्पादन में 6.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई?है और दूध की बिक्री में भी इजाफा हुआ?है. नवंबर 2016 में रोजाना दूध की बिक्री 64.55 करोड़ रुपए की थी, जो दिसंबर 2016 में रोजाना 74.25 करोड़ रुपए तक पहुंच गई.
कृषि मंत्री ने बताया कि पिछले साल की तुलना में 2016 में कई सूबों में बीजों की बिक्री में भी इजाफा हुआ है. खासकर महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश सूबों में बीजों की बिक्री ज्यादा बढ़ी है. उन्होंने खेती के क्षेत्र में उठाए गए अन्य कदमों का जिक्र करते हुए कहा कि फसलों के समर्थन मूल्यों में इजाफा किया गया है.
मधुप सहाय, भानु प्रकाश व बीरेंद्र बरियार
सवाल किसानों के
सवाल : गेहूं के खेत में नहर से सिंचाई करते?हैं, लेकिन इस से पौधे पीले पड़ जाते?हैं. क्या करूं?
-एसएमएस द्वारा
जवाब : नहर की सिंचाई में खेत में काफी पानी भर जाता है, जबकि गेहूं को हलकी सिंचाई की जरूरत होती है. ज्यादा पानी देने से पौधे पीले पड़ जाते?हैं, लिहाजा खयाल रखें कि गेहूं के खेत में?ज्यादा पानी न भरने पाए.
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सवाल : गन्ना कटने के बाद जो पत्तियां खेत में रह जाती?हैं, उन्हें खेत में मिलाने के लिए किस मशीन का इस्तेमाल करना चाहिए? क्या इस मशीन से गन्ने की जड़ें भी जमीन में मिल जाती?हैं? यह मशीन करीब कितने रुपए की मिलेगी?
-एसएमएस द्वारा
जवाब : गन्ने की पत्तियों को खेत में मिलाने से दीमक वगैरह का प्रकोप हो सकता है. गन्ने की कटाई के बाद गन्ने के?ठूंठों को जमीन से मिला कर काटने के लिए स्टबल रोवर के नाम से यंत्र आता?है. इस से?ठूंठों को काट कर पत्तियों को खेत में बिछा दिया जाता है, जिस से कल्ले ज्यादा निकलते हैं. यह यंत्र 25000 रुपए में मिलता है.
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सवाल : डालर चने के पौधे पीले पड़ रहे हैं, क्या करूं?
-एम पाटीदार, एसएमएस द्वारा
जवाब : चने के पौधे खेत में उकठा का प्रकोप होने पर या खेत में जरूरत से ज्यादा नमी होने पर पीले पड़ते हैं. चने की बोआई हमेशा मेंड़ों पर करें. यदि उकठा का प्रकोप दिखाई दे तो किसी फफूंदीनाशक दवा का इस्तेमाल करें.
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सवाल : भिंडी बोने का सही समय क्या?है?
-अजीत कुमार, एसएमएस द्वारा
जवाब : भिंडी बोने का सही समय 15 फरवरी से 15 मार्च के बीच है.
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सवाल : एलोवेरा की खेती व बीज की जानकारी दें?
-एसएमएस द्वारा
जवाब : ऐलोवेरा की खेती सिंचित व असिंचित दोनों तरह की जमीन में की जाती?है. इस में पौधे से पौधे की दूरी 40 सेंटीमीटर व लाइन से लाइन की दूरी 50 सेंटीमीटर रखते?हैं. 1 हेक्टेयर में इस के करीब 50000 पौधे लगते?हैं. इस की रोपाई जुलाईअगस्त में की जाती?है. इस के पौधे सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौ. वि. वि. मेरठ और सुशीला देवी हर्बल मार्डन, ऋषिकेश से हासिल किए जा सकते?हैं.
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सवाल : अरहर के पौधों में कहीं फूल लगे?हैं, कहीं फलियां लग रही?हैं, लेकिन आजकल कोहरा छाया रहता?है. क्या कोहरे से फसल को कोई नुकसान होगा? अगर हां, तो बचाव के लिए क्या करना होगा.
-एसएमएस द्वारा
जवाब : जब अरहर में फूल बनना बंद हो जाए, तभी खेत में हलकी सिंचाई कर के कोहरे व पाले से फसल को बचाएं या खेत के चारों ओर आग सुलगा दें. अगर मुमकिन हो तो किसी कृषि वैज्ञानिक से खेत की जांच कराएं.
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