ए आर मैथ्यू एक राष्ट्रीयकृत बैंक में अधिकारी था. मुंबई का रहने वाला था. उस का स्थानांतरण राजस्थान के कोटा शहर में हो गया. उस की पत्नी मुंबई में ही एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करती थी. वहां उसे अच्छाखासा वेतन मिलता था. इसलिए वह नौकरी छोड़ने को तैयार न थी. मजबूरन मैथ्यू को हर महीने एकदो बार मुंबई जाना पड़ता था.
बारबार की भागदौड़ से तंग आ कर मैथ्यू ने मुंबई के एक प्राइवेट बैंक में नौकरी के लिए आवेदन कर दिया. संयोगवश उसे नौकरी मिल गई. वहां पहले वाली नौकरी की तुलना में वेतन भी अधिक था. नौकरी की शर्तों के अनुसार, वहां हर दूसरे वर्ष वेतन व सेवा शर्तों का नवीनीकरण किया जाना तय था. नौकरी स्वीकार करते समय उसे यह बात बहुत अच्छी लगी थी क्योंकि यह मेहनत और काम के अनुसार वेतन दिए जाने वाली बात थी. वह शीघ्र ही उन्नति कर लेगा, इसी उम्मीद में उस ने वर्षों पुरानी नौकरी झट से छोड़ दी.
मैथ्यू नई नौकरी पर आ गया. वह अपनी सफलता पर बेहद खुश था. पर जल्दी ही उस की खुशी काफूर हो गई. वह नौकरी के अनुसार स्वयं को नहीं ढाल पाया. उसे सुबह साढ़े 5 बजे जाना पड़ता था और रात को 10 बजे घर लौट कर आता था. काम भी बहुत अधिक और नए तरीके का था. नतीजतन, वह अवसाद यानी डिप्रैशन का शिकार हो गया. सालभर पूरा होतेहोते वह एंजाइना यानी (हृदय रोग) की गिरफ्त में आ गया. इस का उस की कार्यक्षमता पर विपरीत असर पड़ा.
2 वर्ष बाद बैंक ने उस का अनुबंध रिवाइज किया. उस का वेतन पहले से आधा कर दिया गया. वह वेतन उस की पहले वाली नौकरी से भी कम था. मैथ्यू बैंक के खिलाफ अदालत में भी नहीं जा सकता था. बैंक ने नौकरी पर लेने से पूर्व ही उस से इस्तीफा लिखवा कर रख लिया था. मैथ्यू को पहले वाली नौकरी छोड़ देने का गहरा अफसोस था. पर अब उस के पास उसी नौकरी पर बने रहने के अलावा कोई चारा न था.
मनीष पिछले 40 वर्षों से पुस्तक व्यवसाय में कार्यरत था. वह पुस्तक विक्रय प्रतिनिधि की हैसियत से देश के विभिन्न भागों में जा कर पुस्तकों के और्डर बुक किया करता था. इस कार्य में उसे विशेषज्ञता हासिल थी. इस कारण पुस्तक प्रकाशक और विक्रेता उस की गरज करते रहते थे. बाजार में उस की बहुत पूछ थी. पर मनीष में एक बहुत बड़ी कमी थी. वह मनमौजी किस्म का था. जब मरजी आती, काम पर चला जाता वरना छुट्टी कर लेता. बिना बताए एक व्यवसायी की नौकरी छोड़ कर दूसरे के यहां नौकरी करने लग जाता. अकसर पुस्तक व्यवसायी उसे अपने यहां नौकरी पर रखने के लिए लालायित रहते थे. पर वे यह भी जानते थे कि न जाने कब वह बिना बताए नौकरी छोड़ कर चला जाए.
मनीष की इस मानसिकता से दुखी हो कर पिछले दिनों पुस्तक व्यवसायियों ने एक मीटिंग की. उन्होंने तय किया कि यदि मनीष बिना पूर्व सूचना के नौकरी छोड़ देता है तो उसे कोई भी व्यवसायी अपने यहां नौकरी पर नहीं रखेगा. आदतन मनीष ने एक बार फिर अपनी नौकरी छोड़ दी. उस ने दूसरे अन्य पुस्तक व्यवसायियों से संपर्क किया. मगर वह जहां भी गया उसे नकारात्मक उत्तर मिला. इस तरह 6 महीने बीत गए. उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिली.
पुस्तक व्यवसायियों को उंगलियों पर नचाने वाले मनीष को नौकरी के लाले पड़ गए थे. बेरोजगारी ने उस की बार्गेनिंग पावर छीन ली. आखिरकार उसे उसी नियोक्ता के पास जाना पड़ा जहां से उस ने काम छोड़ा था. कई तरह की शर्तें मानने पर उस ने उसे दोबारा नौकरी दी. पहले की तुलना में वेतन कम व सेवाशर्तें अधिक कठोर तय हुईं. मनीष इस स्थिति से संतुष्ट नहीं था पर वह अपनी आदतों से मजबूर था. आखिर, जिन लोगों ने उस के साथ पुस्तक व्यवसाय में अपना कैरियर शुरू किया था वे सब अच्छे व्यापारी बन गए थे, जबकि मनीष को उन के यहां जा कर नौकरी के लिए हाथ फैलाना पड़ता था.
सूझबूझ की जरूरत
नौकरी स्वीकार करते समय जितनी समझदारी और सूझबूझ की जरूरत होती है उस से कहीं अधिक धैर्य की जरूरत होती है नौकरी छोड़ने का निर्णय लेते समय. यह उस समय और भी अधिक आवश्यक हो जाता है जब नियोक्ता स्वयं नौकरी छोड़ने के लिए नहीं कहे और व्यक्ति अपने ही कारणों से नौकरी छोड़ने की इच्छा रखता हो. आज के समय में बिना किसी उचित और बाध्यकारी परिस्थितियों के नौकरी छोड़ देना समझदारी नहीं कही जा सकती. बहुत से लोग अच्छी नौकरी की चाहत में पहले वाली नौकरी छोड़ देते हैं. बाद में उन्हें पता चलता है कि उन्होंने नई नौकरी में जिन खूबियों की उम्मीद की थी वे उस में नहीं हैं. यह सच है कि ‘बेटरमैंट औफ जौब’ हर व्यक्ति चाहता है. पर उस के लिए समग्र दूरदृष्टि से निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है. जल्दबाजी व लापरवाही से लिया गया निर्णय जीवनपर्यंत पछताने का सबब बन सकता है.
कुछ व्यक्तिगत कारण
नौकरी छोड़ने के अधिकतर कारण व्यक्तिगत होते हैं. वर्तमान नौकरी के प्रति नापसंदगी का होना अथवा पति या पत्नी का दूसरे स्थान पर तबादला हो जाना और फिर इच्छित जगह पर तबादला न करवा पाने के कारण लोग या तो स्वयं त्यागपत्र दे देते हैं या पत्नी की नौकरी छुड़वा देते हैं. संभव है इस कारण वे कुछ दिन तो संतुष्टि का एहसास कर लेते हों मगर परिवार की आय घट जाने की पीड़ा संपूर्ण परिवार को सदा के लिए झकझोरती रहती है. उन्हें जीवनपर्यंत अपने निर्णय पर अफसोस बना रहता है, बेशक, उसे खुलेआम स्वीकार करने में उन्हें संकोच होता हो.
नौकरी की सेवाशर्तें भी कई बार व्यक्ति को नौकरी छोड़ने के लिए विवश कर देती हैं. उदाहरणार्थ, महिलाओं के लिए रात्रि की पाली में नौकरी करने की बाध्यता. ऐसी सेवाशर्तों के बारे में नौकरी शुरू करने से पूर्व ही अच्छी तरह सोचविचार कर लेना चाहिए. यदि ऐसी विवशताएं बाद में उत्पन्न हुई हैं तो नियोक्ता से इन के संबंध में बातचीत कर कोई न कोई हल ढूंढ़ा जा सकता है. यदि इन्हें माना जाना वाकई आवश्यक हो गया है तो नियोक्ता से उपयुक्त सुविधा देने की बात कही जा सकती है. वह भी नहीं चाहेगा कि उस के कारण उस का कर्मचारी उलझन व परेशानी का शिकार हो, जैसे वह रात्रि पाली में काम करने वाली महिला कर्मचारियों को उन के घरों से लाने व ले जाने की उपयुक्त व सुरक्षित व्यवस्था करवा सकता है. न्यायोचित हल खोजने के लिए नौकरी में रहते हुए नियोक्ता को विवश भी किया जा सकता है.
कई बार पदोन्नति न होने या किसी अयोग्य अथवा कनिष्ठ साथी के पदोन्नत हो जाने के कारण फ्रस्ट्रेशन का आवेश भी नौकरी छोड़ने का कारण बन जाता है.
ऐसे समय मनुष्य को आवेशात्मक निर्णय नहीं लेना चाहिए. उसे ईमानदारीपूर्वक आत्मावलोकन करना चाहिए. अकसर हर व्यक्ति अन्य लोगों की तुलना में खुद को सर्वाधिक योग्य मान बैठने की भूल कर बैठता है, जबकि सचाई कुछ और होती है. यह मानवीय कमजोरी है कि व्यक्ति अन्य लोगों की कमियों को तो सहज ही ढूंढ़ लेता है लेकिन स्वयं की कमियों को नजरअंदाज कर देता है. संभव है कि उस में कमियां हों जिन के कारण उस की पदोन्नति न हो पाई हो. यद्यपि कोई भी नियोक्ता या प्रबंधन अकुशल लोगों को पदोन्नति दे कर स्वयं को कमजोर करने जैसा आत्मघाती कदम उठाना पसंद नहीं करता. फिर भी संभव है कि किसी कारणवश पदोन्नति में कोई पक्षपात जैसी बात हो गई हो. मगर इस का मुकाबला नौकरी छोड़ कर कर पाना तो संभव नहीं है. ऐसी परिस्थिति में पलायन कर जाने के बजाय नौकरी में रहते हुए ही न्याय पाने के उपाय ढूंढ़े जाने चाहिए.
नियोक्ता को जानकारी दें
यदि नौकरी छोड़ना तय ही कर लिया है तो अपने नियोक्ता को यथासमय सूचना अवश्य दें. यथासमय से तात्पर्य है कि उसे कम से कम इतने समय पूर्व जरूर बता दें जिस का उल्लेख नियुक्तिपत्र में किया गया है, जिस से नियोक्ता उस समयावधि में दूसरे कर्मचारी को रखने की या अन्य वैकल्पिक व्यवस्था कर सके. यदि कर्मचारी ऐसा नहीं करता है तो नियोक्ता उस के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर सकता है, जिस के तहत वह कर्मचारी को नई नौकरी छोड़ कर वापस आने या उस के एवज में क्षतिपूर्ति राशि चुकाने के लिए बाध्य कर सकता है. साथ ही, वह व्यापार संघों या अन्य संगठनों के माध्यम से उस कर्मचारी का नाम काली सूची में भी डलवा सकता है. इस से उसे भविष्य में नौकरी मिलने में कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं. कई नियोक्ता नौकरी देने से पहले, पूर्व नियोक्ता से नियुक्त किए जाने वाले कर्मचारी की नैतिकता, आचरण व व्यवहार संबंधी रिपोर्ट मांगते हैं. यदि पूर्व नियोक्ता को विश्वास में लिए बिना नौकरी छोड़ दी गई तो ऐसे लोग नई नौकरी पर परेशानी में पड़ सकते हैं.
इस तरह यह बात स्पष्ट है कि नौकरी जल्दबाजी में नहीं छोड़नी चाहिए. नौकरी शरीर ढकने वाली कोई पोशाक नहीं है कि इसे बारबार या जब चाहे बदल लें. हां, नौकरी में रह कर न्याय के लिए जद्दोजहद कर सकते हैं.

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