हम जब छोटे थे तो हमारे ढेर सारे विवाहयोग्य चाचाजी थे. तब हमारा पसंदीदा दिन होता था जब हम अपने किसी चाचाजी के लिए भावी चाची देखने जाते थे. तब शरबत, बिस्कुट, समोसे और बर्फी ही आमतौर पर परोसे जाते थे. हमें यह सब खानापीना तो भाता ही था, उस से भी अच्छा लगता था भावी चाचीजी के पास बैठना. हम तो लड़की वालों के घर जाते ही, भावी चाचीजी के पास पहुंच जाते थे. अब सच कहें तो हमें तो सब ही अच्छी लगती थीं पर फिर भी एकाध बार लड़की चाचाजी को पसंद नहीं आती थी और एकाध बार लड़की वाले ही रिश्ते से मना कर देते थे.

ऐसे ही एक मौके पर हम ने पाया कि जलपान बाकी सब जगह से ज्यादा ही अच्छा था. कचौड़ी, समोसे, सैंडविच, गुलाबजामुन, बर्फी, रसगुल्ले, कई तरह के बिस्कुट और नमकीन. यहां तक कि शरबत के साथसाथ कैंपा कोला भी था. सबकुछ बहुत स्वादिष्ठ भी था. सो, न सिर्फ हम ने बल्कि चाचाजी ने भी खूब खायापिया, हमारे मातापिताजी ने सदा की तरह बस थोड़ा सा कुछ लिया.

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हमें तो भावी चाची अच्छी ही लगनी थीं. पर जब हम वापस आ रहे थे तो चाचाजी ने पिताजी से कहा कि उन्हें लड़की पसंद नहीं है. इस पर पिताजी ने जिन आग्नेय नेत्रों से उन्हें घूरा, वह हम आज तक नहीं भूल पाए. चाचाजी की एक नहीं चली. लड़की वालों से कह दिया गया कि लड़की पसंद है. पिताजी के अनुसार, यदि चाचाजी को लड़की पसंद नहीं थी तो उन्हें लड़की वालों के यहां प्लेट भरभर कर खाना नहीं चाहिए था.

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