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एक और मित्र
प्रिया सोचने लगी, ‘कितना सही कहती है वीरा. स्वयं मैं ने भी तो भैया के ऊपर हमेशा यही विवशता थोपी है.
Digital Team
,
Jan 1, 1970
भाग - 1
भैयाभाभी को सदैव रिश्ते की छड़ी से दबाए रखने वाली प्रिया को किस ने दिलाई उस के फर्जों की याद कि जिस से प्रिया के भैया को एक और मित्र भी मिल गया.
भाग - 2
प्रिया को भाभी का यह उपेक्षित व्यवहार कुछ अच्छा नहीं लगा. सोचने लगी कि आखिर वह रोजरोज तो मायके आती नहीं.
भाग - 3
वीरा और भाभी के बहुत जोर देने पर वह बाहर आ कर बैठ तो गई पर उस का मन अनमना ही रहा.
भाग - 4
रिश्ते चुने नहीं जा सकते पर मित्र बनाना हमारे अपने अधिकार में है. रिश्ते हमारे शरीर के साथ जन्म लेते हैं जबकि मित्र हमारा मन स्वयं चुनता है.
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