दिल्ली में यमुना किनारे बसी अवैध झुग्गियों में रहने वाले परिवार बाढ़ के चलते एक अदद आशियाने को तरस रहे हैं. वोटबैंक की शक्ल में पल रहे ये लोग आज भले ही सरकार को कोस रहे हैं पर अपनी इस हालत के लिए ये खुद ही जिम्मेदार हैं. पढि़ए बुशरा का लेख.

सड़क किनारे फुटपाथ पर काली बरसाती, तिरपाल को कुछ लकड़ी के बांसों के सहारे टिका कर बनाई गई उस झोपड़ी के भीतर झांकने के लिए जैसे ही हम ने अपना सिर थोड़ा नीचे झुकाया तो भीतर से मैले कपड़ों, पसीने, गोबर और कचरे की दुर्गंध नथुनों से हो कर मेरे दिमाग को सुन्न कर गई. दिल्ली में यमुना नदी मेंआए उफान के कारण उस के किनारों पर बसे सैकड़ों झुग्गीवासी सड़कों पर नजर आते हैं. मैं ने धीरेधीरे सांस लेते हुए उस बदबू को इग्नोर करने की कोशिश की और अंदर पड़ी लकड़ी की चौकी के एक किनारे पर टिक गई. चौकी पर ढेर सारा सामान बिखरा हुआ था. चारों ओर रस्सी बांध कर उस पर कपड़े लटकाए गए थे, जिन में कुछ साफ तो कुछ मैले थे. कुछ कपड़े व सामान छोटीछोटी गठरियों में बांध कर चौकी के नीचे रखा हुआ था. बची जगह में बड़ेबड़े कद्दू रखे हुए थे जिन पर एक अधफटा कपड़ा ढका था. 

कुछ स्टील व ऐल्यूमिनियम के बरतनों को धो कर उन का पानी सूखने के लिए उन्हें जमीन पर पलट कर रखा गया था. इस अस्थायी झोंपड़ी के बाहर मिट्टी का एक डबल चूल्हा बनाया गया था जिस पर एक ओर बड़ा सा तवा रखा था और दूसरी ओर का चूल्हा खाली पड़ा था. चूल्हे के पास ही पेड़ के सूखे झाड़ रखे थे.

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