वक्त ने कितनी अजीब स्थिति में डाल दिया था वैभवी को. खुशियां उस के आगे हाथ पसारे खड़ी थीं लेकिन वह उन्हें थाम नहीं सकती थी. यह कैसा खेल था नियति का.
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