लेखिका- आशा शर्मा

दादी अकसर दादाजी से कहा करती थीं कि जिंदगी में एक यार तो होना ही चाहिए. सुनते ही दादाजी बिदक जाया करते थे. “किसलिए?” वे चिढ़ कर पूछते. “अपने सुखदुख साझा करने के लिए,” दादी का जवाब होता, जिसे सुन कर दादाजी और भी अधिक भड़क जाते.“क्यों? घरपरिवार, मातापिता, भाईबहन, पतिसहेलियां काफी नहीं हैं जो यार की कमी खल रही है. भले घरों की औरतें इस तरह की बातें करती कभी देखी नहीं. हुंह, यार होना चाहिए,” दादाजी देर तक बड़बड़ाते रहते. यह अलग बात थी कि दादी को उस बड़बड़ाहट से कोई खास फर्क नहीं पड़ता था. वे मंदमंद मुसकराती रहती थीं.

Tags:
COMMENT