Religious loot : न जाने कब से मंदिरों, मजारों, गुरुद्वारों के बाहर खड़ी भिखारियों की भीड़ दानी लोगों के दान, पुण्य और परोपकार के सहारे ही अपना पेट भर रही है. इन धर्मस्थलों के आगे खड़ी लाचार लोगों की लंबी कतारों में बेबस लोगों की न जाने कितनी पीढि़यां खप चुकी हैं. क्या दान की इस भावना में कुछ इंसानियत होती है? क्या इस पुण्य से गरीबी दूर होती है? परोपकार की मानसिकता से फायदा किस का होता है?

दान, पुण्य और परोपकार की कुसंस्कृति न जाने कब से चलन में है. जब से सभ्यता बनी, लोगों ने एकदूसरे को सहयोग करने की आदत का फायदा उठाया और विपत्ति के समय किसी को कुछ दे देना सभ्यता सम झा गया. शुरुआत में जिस ने शिकार किया, फलफूल एकत्र किए या कुछ उपजाया उस ने उन दूसरों को कुछ देना शुरू किया जो शारीरिक कमजोरी की वजह से खुद का खाना जमा नहीं कर पाए. देने वाले को यह एहसास रहता था कि जिसे जो दिया गया वह उस के काम आ सकता है जब वह कमजोरी, बीमारी या प्राकृतिक आपदा के कारण खुद खाना जुटा न सकेगा. यह दान नहीं है, यह पारस्परिक सहयोग है जो सदियों से चलता आ रहा है और यह सभ्यता की मजबूत ईंटों में से एक आदत है.

इस पारस्परिक सहयोग का दुरुपयोग किया गया. हर धर्म के पुरोहितों ने अपने फायदे के लिए धर्म के नियम, कायदे व कानून बनाए और कहानियां गढ़ीं ताकि दान के नाम पर लोगों से धन ऐंठा जा सके. सो, धर्म की कहानियों में दानदक्षिणा का खूब महिमागान किया गया है. अब ईश्वर के नाम पर दान मांगा जाता है. लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि दान देने से ईश्वर खुश होता है. लोग ईश्वर के नाम पर ठगे चले जाते हैं. यही कारण है कि हर देश में धर्म की बड़ी दुकान में अथाह दौलत इकट्ठी हो गई है. बड़ेबड़े मंदिर, चर्च और मसजिदें इसी हथकंडे के तहत ही बने हैं. ईश्वर के नाम पर इकट्ठी की गई दौलत से पुरोहित ऐश करते हैं जबकि जनता हमेशा गरीब ही बनी रहती है.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD48USD10
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
 

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD150USD120
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
  • 24 प्रिंट मैगजीन
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...