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लेखिका-डा. रंजना जायसवाल

‘‘क्या हुआ, क्या हुआ. मेरा मयंक ठीक तो है न?’’ ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है. वह ठीक है, खतरे से बाहर है. आप जल्द से जल्द यहां आ जाएं.’‘‘जी, मैं अभी निकलता हूं. एकसवा घंटे में मैं आप के पास पहुंच जाऊंगा. तब तक आप उस का ध्यान रखें. थैंक्यू मैम, मैं आप का एहसान जीवनभर नहीं भूलूंगा.’’

‘‘वैलकम,’’ मुग्धा अब तक उस आवाज को पूरी तरह पहचान चुकी थी. उस ने किसी तरह से अपनेआप को इतनी देर तक संभाल रखा था. इतने सालों बाद उस का अतीत एक बार उसे पुकार रहा था. वह अतीत, जिसे वह न जाने कब का भूल चुकी थी. सच कहते हैं लोग, इंसान कुछ भी कर ले पर अपने अतीत से नहीं भाग सकता.

सोचतेसोचते न जाने कब मुग्धा की आंख लग गई, तभी नर्स की आहट की आवाज को सुन कर उस की नींद खुल गई. ‘‘डाक्टर साहब, वह जो ऐक्सीडैंट केस आया था, उस के घर वाले आ गए हैं. आप से मिलना चाहते हैं.’’

मुग्धा ने अपनेआप को संभाला और वार्ड की तरफ चल पड़ी. आज इतने वर्षों बाद उस का अपना अतीत उस के सामने आ कर खड़ा हो गया था. यादों के  झरोखों पर आज फिर किसी ने दस्तक दे दी थी. न चाहते हुए भी मन उस की तरफ खिंचता चला गया. वे वही आंखें थीं जिन्होंने मुग्धा को सालोंसाल सोने नहीं दिया. सालोंसाल वे आंखें मुग्धा का पीछा करती रहीं, पर उन आंखों की वह कशिश, चेहरे का वह नूर जिस पर न जाने कितनी लड़कियां मरती थीं, न जाने कहां गायब हो गया था. वक्त के थपेड़ों ने या फिर बेहिसाब जिम्मेदारियों ने उस को उम्र से पहले ही परिपक्व कर दिया था. आंखों की कशिश जिम्मेदारियों के बो झ तले और मोटे फ्रेम के पीछे कहीं दूर छिप गई थी और उस सजीले नौजवान को कहीं दूर पीछे धकेल बहुत आगे निकल आई थी. मुग्धा की आंखें मोहित को पहचानने में कभी गलती नहीं कर सकती थीं. मोहित की आंखें मुग्धा को पहचानने की कोशिश कर रही थीं.

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